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प्रातः स्मरणम् (Pratah Smaranam)

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“प्रातः स्मरणम्” एक अत्यंत पवित्र और शुभ स्तोत्र है जिसे प्राचीन भारतीय ऋषियों ने विशेष रूप से प्रातःकाल (सुबह) के समय जपने के लिए रचा है। इसका उद्देश्य है—दिन की शुरुआत आत्मचिंतन, ईश्वर-चिन्तन और परमात्मा के विविध रूपों की स्तुति से करना, ताकि मनुष्य का मन, वचन और कर्म शुद्ध हों और सम्पूर्ण दिन दिव्यता से युक्त हो।

इस स्तोत्र में विभिन्न देवताओं और महान आत्माओं का स्मरण किया गया है:

🔸 परब्रह्म का ध्यान करके आत्मस्वरूप को पहचानने की प्रेरणा,
🔸 श्रीविष्णु, श्रीराम, शिव, गणेश, सूर्यदेव आदि का स्तवन,
🔸 देवी माँ का करुणामयी रूप और संरक्षण भाव,
🔸 तथा भगवद्भक्तों और महापुरुषों के स्मरण से आध्यात्मिक प्रेरणा प्राप्त होती है।

प्रात: स्मरणम् (Pratah Smaranam)

प्रकीर्णस्तोत्राणि

(1) परब्रह्मण:

  1. प्रात: स्मरामि हृदि संस्फुरदात्मतत्त्वं सच्चित्सुखं परमहंसगतिं तुरीयम्।
    यत्स्वप्नजागरसुषुप्तिमवैति नित्यं तद्ब्रह्म निष्कलमहं न च भूतसंघ।
  2. प्रातर्भजामि मनसा वचसामगम्यं वाचो विभान्ति निखिला यदनुग्रहेण।
    यन्नेतिनेतिवचनैर्निगमा अवोचंस्तं देवदेवमजमच्युतमाहुरग्रयम्।
  3. प्रातर्नमामि तमस: परमर्कवर्णं पूर्णं सनातनपदं पुरुषोत्तमाख्यम्।
    यस्मिन्निदं जगदशेषमशेषमूर्तौ रज्ज्वां भुजंगम इव प्रतिभासितं वै।
  4. श्लोकत्रयमिदं पुण्यं लोकत्रयविभूषणम्।
    प्रात: काले पठेद्यस्तु स गच्छेत्परमं पदम्।।

(2) श्रीविष्णो:

  1. प्रात: स्मरामि भवभीतिमहार्तिशान्त्यै नारायणं गरुडवाहनमब्जनाभम्।
    ग्राहाभिभूतवरवारणमुक्तिहेतुं चक्रायुधं तरुणवारिजपत्रनेत्रम्।
  2. प्रातर्नमामि मनसा वचसा च मूर्ध्ना पादारविन्दयुगलं परमस्य पुंस:।
    नारायणस्य नरकार्णवतारणस्य पारायणप्रवणविप्रपरायणस्य।
  3. प्रातर्भजामि भजतामभयंकरं तं प्राक्सर्वजन्मकृतपापभयापहत्यै।
    यो ग्राहवक्त्रपतितांगघ्रिगजेन्द्रघोरशोकप्रणाशनकरो धृतशंखचक्र:।।

(3) श्रीरामस्य:

  1. प्रात: स्मरामि रघुनाथमुखारविन्दं मन्दस्मितं मधुरभाषि विशालभालम्।
    कर्णावलम्बिचलकुण्डलशोभिगंडं कर्णान्तदीर्घनयनं नयनाभिरामम्।
  2. प्रातर्भजामि रघुनाथकरारविन्दं रक्षोगणाय भयदं वरदं निजेभ्य:।
    यद्राजसंसदि विभज्य महेशचापं सीताकरग्रहणमंगलमाप सद्य:।
  3. प्रातर्नमामि रघुनाथपदारविन्दं वज्रांकुशादिशुभरेखि सुखावहं मे।
    योगीन्द्रमानसमधुव्रतसेव्यमानं शापापहं सपदि गौतमधर्मपत्न्या:।
  4. प्रातर्वदामि वचसा रघुनाथनाम वाग्दोषहारि सकलं शमलं निहन्ति।
    यत्पार्वती स्वपतिना सह भोक्तुकामा प्रीत्या सहस्त्रहरिनामसमं जजाप।
  5. प्रात: श्रये श्रुतिनुतां रघुनाथमूर्तिं नीलाम्बुजोत्पलसितेतररत्ननीलाम्।
    आमुक्तमौक्तिकविशेषविभूषणाढयां ध्येयां समस्तमुनिभिर्जनमुक्तिहेतुम्।
  6. य: श्लोकपंचकमिदं प्रयत: पठेद्धि नित्यं प्रभातसमये पुरुष: प्रबुद्ध:।
    श्रीरामकिंकरजनेषु स एव मुख्यो भूत्वा प्रयाति हरिलोकमनन्यलभ्यम्।।

(4) श्रीशिवस्य:

  1. प्रात: स्मरामि भवभीतिहरं सुरेशं गंगाधरं वृषभवाहनमम्बिकेशम्।
    खट्वांगशूलवरदाभयहस्तमीशं संसाररोगहरमौषधमद्वितीयम्।
  2. प्रातर्नमामि गिरिशं गिरजार्द्धदेहं सर्गस्थितिप्रलयकारणमादिदेवम्।
    विश्वेश्वरं विजितविश्वमनोऽभिरामं संसाररोगहरमौषधमद्वितीयम्।
  3. प्रातर्भजामि शिवमेकमनन्तमाद्यं वेदान्तवेद्यमनघं पुरुषं महान्तम्।
    नामादिभेदरहितं षड्भावशून्यं संसाररोगहरमौषधमद्वितीयम्।
  4. प्रात: समुत्थाय शिवं विचिन्त्य श्लोकत्रयं येऽनुदिनं पठन्ति।
    ते दुःखजातं बहुजन्मसञ्चितं हित्वा पदं यान्ति तदेव शम्भो:।।

(5) श्रीदेव्या:

  1. चाञ्चल्यारुणलोचनाञ्चितकृपां चन्द्रार्कचूडामणिं चारुस्मेरमुखां चराचरजगत्संरक्षणीं सत्पदाम्।
    चञचच्चकनासिकाग्रविलसन्मुक्तामणीरञ्जितां श्रीशैलस्थलवासिनीं भवतीं श्रीमातरं भावये।
  2. कस्तूरीतिलकाञ्चितेन्दुविलसत्प्रोद्भासिभालस्थलीं कर्पूरद्रवमिश्रचूर्णखदिरामोदोल्लसद्वीटिकाम्।
    लोलापांगतरंगितैरधिकृपासारैर्नतानन्दिनीं श्रीशैलस्थलवासिनीं भगवतीं श्रीमातरं भावये।।

(6) श्रीगणेशस्य:

  1. प्रात: स्मरामि गणनाथमनाथबन्धुं सिंदूरपूरपरिशोभितगंडयुग्मम्।
    उद्दण्डविघ्नपरिखण्डनचण्डदण्डमाखण्डलादिसुरनायकवृन्दवन्द्दम्।
  2. प्रातर्नमामि चतुराननवन्द्दमानमिच्छानुकूलमखिलं च वरं ददानम्।
    तं तुन्दिलं द्विरसनाधिपयज्ञसूत्रं पुत्रं विलासचतुरं शिवयो: शिवाय।
  3. प्रातर्भजाम्यभयदं खलु भक्तशोकदावानलं गणविभुं वरकुञ्जरास्यम्।
    अज्ञानकाननविनाशनहव्यवाहमुत्साहवर्धनमहं सुतमीश्वरस्य।
  4. श्लोकत्रयमिदं पुण्यं सदा साम्राज्यदायकम्।

(7) श्रीसूर्यस्य:

  1. प्रात: स्मरामि खलु तत्सवितुर्वरेण्यं रूपं हि मण्डलमृचोऽथ तनुर्यजूंषि।
    सामानि यस्य किरणा: प्रभवादिहेतुं ब्रह्माहरात्मकमलक्ष्यमचिन्त्यरूपम्।
  2. प्रातर्नमामि तरणिं तनुवांगमनोभिर्ब्रहोंद्रपूर्वकसुरैर्नुतमर्चितं च।
    वृष्टिप्रमोचन विनिग्रहहेतुभूतं त्रैलोक्यपालनपरं त्रिगुणात्मक च।
  3. प्रातर्भजामि सवितारमनन्तशक्ंति पापौघशत्रुभयरोगहरं परं च।
    तं सर्वलोककलनात्मककालमूर्तिं गोकण्ठबन्धनविमोचनमादिदेवम्।
  4. श्लोकत्रयमिदं भानो: प्रात:काले पठेत्तु य:।
    स सर्वव्याधिनिर्मुक्त: परं सुखमवाप्नुयात्।।

(8) श्रीभगवतद्भक्तानाम्:

  1. प्रहलादनारदपराशरपुण्डरीकव्यासाम्बरीषशुकशौनकभीष्मदाल्भ्यान्।
    रुक्मांडदार्जुनवसिष्ठविभीषणादीन् पुण्यानिमान् परमभागवतान् स्मरामि।।
  2. वाल्मीकि: सनक: सनन्दनतरुव्र्यासो वसिष्ठो भृगुर्जाबालिर्जमदग्निकच्छजनको गर्गोऽगिंरा गौतम:।
    मान्धाता ऋतुपर्णवैन्यसगरा धन्यो दिलीपो नल: पुण्यो धर्मसुतो ययातिनहुषौ कुर्वन्तु नो मंगलम्।।

।। इति प्रात: स्मरणं सम्पूर्णम् ।।

प्रातः स्मरणम् स्तोत्र का पूरा हिंदी अनुवाद

1) परब्रह्म का स्मरण

  1. प्रातःकाल मैं अपने हृदय में उस आत्मतत्त्व का स्मरण करता हूँ, जो सत्-चित्-आनंदस्वरूप, परमहंसों की गति (परम अवस्था) है और जो जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति – तीनों अवस्थाओं में साक्षीभाव से विद्यमान रहता है। वही निष्कल (निष्काम) ब्रह्म मैं हूँ — न कि पंचभूतों का यह समूह।
  2. प्रातः मैं उस ब्रह्म की भक्ति करता हूँ, जिसे मन और वाणी से पाया नहीं जा सकता, लेकिन जिसकी कृपा से सभी वाणियाँ प्रकाशित होती हैं। जिसे वेद ‘नेति-नेति’ कहकर प्रकट करते हैं, वही देवों का देव, अजन्मा, अच्युत और आदि है।
  3. प्रातः मैं उस पुरुषोत्तम परमात्मा को प्रणाम करता हूँ, जो तम (अज्ञान) से परे, सूर्य के समान तेजस्वी, सनातन और संपूर्ण है। जिसकी अपार मूर्तियों में यह सम्पूर्ण सृष्टि एक रज्जु में भुजंग (साँप) के भ्रम के समान प्रतीत होती है।
  4. जो मनुष्य इस पुण्यश्लोक त्रयी का प्रतिदिन प्रातःकाल पाठ करता है, वह तीनों लोकों के वैभव को प्राप्त करता है और परमपद को प्राप्त करता है।

(2) श्रीविष्णु का स्मरण

  1. प्रातः मैं श्रीनारायण का स्मरण करता हूँ, जो गरुड़ पर सवार हैं, नाभि में कमल है, ग्राह द्वारा पकड़े गए गजराज को मोक्ष देने वाले हैं, चक्रधारी हैं और जिनकी आँखें लाल कमल की पंखुड़ी के समान हैं।
  2. प्रातः मैं नारायण के चरण कमलों को वाणी, मन और मस्तक से प्रणाम करता हूँ, जो नर रूप में अवतरित होकर नरक से तारने वाले हैं, और जो ब्राह्मणों तथा वेदों के रक्षक हैं।
  3. प्रातः मैं उस श्रीहरि का ध्यान करता हूँ, जो भक्तों को भय से मुक्ति देने वाले हैं, जो पूर्वजन्मों के पापों को हर लेते हैं, जिन्होंने ग्राह द्वारा पकड़े गजेन्द्र के दुख को हर लिया था और शंख-चक्रधारी हैं।

श्रीराम का स्मरण

  1. प्रातः मैं श्रीराम के मुख का स्मरण करता हूँ, जो मंद मुस्कान वाले, मधुरभाषी, विशाल ललाट वाले हैं; जिनके गाल झूलते कुंडलों से शोभित हैं और जो लम्बी आँखों से मनोहर लगते हैं।
  2. प्रातः मैं श्रीराम के हाथों को भजता हूँ, जो राक्षसों के लिए भयदायक और भक्तों को वर देने वाले हैं; जिन हाथों ने राजसभा में शिव धनुष को तोड़कर सीता जी का पाणिग्रहण किया।
  3. प्रातः मैं श्रीराम के चरणों का स्मरण करता हूँ, जिनमें वज्र, अंकुश आदि शुभ रेखाएँ हैं, जो योगियों के ध्यान के केंद्र हैं, और जिन्होंने गौतम ऋषि की पत्नी का शाप हर लिया।
  4. प्रातः मैं श्रीराम के नाम का उच्चारण करता हूँ, जो वाणी के दोषों को हरने वाला, समस्त पापों का नाशक है। स्वयं माता पार्वती ने भी शिवजी के साथ मिलकर इसका सहस्त्र बार जप किया।
  5. प्रातः मैं श्रीराम के उस रूप का स्मरण करता हूँ, जो नीले कमल के समान नील वर्ण के हैं, मोतियों के गहनों से सुशोभित हैं, और समस्त मुनियों द्वारा ध्यान किए जाते हैं, जो मुक्ति प्रदान करते हैं।
  6. जो व्यक्ति इस श्रीराम पंचक (5 श्लोकों) का प्रातःकाल पाठ करता है, वह श्रीराम के सेवकों में श्रेष्ठ हो जाता है और हरिलोक को प्राप्त करता है।

श्रीशिव का स्मरण

  1. प्रातः मैं उस भगवान शिव का स्मरण करता हूँ, जो भय दूर करने वाले हैं, गंगाधर हैं, वृषभ पर सवार हैं, अंबिका के पति हैं और खट्वांग, त्रिशूल, वर और अभय मुद्रा धारण करते हैं। जो संसार रूपी रोग के अद्वितीय औषधि हैं।
  2. प्रातः मैं गिरिश (शिव) को प्रणाम करता हूँ, जो अर्धनारीश्वर हैं, सृष्टि-स्थिति-प्रलय के कारण हैं, विश्वेश्वर हैं, जिन्होंने जगत को वश में किया है और जो संसार रोग को हरने वाले हैं।
  3. प्रातः मैं शिव को भजता हूँ, जो एकमात्र, अनंत, आद्य, वेदांत से जानने योग्य, पापरहित, महापुरुष, नामरहित, और षड्भाव (6 विकारों) से रहित हैं।
  4. जो इस तीन श्लोकों का प्रतिदिन पाठ करता है, वह अनेक जन्मों के पापों से मुक्त होकर शिवपद को प्राप्त करता है।

(5) श्रीदेवी का स्मरण

  1. प्रातः मैं माता देवी का ध्यान करता हूँ, जिनकी आँखें लाल हैं, करुणा से परिपूर्ण हैं, सिर पर चंद्र-सूर्य सुशोभित हैं, जो चारु मुस्कानवाली हैं, चराचर जगत की रक्षक हैं, और जो श्रीशैल पर्वत पर निवास करती हैं।
  2. प्रातः मैं माता की वंदना करता हूँ, जिनके ललाट पर चंदन और चंद्रमा शोभित हैं, पान के मिश्रण से उनका मुख मंद सुगंध बिखेरता है, जिनकी दृष्टि करुणा से भरी हुई है और जो श्रीशैल पर निवास करती हैं।

श्रीगणेश का स्मरण

  1. प्रातः मैं गणेश जी का स्मरण करता हूँ, जो अनाथों के बंधु हैं, जिनके गाल सिंदूर से सुशोभित हैं, जो विघ्नों को नष्ट करने वाले हैं, और जिनकी वंदना ब्रह्मा आदि देवता करते हैं।
  2. प्रातः मैं उस बुद्धिमान गणपति को प्रणाम करता हूँ, जो सबको इच्छित वर देते हैं, जो यज्ञसूत्र धारण करते हैं, जो शिव-पार्वती के प्रिय पुत्र हैं।
  3. प्रातः मैं गणेश जी का ध्यान करता हूँ, जो भयहर हैं, भक्तों के दुखों को नष्ट करने वाले हैं, अज्ञान के अरण्य को जलाने वाले हैं, और उत्साहवर्धक हैं।
  4. जो पुरुष इस त्रय स्तोत्र का पाठ करता है, उसे राज्य, सुख और सर्वविघ्नों से मुक्ति प्राप्त होती है।

सूर्यदेव का स्मरण

  1. प्रातः मैं उस सूर्यदेव का स्मरण करता हूँ, जिनका स्वरूप गायत्री मंत्र का अर्थ है, जिनकी किरणें ब्रह्मस्वरूप हैं, जो दृष्टि से परे हैं।
  2. प्रातः मैं सूर्य को नमस्कार करता हूँ, जिन्हें ब्रह्मा, इंद्र आदि देवता पूजते हैं, जो वर्षा और संहार के कारण हैं, और त्रिगुणात्मक विश्व के रक्षक हैं।
  3. प्रातः मैं सूर्य का ध्यान करता हूँ, जो अनंत शक्ति से युक्त हैं, पापों, शत्रुओं और रोगों को नष्ट करने वाले हैं, और सबका बंधन काटने वाले आदि देव हैं।
  4. जो इस सूर्य स्तुति का प्रातः पाठ करता है, वह सभी रोगों से मुक्त होकर परम सुख को प्राप्त करता है।

भगवत्भक्तों का स्मरण

  1. प्रातः मैं उन श्रेष्ठ भागवतों का स्मरण करता हूँ — प्रह्लाद, नारद, पराशर, पुंडरीक, व्यास, अंबरीष, शुकदेव, शौनक, भीष्म, दाल्भ्य, रुक्मांगद, अर्जुन, वशिष्ठ, विभीषण आदि।
  2. प्रातः मैं उन पवित्र राजाओं और ऋषियों का स्मरण करता हूँ — वाल्मीकि, सनक, सनंदन, तरु, वसिष्ठ, भृगु, जाबालि, जमदग्नि, जनक, गर्ग, अंगिरा, गौतम, मान्धाता, ऋतुपर्ण, सगर, दिलीप, नल, धर्मराज, ययाति और नहुष — वे हम सबके लिए मंगलमय हों।

॥ इति प्रातः स्मरणं सम्पूर्णम् ॥

लाभ (Benefits)

  • मानसिक स्पष्टता व संतुलन — सुबह-सुबह इसके जप से मन शांत होता है, चेतना साफ़ होती है और दिनभर सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है।
  • दुःस्वप्नों और भय से रक्षा — रात के बुरे स्वप्न दूर होते हैं और भय व बाधाएँ समाप्त होती हैं।
  • रोग और जीवन संकटों से मुक्ति — यह स्तोत्र स्वास्थ्य, समृद्धि और लंबी आयु के लिए मददगार है ।
  • कुण्डली दोष (ग्रहोपद्रव) निवारण — नियमित पाठ से सूर्य, चंद्र तथा नवग्रहों के दोष शांत होते हैं।

पाठ विधि (Method)

  1. ब्रह्ममुहूर्त में जागरण — सूर्योदय से लगभग 84–36 मिनट पहले उठें और स्नान आदि नित्यकर्म करें।
  2. प्रात: स्तुति का क्रम — क्रमशः ख़ंड (परब्रह्म, विष्णु, राम, शिव, देवी, गणेश, सूर्य, भक्तवृन्द) का स्मरण करें।
  3. प्रणाम/अष्टांग प्रणाम — आठों अंग (साष्टांग) से प्रणाम करें और पूजन की शुरुआत होली छंद से करें
  4. पूजा सामग्री जैसे धूप–दीप, पुष्प, जल, फल आदि के साथ ग्राम्य संकल्प और संकीर्तन करें।
  5. मंत्र–पाठ / स्मरण — प्रत्येक खंड के श्लोक व अर्थ समझकर जपें या सुनें

जप का उपयुक्त समय (Timing)

  • विशेष समय: ब्रह्ममुहूर्त (सूर्योदय से लगभग 84–36 मिनट पूर्व) को सर्वाधिक शुभ व लाभकारी माना गया है।
  • समयावधि: प्रतिदिन सुबह एक संपूर्ण पाठ करना उत्तम; तात्कालिक दिव्य लाभ प्राप्त होते हैं ।

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