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गोपाल विशंति स्तोत्र (Gopal Vishanti Stotram)

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गोपालविंशति स्तोत्रम् एक अत्यंत दिव्य और भक्तिपूर्ण स्तुति है, जिसकी रचना महान श्रीवैष्णव आचार्य स्वामी वेदांत देशिक (Vedanta Desika) ने की थी। इस स्तोत्र में कुल 20 श्लोक हैं (इसलिए इसे “विंशति” कहा जाता है), जो भगवान श्रीकृष्ण के बालरूप (गोपाल स्वरूप) की अनुपम लीलाओं, सौंदर्य, और करुणा का अद्भुत वर्णन करते हैं।

यह स्तोत्र विशेष रूप से उन भक्तों के लिए है जो भगवान श्रीकृष्ण के माखन चुराने वाले बाल गोपाल रूप, उनकी मुरली की मधुर ध्वनि, और रासलीला से जुड़ी भक्ति भावना को अपने हृदय में जागृत करना चाहते हैं।

गोपालविंशति स्तोत्र का पाठ करने से मन शांत होता है, जीवन में प्रेम, आनंद और भक्ति का संचार होता है, और भगवान श्रीकृष्ण की कृपा सहज रूप से प्राप्त होती है।

गोपालविंशति स्तोत्रम् (Gopal Vishanti Stotram)
(रचयिता: श्री वेदांतदेशिक)

श्रीमान् वेंकटनाथार्यः कवितार्किककेसरी ।
वेदान्ताचार्यवर्यो मे सन्निधत्तां सदा हृदि ॥

वन्दे वृन्दावनचरं वलव्वीजनवल्लभम् ।
जयन्तीसम्भवं धाम वैजयन्तीविभूषणम् ॥ १ ॥

वाचं निजाङ्करसिकां प्रसमीक्षमाणो
वक्त्रारविन्दविनिवेशितपांचजन्यः ।
वर्णः त्रिकोणरूचिरे वरपुण्डरीके
बद्धासनो जयति वल्लवचक्रवर्ती ॥ २ ॥

आम्नायगन्धरुदितस्फुरिताधरोष्ठम्
आस्राविलेक्षणमनुक्षणमन्दहासम् ।
गोपालडिम्भवपुषं कुहना जनन्याः
प्राणस्तनन्धयमवैमि परं पुमांसम् ॥ ३ ॥

आविर्भवत्वनिभृताभरणं पुरस्तात्
आकुंचितैकचरण निभृहितान्यपादम् ।
दध्नानिबद्धमुखरेण निबद्धतालं
नाथस्य नन्दभवने नवनीतनाट्यम् ॥ ४ ॥

कुन्दप्रसूनविशदैर्दशनैश्चर्तुभिः
संदश्य मातुरनिशं कुचचूचुकाग्रम् ।
नन्दस्य वक्त्रमवलोकयतो मुरारेर्
मन्दस्थितं मममनीषितमातनोतु ॥ ५ ॥

हर्तुं कुम्भे विनिहितकरः स्वादु हैयङ्गवीनं
दृष्ट्वा दामग्रहणचटुलां मातरं जातरोषाम् ।
पायादीषत्प्रचलितपदौ नापगच्छन्न तिष्ठन्
मिथ्यागोपः सपदि नयने मीलयन् विश्वगोप्ता ॥ ६ ॥

व्रजयोषिदपाङ्ग वेधनीयं
मथुराभाग्यमनन्यभोग्यमीडे ।
वसुदेववधू स्तनन्धयं तद्
किमपि ब्रह्म किशोरभावदृश्यम् ॥ ७ ॥

परिवर्तितकन्धरं भयेन
स्मितफुल्लाधरपल्लवं स्मरामि ।
विटपित्वनिरासकं कयोश्चिद्
विपुलोलूखलकर्षकं कुमारम् ॥ ८ ॥

निकटेषु निशामयामि नित्यं
निगमान्तैरधुनाऽपि मृग्यमाणम् ।
यमलार्जुनदृष्टबालकेलिं
यमुनासाक्षिकयौवनं युवानम् ॥ ९ ॥

पदवीमदवीयसीं विमुक्ते-
रटवीं सम्पदम्बु वाहयन्तीम् ।
अरूणाधरसाभिलाषवंशां
करूणां कारणमानुषीं भजामि ॥ १० ॥

अनिमेषनिवेष्णीयमक्ष्णो-
रजहद्यौवनमाविरस्तु चित्ते ।
कलहायितकुन्तलं कलापैः
करूणोन्मादकविग्रहं महो मे ॥ ११ ॥

अनुयायिमनोज्ञवंशनालै-
रवतु स्पर्शितवल्लवीविमोहैः ।
अनघस्मितशीतलैरसौ माम्
अनुकम्पासरिदम्बुजैरपाङ्गैः ॥ १२ ॥

अधराहितचारूवंशनाला
मकुटालम्बिमयूरपिञ्च्छमालाः ।
हरिनीलशिलाविभङ्गनीलाः
प्रतिभाः सन्तु ममान्तिमप्रयाणे ॥ १३ ॥

अखिलानवलोकयामि कालान्
महिलादीनभुजान्तरस्यूनः ।
अभिलाषपदं व्रजाङ्गनानाम्
अभिलाक्रमदूरमाभिरूप्यम् ॥ १४ ॥

महसे महिताय मौलिना
विनतेनाञ्जलिमञ्जनत्विषे ।
कलयामि विमुग्धवल्लवी-
वलयाभाषितमञ्जुवेणवे ॥ १५ ॥

जयतु ललितवृत्तिं शिक्षितो वल्लवीनां
शिथिलवलयशिञ्जाशीतलैर्हस्ततालैः ।
अखिलभुवनरक्षागोपवेशस्य विष्णो-
रधरमणिसुधायामंशवान् वंशनालः ॥ १६ ॥

चित्राकल्पः श्रवसि कलयल्लाङ्गलीकर्णपूरं
बर्होत्तंसस्फुरितचिकुरो बन्धुजीवं दधानः ।
गुंजाबद्धामुरसि ललितां धारयन् हारयष्टिं
गोपस्त्रीणां जयति कितवः कोऽपि कौमारहारी ॥ १७ ॥

लीलायष्टिं करकिसलये दक्षिणे न्यस्त धन्या-
मंसे देव्याः पुलकरुचिरे सन्निविष्टान्यबाहुः ।
मेघश्यामो जयति ललितो मेखलादत्तवेणु-
र्गुञ्जापीडस्फुरितचिकुरो गोपकन्याभुजङ्गः ॥ १८ ॥

प्रत्यालीढस्थितिं अधिगतां प्राप्तगाढाङ्कपालीं
पश्चादीषन्मिलितनयनां प्रेयसीं प्रेक्षमाणः ।
भस्त्रायन्त्रप्रणिहितकरो भक्तजीवातुरव्याद्
वारिक्रीडानिबिडवसनो वल्लवीवल्लभो नः ॥ १९ ॥

वासो हृत्वा दिनकरसुतासन्निधौ वल्लवीनां
लीलास्मेरो जयति ललितामास्थितः कुन्दशाखाम् ।
सव्रीडाभिस्तदनु वसने ताभिरभ्यर्थ्यमाने
कामी कश्चित्करकमलयोरञ्जलिं याचमानः ॥ २० ॥

इत्यनन्यमनसा विनिर्मितां
वेंकटेशकविना स्तुतिं पठन् ।
दिव्यवेणुरसिकं समीक्षते
दैवतं किमपि यौवतप्रियम् ॥ २१ ॥

॥ इति श्रीवेदान्तदेशिककृतं गोपालविंशतिस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

“गोपालविंशति स्तोत्रम्” का हिंदी अनुवाद

हे श्री वेंकटनाथ (वेदांतदेशिक), जो कवियों के बीच सिंह के समान हैं और वेदांत के श्रेष्ठ आचार्य हैं, वे सदा मेरे हृदय में विराजमान रहें।

1.
मैं व्रज में विहार करने वाले, गोपियों के प्रिय, विजय ध्वजा ‘वैजयन्ती’ को धारण करने वाले, और जयन्ती तिथि (अष्टमी) को प्रकट हुए उस प्रभु को नमस्कार करता हूँ।

2.
कमल के समान सुंदर मुख में शंख को लगाते हुए, वे वेदों के स्वरूप को सुनते हैं, त्रिकोण रूप में विराजमान होते हैं, और पुण्डरीकासन (कमल के आसन) पर बैठकर सबका पालन करने वाले गोपाल, गोपों के राजा, जयवंत हों।

3.
माता की गोद में खेलते हुए श्रीकृष्ण के होंठ वेदों के उच्चारण जैसे लगते हैं, उनकी आंखें प्रेम में भरी होती हैं और हल्की मुस्कान के साथ वे भगवान का ही बाल रूप हैं—उन्हें ही मैं परम पुरुष मानता हूँ।

4.
नन्द के घर में नवनीत (मक्खन) की चोरी करते हुए, जो एक पैर से खड़े होकर नृत्य करते हैं, उनके गले की घंटी की तरह उनकी पायल की झंकार सुनाई देती है—उनका यह नृत्य दृश्य मंगलमय हो।

5.
जो अपने दांतों से अपनी माता के स्तनों को पकड़े रहते हैं, और अनवरत अपने पिता नंदबाबा के मुख को देखते हैं—उस मुरारी के बाल रूप की मधुर छवि मेरे मन में बसी रहे।

6.
मक्खन चुराने के लिए हाथ बढ़ाते हुए, जैसे ही माता यशोदा डांटने को आती हैं, श्रीकृष्ण भय से आंखें मूंद लेते हैं और वहीं रुक जाते हैं। वे बाल रूप में सबके रक्षक हैं, यही लीला उनकी महानता को दर्शाती है।

7.
मैं उस ब्रह्म (परमात्मा) की स्तुति करता हूँ, जो व्रज की स्त्रियों की ओर देखकर उनके हृदय को चुरा लेता है, जो मथुरा का सौभाग्य नहीं बन सका, और जो देवकी माता की गोद में स्तनपान करता हुआ बाल रूप में प्रकट हुआ।

8.
मैं उस बालक की स्मृति करता हूँ, जिसने अपने सिर को भय के कारण घुमाया और बालों से खेलते हुए हल्की सी मुस्कान दी—जो ऊखल खींचते हुए यमलार्जुन वृक्षों को गिरा देता है।

9.
वह बालक जो अब भी वेदों द्वारा खोजा जाता है, जिसने यमलार्जुन को गिराया, जिसे यमुना माता ने देखा और जिसने बचपन में ही अद्भुत लीलाएं कीं—वह मेरा रक्षक बने।

10.
वह कृपा की मूर्ति, जिसने हमें संसार बंधनों से मुक्ति दिलाने वाली नई राह दिखाई, जिसकी करुणा, कामना की तरह फैलती है—वह दयामयी भगवान मेरे मन में सदा निवास करें।

11.
जिसके बालों में मोरपंख सजे हैं, जिनका रूप मन को मोह लेता है, जो अपनी मधुर मुस्कान से मोहिनी भाव में भर देते हैं—वह करुणा की प्रतिमूर्ति मेरे मन में प्रकट हों।

12.
गोपियों को मोहित करने वाले वे जो बांसुरी बजाते हैं, उनके स्पर्श से जो मन को भाए, जिनकी दृष्टि से करुणा झलकती है—ऐसे श्रीकृष्ण की दृष्टि से मैं रक्षित रहूं।

13.
जो बांसुरी अपने अधरों पर रखते हैं, सिर पर मोरपंख धारण करते हैं और जिनकी काया मेघ जैसी नीली है—उनके दर्शन मेरे अंतिम समय में हों।

14.
मैं उस भगवान को नमन करता हूँ जो गोपियों के हृदय में बसे हैं, उनके आलिंगन से जो शोभित होते हैं, और जिनका रूप सौंदर्य की पराकाष्ठा है।

15.
उनकी चरणवंदना करता हूँ जिनकी बांसुरी गोपियों के कंगनों की झंकार से मेल खाती है, जिनका मुकुट अंजन की चमक जैसा है और जो सबसे प्रिय हैं।

16.
उनकी बांसुरी की मधुरता की जय हो, जो समस्त संसार के रक्षक हैं, जिनकी अँगुलियाँ गोपियों के हाथों के कंगनों के साथ संगीत में लयबद्ध होती हैं।

17.
उनकी शोभा अद्भुत है—कानों में बांसुरी, बालों में मोरपंख, गले में गुँजामाला, और हृदय में गोपियों के लिए प्रेम—ऐसे कौमार्य को चुराने वाले श्रीकृष्ण को नमस्कार।

18.
दक्षिण हाथ में लाठी, बाएं में गोपियों का आलिंगन, नील वर्ण, करुणा से भरे, जिनके बालों में गुँजा और मोरपंख हैं—वे मेरे रक्षक हों।

19.
गोपियों के साथ जलक्रीड़ा करते हुए, उनके पीछे दृष्टि डालते हुए, आंखों में शरारत और हाथ में जल की धार से खेलते वह व्रजपति मेरा जीवन बनें।

20.
सूर्यपुत्री यमुना के पास, गोपियों के वस्त्र चुराकर, हंसते हुए कुंद के वृक्ष पर बैठे, उनके आग्रह पर भी वस्त्र न लौटाते हुए, हाथ जोड़ने वाले वह श्यामसुंदर मेरी शरण लें।

21.
जो व्यक्ति इस स्तुति को पूर्ण भक्ति से पढ़ता है, वह उस भगवान श्रीकृष्ण के दर्शन पाता है, जो मधुर बांसुरी बजाते हैं और जिनके प्रति युवतियाँ आकृष्ट होती हैं।

गोपालविंशति स्तोत्रम् के लाभ (Benefits):

  1. भक्ति और प्रेम में वृद्धि: यह स्तोत्र भगवान श्रीकृष्ण के बालरूप की स्तुति करता है, जिससे मन में भक्ति, श्रद्धा और प्रेम बढ़ता है।
  2. मानसिक शांति: स्तोत्र का पाठ करने से चित्त शांत होता है और चिंताओं से मुक्ति मिलती है।
  3. कृष्ण कृपा: गोपाल अर्थात बालकृष्ण की कृपा प्राप्त होती है, जिससे जीवन में सकारात्मकता आती है।
  4. बाधाओं से मुक्ति: आध्यात्मिक रूप से यह स्तोत्र साधक की रक्षा करता है और जीवन की बाधाओं को दूर करता है।
  5. शुद्ध विचार और भाव: बाल गोपाल की लीलाओं का स्मरण करने से हृदय निर्मल होता है।

पाठ या जाप की विधि (Method of Chanting):

  1. स्नान आदि से शुद्ध होकर साफ वस्त्र पहनें।
  2. पूजा स्थान पर दीप जलाकर श्रीकृष्ण या बाल गोपाल की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें।
  3. एकाग्र मन से इस स्तोत्र का पाठ करें।
  4. कम से कम एक बार पूरा स्तोत्र अवश्य पढ़ें या सुनें।
  5. पाठ के बाद भगवान को तुलसी, मक्खन या मिश्री अर्पित करें।

पाठ / जाप का उचित समय (Best Time):

  • प्रातःकाल (सुबह 4 से 8 बजे के बीच) या
  • संध्याकाल (शाम 6 से 8 बजे के बीच)

👉 विशेष रूप से गुरुवार, श्रीकृष्ण जन्माष्टमी, या कृष्ण पक्ष के दिनों में यह स्तोत्र अत्यंत फलदायक होता है।

जप या पाठ की संख्या (Chant Count):

  • इस स्तोत्र में कुल 22 श्लोक हैं।
  • एक बार संपूर्ण स्तोत्र पढ़ना एक पाठ माना जाता है।
  • रोज़ एक बार या विशेष दिनों में 11, 21, या 108 बार पाठ करने से विशेष फल प्राप्त होता है।
  • यदि नियमित रूप से जप करना चाहें तो 21 दिनों तक प्रतिदिन 1 बार इसका पाठ करें।

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