हनुमान जी हिन्दू धर्म में शक्ति, बुद्धि और भक्ति के प्रतीक माने जाते हैं। उन्हें ‘रामदूत’ के रूप में विशेष रूप से पूजा जाता है। उनका स्मरण करने मात्र से भय, दुःख और बाधाओं का नाश होता है। यह श्लोक हनुमान जी की स्तुति का अत्यंत प्रभावशाली माध्यम है, जिसे साधक ध्यानपूर्वक जपते हैं।
श्लोक:
मनोजवं मारुततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम्। वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतम् शरणं प्रपद्ये।।
हिंदी में अर्थ (Meaning in Hindi):
मैं उन प्रभु हनुमान की शरण लेता हूँ, जिनकी गति मन के समान तीव्र है, जो वायु देवता के समान वेगवान हैं, जिन्होंने अपनी इंद्रियों को वश में कर लिया है, जो बुद्धिमानों में श्रेष्ठ हैं, वायुपुत्र हैं, वानरों के दल के प्रमुख हैं और श्रीराम के प्रिय सेवक हैं।
मुख्य विशेषताएँ (Main features):
- मनोजवं – जिनकी गति मन के समान तीव्र है।
- मारुततुल्यवेगं – वायु (मारुत) के समान तेज जिनका वेग है।
- जितेन्द्रियं – जिन्होंने अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण प्राप्त किया है।
- बुद्धिमतां वरिष्ठम् – अत्यंत बुद्धिमान और बुद्धिमानों में श्रेष्ठ।
- वातात्मजं – वायुदेव के पुत्र।
- वानरयूथमुख्यं – वानरों की सेना के प्रधान।
- श्रीरामदूतं – भगवान श्रीराम के प्रिय दूत।
- शरणं प्रपद्ये – मैं आपकी शरण लेता हूँ।
इस श्लोक का महत्व (The significance of this verse):
- यह श्लोक साधना और भक्ति के मार्ग में सहायक है।
- इसे नित्य जाप करने से डर, संकट और नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है।
- यह श्लोक हनुमान जी की स्तुति में अत्यंत प्रभावशाली माना गया है, विशेषकर मानसिक दृढ़ता और आत्मबल बढ़ाने में सहायक होता है।
- विद्यार्थियों, साधकों और हर रोज़ की जीवन चुनौतियों का सामना करने वालों के लिए यह एक आशीर्वाद की तरह कार्य करता है।


