नील सरस्वती स्तोत्र एक अत्यंत रहस्यमय, शक्तिशाली और तांत्रिक स्तोत्र है जो नीलसरस्वती देवी को समर्पित है। यह स्तोत्र विशेष रूप से ज्ञान, वाणी, और मानसिक शक्ति के विकास के लिए पढ़ा जाता है, और यह शत्रुनाशक, मोहविनाशक, और जड़ता (stagnation) को दूर करने वाला माना जाता है।
नील सरस्वती स्तोत्र का महत्व (Importance of Neel Saraswati Stotra:):
- यह स्तोत्र विशेषकर तांत्रिक, साधक, विद्यार्थी, और शत्रु बाधा से पीड़ित लोगों के लिए अत्यंत उपयोगी है।
- यह स्तोत्र देवी को “त्राहि मां शरणा गतम्” कहकर बार-बार शरणागत भाव से पुकारता है।
- हर श्लोक में भक्त यह प्रार्थना करता है कि हे माँ, मेरी रक्षा करो, मेरी जड़ता, पाप, मूढ़ता, भय आदि का नाश करो।
साधना लाभ (Benefits):
- शत्रु नाश – यदि कोई शत्रु बाधा, कोर्ट केस, या जलन/बुरे लोग हों, तो स्तोत्र लाभ देता है।
- बुद्धि और स्मृति में तीव्रता – विद्यार्थियों व विचारशील लोगों के लिए अत्यंत उपयोगी।
- भय और भ्रम से मुक्ति – मानसिक स्थिरता और स्पष्टता आती है।
- तांत्रिक बाधा से रक्षा – तंत्र-मंत्र या निगेटिव एनर्जी से सुरक्षा देता है।
- जप करने पर साधना सिद्धि – शास्त्रों में बताया गया है कि 6 माह तक नियमित पाठ करने से सिद्धि प्राप्त होती है।
कब और कैसे पढ़ें?(When and how to read?)
- समय: रात में (विशेषतः अमावस्या, अष्टमी, चतुर्दशी को), या ब्रह्म मुहूर्त में।
- स्थान: शांत स्थान, नीले या सफेद वस्त्र पहनकर, देवी की मूर्ति/चित्र के सामने।
- संख्या: प्रतिदिन कम से कम एक बार; तांत्रिक प्रयोगों में 11 या 21 बार।
- सावधानी: इस स्तोत्र में उग्र तत्व हैं, इसलिए अनादर न करें और श्रद्धा से पढ़ें।
नील सरस्वती स्तोत्र | Neel Saraswati Stotra
घोर रूपे महारावे सर्वशत्रु भयंकरि।
भक्तेभ्यो वरदे देवि त्राहि मां शरणा गतम्।।१।।
ॐ सुरासुरार्चिते देवि सिद्धगन्धर्वसेविते।
जाड्यपापहरे देवि त्राहि मां शरणा गतम्।।२।।
जटाजूटसमायुक्ते लोलजिह्वान्तकारिणि।
द्रुतबुद्धिकरे देवि त्राहि मां शरणा गतम्।।३।।
सौम्यक्रोधधरे रूपे चण्डरूपे नमोऽस्तु ते।
सृष्टिरूपे नमस्तुभ्यं त्राहि मां शरणा गतम्।।४।।
जडानां जडतां हन्ति भक्तानां भक्तवत्सला।
मूढ़तां हर मे देवि त्राहि मां शरणा गतम्।।५।।
वं ह्रूं ह्रूं कामये देवि बलिहोमप्रिये नम:।
उग्रतारे नमो नित्यं त्राहि मां शरणागतम्।।६।।
बुद्धिं देहि यशो देहि कवित्वं देहि देहि मे।
मूढत्वं च हरेद्देवि त्राहि मां शरणा गतम्।।७।।
इन्द्रा दिविलसद द्वन्द्ववन्दिते करुणा मयि।
तारे ताराधिनाथास्ये त्राहि मां शरणा गतम्।।८।।
अष्टभ्यां च चतुर्दश्यां नवम्यां य: पठेन्नर:।
षण्मासै: सिद्धिमा प्नोति नात्र कार्या विचारणा।।९।।
मोक्षार्थी लभते मोक्षं धनार्थी लभते धनम्।
विद्यार्थी लभते विद्यां विद्यां तर्क व्याकरणा दिकम्।।१०।।
इदं स्तोत्रं पठेद्यस्तु सततं श्रद्धयान्वित:।
तस्य शत्रु: क्षयं याति महा प्रज्ञा प्रजायते।।११।।
पीडायां वापि संग्रामे जाड्ये दाने तथा भये।
य इदं पठति स्तोत्रं शुभं तस्य न संशय:।।१२।।
इति प्रणम्य स्तुत्वा च योनि मुद्रां प्रदर्शयेत।।१३।।
।।इति नीलसरस्वतीस्तोत्रं सम्पूर्णम्।।


