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कनकधारा स्तोत्र (Kanakdhara stotra)

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कनकधारा स्तोत्र देवी लक्ष्मी को समर्पित एक महत्वपूर्ण स्तोत्र है, जिसे आदि शंकराचार्य ने लिखा। यह स्तोत्र देवी लक्ष्मी की विशेषताओं, जैसे उनकी सुंदरता और उदारता का बखान करता है, साथ ही धन और समृद्धि के लिए उनकी कृपा की प्रार्थना करता है।

इसका पाठ विशेषकर दिवाली, धनतेरस, और अक्षय तृतीया जैसे शुभ अवसरों पर करना फलदायी माना जाता है, लेकिन इसे किसी भी समय पढ़ा जा सकता है। इसके जाप से देवी लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है, जो आर्थिक समृद्धि और नकारात्मकता से रक्षा में सहायक है।

विधि

  1. स्नान और शुद्धता: स्नान कर शुद्ध होकर एकांत स्थान पर बैठें।
  2. माला जाप: एक माला का जाप करें, ध्यान केंद्रित करते हुए। यदि आप चाहे तो 21 या 108 या 1008 माला का भी जाप कर सकते हैं। लेकिन इसकी एक माला से ही लाभ होता है।
  3. समय: शुक्रवार को सुबह सूर्योदय के समय सबसे शुभ माना जाता है। लेकिन आप चाहें तो इसमें कोई भी दिन पढ़ सकते हैं।

लाभ

  • धन की कमी दूर करने में सहायक।
  • मानसिक शांति और समृद्धि का अनुभव।
  • नियमित जाप से सकारात्मक ऊर्जा का संचार।

कनकधारा स्तोत्र (Kanakdhara stotra):

अङ्गं हरेः पुलकभूषणमाश्रयन्ती
भृङ्गाङ्गनेव मुकुलाभरणं तमालम् ।
अङ्गीकृताखिलविभूतिरपाङ्गलीला
माङ्गल्यदास्तु मम मङ्गलदेवतायाः ॥१॥

अर्थ:

जैसे भ्रमरी (मधुमक्खी) अधखिले फूलों से सजे तमाल वृक्ष का आश्रय लेती है, वैसे ही भगवती महालक्ष्मी की दृष्टि, जो श्रीहरि के शरीर पर पड़े प्रकाश से संपूर्ण ऐश्वर्य को समेटे हुए है, मेरे लिए शुभ और मंगलदायी हो। यह श्रद्धा और भक्ति का भाव व्यक्त करता है, जो महालक्ष्मी की कृपा की कामना करता है।

मुग्धा मुहुर्विदधती वदने मुरारेः
प्रेमत्रपाप्रणिहितानि गतागतानि ।
माला दृशोर्मधुकरीव महोत्पले या
सा मे श्रियं दिशतु सागरसम्भवायाः ॥२॥

अर्थ:

जैसे भ्रमरी (मधुमक्खी) विशाल कमल के पत्तों के चारों ओर उड़ती रहती है, वैसे ही देवी लक्ष्मी की दृष्टि श्रीहरि (भगवान विष्णु) के मुखारविंद की ओर प्रेमपूर्वक जाती है, लेकिन लज्जा के कारण वापस लौट आती है। यह श्रद्धा और भक्ति का भाव व्यक्त करता है, जिसमें देवी लक्ष्मी की मनोहर और आकर्षक दृष्टि की कामना की जा रही है, जो व्यक्ति को धन और समृद्धि प्रदान करे।

विश्वामरेन्द्रपदविभ्रमदानदक्षम्_
आनन्दहेतुरधिकं मुरविद्विषोऽपि ।
ईषन्निषीदतु मयि क्षणमीक्षणार्धम्_
इन्दीवरोदरसहोदरमिन्दिरायाः ॥३॥

अर्थ:

देवी लक्ष्मी, जो इंद्र (देवताओं के स्वामी) को उनके पद का वैभव और विलास प्रदान करने में सक्षम हैं और भगवान विष्णु (जिन्हें मधुहंता नामक दैत्य का शत्रु माना गया है) को भी अधिक आनंद देने वाली हैं, उनके अर्ध खुले हुए नेत्रों की दृष्टि थोड़े समय के लिए मुझ पर पड़े।

आमीलिताक्षमधिगम्य मुदा मुकुन्दम्_
आनन्दकन्दमनिमेषमनङ्गतन्त्रम् ।
आकेकरस्थितकनीनिकपक्ष्मनेत्रं
भूत्यै भवेन्मम भुजङ्गशयाङ्गनायाः ॥४॥

श्रीमहालक्ष्मीजी के नेत्र, जो काम (प्रेम और आकर्षण) के वशीभूत होकर अर्धविकसित और एकटक होकर आनंद सत्चिदानंद (सच्चिदानंद, या आनंद में समाहित) भगवान को देखते हैं, और जब वे भगवान नारायण के निकट होते हैं, तो उनकी आँखें थोड़ी तिरछी हो जाती हैं। यह एक प्रार्थना है कि देवी लक्ष्मी के ऐसे नेत्र हमें धन और समृद्धि प्रदान करें।

बाह्वन्तरे मधुजितः श्रितकौस्तुभे या
हारावलीव हरिनीलमयी विभाति ।
कामप्रदा भगवतोऽपि कटाक्षमाला
कल्याणमावहतु मे कमलालयायाः ॥५॥

देवी लक्ष्मी, जो भगवान मधुसूदन (भगवान श्री कृष्ण) के कौस्तुभ मणि से सुशोभित वक्षस्थल पर इंद्रनीलमयी हार की तरह सजी हुई हैं और जो भगवान के मन में प्रेम का संचार करती हैं, वे कमल-कुंज में निवास करने वाली कमला (लक्ष्मी) की कटाक्ष (नज़र) से मेरा कल्याण करें। यह एक प्रार्थना है जिसमें देवी लक्ष्मी की कृपा से व्यक्ति के कल्याण की कामना की जा रही है।

कालाम्बुदालिललितोरसि कैटभारेर्_
धाराधरे स्फुरति या तडिदङ्गनेव ।
मातुः समस्तजगतां महनीयमूर्तिर्_
भद्राणि मे दिशतु भार्गवनन्दनायाः ॥६॥

जैसे मेघों के समूह में बिजली चमकती है, वैसे ही देवी लक्ष्मी भगवान विष्णु के काली मेघ पंक्ति के समान सुशोभित वक्षस्थल पर एक विद्युत के समान चमकती हैं। देवी लक्ष्मी ने अपने अविर्भाव से भृगुवंश (भृगु ऋषि का वंश) को आनंदित किया है और वे समस्त लोकों की जननी हैं। यह एक प्रार्थना है कि देवी लक्ष्मी का कल्याणकारी रूप मेरे ऊपर कृपा दृष्टि बनाए रखे।

प्राप्तं पदं प्रथमतः किल यत्प्रभावान्
माङ्गल्यभाजि मधुमाथिनि मन्मथेन ।
मय्यापतेत्तदिह मन्थरमीक्षणार्धं
मन्दालसं च मकरालयकन्यकायाः ॥७॥

देवी लक्ष्मी, जिन्हें समुद्रकन्या कमला कहा जाता है, की वह दृष्टि, जो मंद, आलसी, मंथर (धीमी) और अर्ध खोली हुई है, के प्रभाव से कामदेव (प्रेम के देवता) ने भगवान मधुसूदन के हृदय में पहली बार स्थान प्राप्त किया। यह प्रार्थना है कि देवी लक्ष्मी की यह विशेष दृष्टि मेरे ऊपर पड़े, जिससे मुझे भी प्रेम और कल्याण की अनुभूति हो।

दद्याद् दयानुपवनो द्रविणाम्बुधाराम्_
अस्मिन्नकिञ्चनविहङ्गशिशौ विषण्णे ।
दुष्कर्मघर्ममपनीय चिराय दूरं
नारायणप्रणयिनीनयनाम्बुवाहः ॥८॥

देवी लक्ष्मी का नेत्र रूपी मेघ, जो दया से प्रेरित है, दुष्कर्म (जो धन के आगमन में बाधा डालता है) को दूर कर दे। इसके अलावा, यह भी प्रार्थना की जा रही है कि जो विषाद (दुख) धर्मजन्य ताप से उत्पन्न होता है, उससे पीड़ित दीन (गरीब) चातक (एक प्रकार का पक्षी जो वर्षा के पानी के लिए तरसता है) पर धन के रूप में जलधारा की वर्षा करें।

इष्टा विशिष्टमतयोऽपि यया दयार्द्र_
दृष्ट्या त्रिविष्टपपदं सुलभं लभन्ते ।
दृष्टिः प्रहृष्टकमलोदरदीप्तिरिष्टां
पुष्टिं कृषीष्ट मम पुष्करविष्टरायाः ॥९॥

विशेष बुद्धिमान और योग्य व्यक्ति, जो देवी लक्ष्मी की दया दृष्टि के प्रभाव से स्वर्ग का सुख प्राप्त कर लेते हैं, उन देवी लक्ष्मी (जिन्हें पद्मासना कहा गया है) की विकसित कमल गर्भ के समान कान्तिमती (आकर्षक और सुंदर) दृष्टि मुझे भी इच्छित पुष्टि प्रदान करे।

गीर्देवतेति गरुडध्वजसुन्दरीति
शाकम्भरीति शशिशेखरवल्लभेति ।
सृष्टिस्थितिप्रलयकेलिषु संस्थितायै
तस्यै नमस्त्रिभुवनैकगुरोस्तरुण्यै ॥१०॥

माँ भगवती की विभिन्न अवतारों और भूमिकाओं का वर्णन किया गया है। सृष्टिक्रीड़ा (सृष्टि की प्रक्रिया) में वह वाग्देवता (ब्रह्मशक्ति) के रूप में होती हैं, पालनक्रीड़ा (पालन का कार्य) के समय लक्ष्मी के रूप में विष्णु की पत्नी होती हैं, और प्रलयक्रीड़ा (प्रलय का समय) में शाकम्भरी या पार्वती के रूप में विद्यमान होती हैं। अंत में, भक्त माता लक्ष्मी को नित्य यौवना प्रेमिका के रूप में मानते हुए उन्हें सम्पूर्ण श्रद्धा से नमस्कार करते हैं।

श्रुत्यै नमोऽस्तु शुभकर्मफलप्रसूत्यै
रत्यै नमोऽस्तु रमणीयगुणार्णवायै ।
शक्त्यै नमोऽस्तु शतपत्रनिकेतनायै
पुष्ट्यै नमोऽस्तु पुरुषोत्तमवल्लभायै ॥११॥

माँ लक्ष्मी की महिमा का वर्णन किया गया है। पहले चरण में उन्हें शुभ कर्मों का फल देने वाली श्रुति के रूप में प्रणाम किया जा रहा है। दूसरे चरण में रमणीय गुणों की रति के रूप में उन्हें नमस्कार किया जा रहा है, जो उनके सुन्दर और आकर्षक गुणों का प्रतीक है। फिर, कमलवन में निवास करने वाली शक्तिस्वरूपा लक्ष्मी को नमन किया जाता है, जो शक्ति और समृद्धि का प्रतीक है।

नमोऽस्तु नालीकनिभाननायै
नमोऽस्तु दुग्धोदधिजन्मभूत्यै ।
नमोऽस्तु सोमामृतसोदरायै
नमोऽस्तु नारायणवल्लभायै ॥१२॥

कमल वदना कमला को नमस्कार है। क्षीरसिंधु सभ्यता श्रीदेवी को नमस्कार है। चंद्रमा और सुधा की सगी बहन को नमस्कार है। भगवान नारायण की वल्लभा को नमस्कार है।

सम्पत्कराणि सकलेन्द्रियनन्दनानि
साम्राज्यदानविभवानि सरोरुहाक्षि ।
त्वद्वन्दनानि दुरिताहरणोद्यतानि
मामेव मातरनिशं कलयन्तु मान्ये ॥१३॥

कमल के समान नेत्रों वाली आदरणीय माँ! आपके चरणों में किए गए प्रणाम धन-सम्पत्ति प्रदान करने वाले, सभी इंद्रियों को सुख देने वाले, साम्राज्य देने में सक्षम और सभी पापों को नष्ट करने के लिए पूर्णतः तत्पर हैं, वे हमेशा मुझे ही सहारा दें। मुझे आपकी चरण वंदना का सौभाग्य सदा मिलता रहे।

यत्कटाक्षसमुपासनाविधिः
सेवकस्य सकलार्थसम्पदः ।
संतनोति वचनाङ्गमानसैस्_
त्वां मुरारिहृदयेश्वरीं भजे ॥१४॥

जिनके कृपा दृष्टि के माध्यम से की गई उपासना उपासक के सभी इच्छाओं और संपत्तियों का विकास करती है, मैं मन, वाणी और शरीर से श्रीहरि की प्रिय लक्ष्मी देवी का भजन करता हूँ।

सरसिजनिलये सरोजहस्ते
धवलतमांशुकगन्धमाल्यशोभे ।
भगवति हरिवल्लभे मनोज्ञे
त्रिभुवनभूतिकरि प्रसीद मह्यम् ॥१५॥

हे भगवती, नारायण की पत्नी, आप कमल के भीतर निवास करती हैं। आपके हाथों में नीलकमल चमक रहा है, और आप श्वेत वस्त्र, गंध, और मालाओं से सुसज्जित हैं। आपकी झांकी अत्यंत मनमोहक और अद्वितीय है। हे त्रिभुवन के ऐश्वर्य को प्रदान करने वाली, कृपया मुझ पर भी अपनी कृपा बरसाइए।

दिग्घस्तिभिः कनककुम्भमुखावसृष्ट_
स्वर्वाहिनीविमलचारुजलप्लुताङ्गीम् ।
प्रातर्नमामि जगतां जननीमशेष_
लोकाधिनाथगृहिणीममृताब्धिपुत्रीम् ॥१६॥

जिनके श्रीअंगों का अभिषेक दिग्गजों द्वारा स्वर्ण कलश से गिराए गए, आकाशगंगा के स्वच्छ और मनोहर जल से किया जाता है, वे समस्त लोकों के अधीश्वर भगवान विष्णु की पत्नी, समुद्र की कन्या (क्षीरसागर की पुत्री) और जगतजननी भगवती लक्ष्मी को मैं प्रातःकाल प्रणाम करता हूँ।

कमले कमलाक्षवल्लभे
त्वं करुणापूरतरङ्गितैरपाङ्गैः ।
अवलोकय मामकिञ्चनानां
प्रथमं पात्रमकृत्रिमं दयायाः ॥१७॥

कमल नेत्रों वाली केशव की सुंदर और आकर्षक प्रियतम कमले! मैं दीन-हीन लोगों में से एक हूं, इसलिए मैं तुम्हारी कृपा का स्वाभाविक पात्र हूं। तुम उमड़ती करुणा की बाढ़ के समान मेरी ओर कटाक्षों से देखो।

स्तुवन्ति ये स्तुतिभिरमूभिरन्वहं
त्रयीमयीं त्रिभुवनमातरं रमाम् ।
गुणाधिका गुरुतरभाग्यभागिनो
भवन्ति ते भुवि बुधभाविताशयाः ॥१८॥

जो लोग प्रतिदिन इन स्तुतियों के माध्यम से वेदत्रयी स्वरूपा, त्रिभुवन की माता भगवती लक्ष्मी की स्तुति करते हैं, वे इस पृथ्वी पर महान गुणों वाले और अत्यंत सौभाग्यशाली होते हैं। विद्वान लोग भी उनके मनोभावों को समझने के लिए उत्सुक रहते हैं।


– आदि शंकराचार्य कृत

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