हिंदू धर्म में प्रदक्षिणा (परिक्रमा) को केवल मंदिर के चारों ओर घूमना नहीं माना गया है, बल्कि यह आत्मिक शुद्धि, समर्पण और भक्ति का गहन साधन है। जब भक्त श्रद्धा से देवता या पवित्र स्थल की परिक्रमा करता है, तो वह अपने अहंकार, दोषों और नकारात्मक भावों को पीछे छोड़ते हुए ईश्वर के और निकट जाने का प्रयास करता है। इसी भाव को सशक्त बनाने के लिए परिक्रमा के समय विशेष मंत्रों का उच्चारण किया जाता है, जिन्हें प्रदक्षिणा मंत्र कहा जाता है।
ऐसा ही एक अत्यंत प्रसिद्ध और भावपूर्ण प्रदक्षिणा मंत्र है। यह मंत्र भक्त की उस विनम्र प्रार्थना को व्यक्त करता है, जिसमें वह ईश्वर से निवेदन करता है कि इस जन्म और पूर्व जन्मों में जाने-अनजाने किए गए सभी पाप, परिक्रमा के प्रत्येक कदम के साथ नष्ट होते जाएँ। यह मंत्र परिक्रमा को एक साधारण क्रिया से उठाकर आत्मिक शुद्धि और आध्यात्मिक उत्थान की दिव्य यात्रा बना देता है।
प्रदक्षिणा मंत्र (Parikrama Mantra)
श्लोक:
यानि कानि च पापानि जन्मान्तरकृतानि च।
तानि सर्वाणि नश्यन्तु प्रदक्षिणपदे पदे॥
सरल अर्थ (Simple meaning)
“हे प्रभु! इस जन्म में और पिछले जन्मों में मुझसे जो भी पाप जाने-अनजाने में हुए हैं,
वे सभी मेरी हर परिक्रमा के प्रत्येक कदम के साथ नष्ट हो जाएँ।”
महत्व (Importance)
- परिक्रमा को केवल शारीरिक क्रिया नहीं, बल्कि आंतरिक शुद्धि की साधना बनाता है
- मन को एकाग्र करता है और अहंकार को कम करता है
- भक्ति और समर्पण की भावना को गहरा करता है


