श्री स्तोत्र का उल्लेख प्राचीन ग्रंथों विष्णु पुराण और अग्नि पुराण में मिलता है। ऐसा कहा गया है कि महर्षि पुष्कर ने परशुराम जी को बताया था कि भगवान इन्द्र ने देवी लक्ष्मी को प्रसन्न करने और उन्हें इन्द्रलोक में स्थिर करने हेतु इस स्तोत्र का पाठ किया था। इस स्तोत्र के प्रभाव से देवी लक्ष्मी ने उन्हें अपना आशीर्वाद प्रदान किया और राज्य में सुख-समृद्धि, विजय और स्थिरता आई।
जो भी व्यक्ति इस स्तोत्र का श्रद्धापूर्वक पाठ या श्रवण करता है, उसे माता लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है। वह जीवन के समस्त भौतिक सुखों को प्राप्त कर अंततः मोक्ष की प्राप्ति भी कर सकता है।
श्री स्तोत्र न केवल धन की देवी लक्ष्मी को समर्पित है, बल्कि यह समस्त शुभ गुणों, दिव्यता और आध्यात्मिक उन्नति को भी संबोधित करता है। इसमें देवी को सिद्धि, श्रद्धा, मेधा, यज्ञविद्या, आत्मज्ञान, सौम्यता और पवित्रता की अधिष्ठात्री के रूप में वर्णित किया गया है।
श्री स्तोत्र
पुष्कर उवाच –
राज्यलक्ष्मीस्थिरत्वाय यथेन्द्रेण पुरा श्रियः ।
स्तुतिः कृता तथा राजा जयार्थं स्तुतिमाचरेत् ।।
इन्द्र उवाच –
नमस्ते सर्वलोकानां जननीमब्धिसम्भवाम् ।
श्रियमुन्निन्द्रपद्माक्षीं विष्णुवक्षःस्थलस्थिताम् ।।
त्वं सिद्धिस्त्वं स्वधा स्वाहा सुधा त्वं लोकपावनि ।
संध्या रात्रिः प्रभा भूतिर्मेधा श्रद्धा सरस्वती ।।
यज्ञविद्या महाविद्या गुह्यविद्या च शोभने ।
आत्मविद्या च देवि त्वं विमुक्तिफलदायिनी ।।
आन्वीक्षिकी त्रयी वार्ता दण्डनीतिस्त्वमेव च ।
सौम्या सौम्यं जगद्रूपं त्वयैतद्देवी पूरितम् ।।
का त्वन्या त्वामृते देवि सर्वयज्ञमयं वपुः ।
अध्यास्ते देवदेवस्य योगिचिन्त्यं गदाभृतः ।।
त्वया देवि परित्यक्तं सफलं भुवनत्रयम् ।
विनष्टप्रायमभवत्वयेदानीं समेधिताम् ।।
दाराः पुत्रस्तथाऽगारं सुहृद्धान्यधनादिकम् ।
भवत्येतन्महाभागे नित्यं त्वद्वीक्षणान्नॄणाम् ।।
शरीरारोग्यमैश्वर्यमरिपक्षक्षयः सुखम् ।
देवि त्वददृष्टिदृष्टानां पुरुषाणां न दुर्लभम् ।।
त्वमम्बा सर्वभूतानां देवदेवो हरिः पिता ।
त्वयैतद्विष्णुना चाम्ब जगद्व्याप्तं चराचरम् ।।
मानं कोषं तथा कोष्ठं मा गृहं मा परिच्छदम् ।
मा शरीरं कलत्रं च त्ययेथाः सर्वपावनि ।।
मा पुत्रान्मा सुहृद्वर्गान्मा पशुन्मा विभूषणम् ।
त्यजेथा मम देवस्य विष्णोर्वक्षःस्थलालये ।।
सत्येन समशौचाभ्यां तथा शिलादिभिर्गुणैः ।
त्यज्यन्ते नराः सद्यः सन्त्यक्ताः ये त्वयामले ।।
त्वयाऽवलोकिताः सद्यः शिलाद्यैरखिलैर्गुणैः ।
कुलैश्वर्यैश्च युज्यन्ते पुरुषा निर्गुणा अपि ।।
स श्लाघ्यः सगुणी धन्यः सकुलीनः स बुद्धिमान् ।
स शूरः स च विक्रान्तो यस्त्वया देवी वीक्षितः ।।
सद्योवैगुण्यमायान्ति शीलाद्याः सकला गुणाः ।
पराङ्गमुखी जगद्धात्री यस्य त्वं विष्णुवल्ल्भे ।।
न ते वर्णयितुं शक्ता गुणज्जिह्वाऽपि वेधसः ।
प्रसीद देवि पद्माक्षि नास्माम्स्त्याक्षीः कदाचन ।।
पुष्कर उवाच –
एवं स्तुता ददौ श्रीश्च वरमिन्द्राय चेप्सितम् ।
सुस्थिरत्वं च राज्यस्य सङ्ग्रामविजयादिकम् ।।
स्वस्तोत्रपाठश्रवणकर्तॄणां भुक्तिमुक्तिदम् ।
श्रीस्तोत्रं सततं तस्मात्पठेच्च शृणुयान्नरः ।।
।। इति श्री स्तोत्र सम्पूर्णम् ।।
श्री स्तोत्र का हिंदी अनुवाद
पुष्कर बोले –
जिस प्रकार इन्द्र ने राज्य में लक्ष्मी की स्थिरता के लिए पहले श्री की स्तुति की थी,
उसी प्रकार कोई भी राजा अपने विजय के लिए इस स्तोत्र का पाठ करे।
इन्द्र बोले –
हे समस्त लोकों की जननी, समुद्र से उत्पन्न होने वाली माता, आपको नमस्कार है।
आप कमल जैसी आंखों वाली हैं और भगवान विष्णु के वक्षस्थल पर विराजमान हैं।
आप सिद्धि हैं, स्वधा हैं, स्वाहा हैं, अमृत हैं और समस्त लोकों को पवित्र करने वाली हैं।
आप संध्या हैं, रात्रि हैं, प्रभा हैं, ऐश्वर्य हैं, मेधा हैं, श्रद्धा हैं और सरस्वती भी हैं।
आप यज्ञविद्या, महाविद्या, और गुप्त विद्याओं की अधिष्ठात्री हैं।
हे सुंदर देवी! आप आत्मज्ञान हैं और मोक्ष प्रदान करने वाली हैं।
आप ही तर्कशास्त्र (आन्वीक्षिकी), वेदत्रयी (ऋग्, यजुः, साम), वाणिज्यविद्या और राजनीति हैं।
हे सौम्यरूपा देवी! यह समस्त जगत आपका ही रूप है, आपसे ही यह भरा हुआ है।
हे देवी! आप को छोड़कर और कौन है जो देवों के देव, गदा धारण करने वाले भगवान विष्णु के
योगियों द्वारा चिन्तन योग्य शरीर में वास करती हैं?
हे देवी! आपके द्वारा त्यागे जाने पर तीनों लोक निष्फल हो जाते हैं,
और जब आप कृपा करती हैं, तब ही यह सब समृद्ध होता है।
हे महाभाग्यशालिनी! आपके दर्शन मात्र से मनुष्यों को पत्नी, पुत्र, गृह, मित्र, अन्न, धन आदि प्राप्त होते हैं।
हे देवी! जिन पुरुषों को आपका दर्शन होता है, उन्हें शरीर की आरोग्यता, ऐश्वर्य,
शत्रु-विनाश और सुख आसानी से प्राप्त होते हैं।
आप समस्त प्राणियों की माता हैं और भगवान हरि उनके पिता हैं।
आप और विष्णु जी से ही यह चराचर जगत व्याप्त है।
हे पावन देवी! कृपया न तो मेरा मान, खजाना, घर या वस्त्र छोड़ें,
और न ही मेरा शरीर और पत्नी त्यागें।
हे देवी! कृपया मेरे पुत्रों, मित्रों, पशुओं और आभूषणों को भी न त्यागें,
आप भगवान विष्णु के वक्षःस्थल में निवास करने वाली हैं।
जो पुरुष सत्य, पवित्रता और शील जैसे गुणों से युक्त होते हुए भी
आपके द्वारा त्याग दिए जाते हैं, वे तुरंत अपवित्र हो जाते हैं।
परंतु जिन पर आप कृपा दृष्टि करती हैं, वे बिना गुणों के भी
सभी सद्गुणों, कुलीनता और ऐश्वर्य से युक्त हो जाते हैं।
जो पुरुष आपके द्वारा दृष्ट हैं, वह गुणवान, धन्य, कुलीन, बुद्धिमान,
पराक्रमी और वीर होता है।
परंतु जिस पर आप रुष्ट हो जाती हैं, उसका शील, गुण आदि सब नष्ट हो जाते हैं,
हे जगद्धात्री! हे विष्णु प्रिय! वह पुरुष अधोगति को प्राप्त होता है।
आपके गुणों का वर्णन करने में ब्रह्मा जैसे देवताओं की जिह्वा भी असमर्थ है।
हे पद्माक्षि देवी! कृपया हम पर प्रसन्न हों, और हमें अपने दर्शनों से वंचित न करें।
पुष्कर बोले –
इसी प्रकार इन्द्र द्वारा स्तुति किए जाने पर श्रीदेवी ने उन्हें इच्छित वर प्रदान किया,
और राज्य की स्थिरता, संग्राम में विजय आदि फल दिए।
जो कोई इस स्तोत्र का पाठ और श्रवण करता है, उसे भोग और मोक्ष दोनों की प्राप्ति होती है।
इसलिए मनुष्य को इस श्रीस्तोत्र का नित्य पाठ या श्रवण करना चाहिए।
।। इस प्रकार श्री स्तोत्र पूर्ण हुआ ।।
श्री स्तोत्र के लाभ (Benefits of Shri Stotra):
- यह स्तोत्र धन, ऐश्वर्य, सुख, स्वास्थ्य, सफलता और समृद्धि प्रदान करता है।
- पारिवारिक शांति और संतोष की प्राप्ति होती है।
- राज्य, व्यापार या किसी भी कार्य में स्थिरता और विजय मिलती है।
- नित्य पाठ करने से आध्यात्मिक बल और भक्ति भावना में वृद्धि होती है।
- देवी लक्ष्मी की कृपा बनी रहती है और जीवन में सकारात्मकता का विकास होता है।
किन्हें श्री स्तोत्र का पाठ करना चाहिए (Who should recite Shri Stotra):
- जो व्यक्ति जीवन में धन, सौभाग्य और समृद्धि की कामना रखते हैं।
- जिन्हें अपने कार्यों में स्थायित्व और सफलता चाहिए।
- जो माता लक्ष्मी का विशेष आशीर्वाद प्राप्त करना चाहते हैं।


