
यह दिव्य श्लोक भगवान भगवान शिव की महान स्तुति रुद्राष्टकम का छठा भाग है, जिसकी रचना भक्त कवि गोस्वामी तुलसीदास ने की थी। यह स्तोत्र शिवजी के अनंत, निराकार और कल्याणकारी स्वरूप का अत्यंत सुंदर वर्णन करता है।
इस विशेष श्लोक में भगवान शिव को काल से परे, सृष्टि के संहारक, भक्तों को आनंद देने वाले और मोह (अज्ञान) को दूर करने वाले परम तत्व के रूप में प्रस्तुत किया गया है। इसमें शिव के उस रूप की स्तुति की गई है जो न केवल विनाश के देवता हैं, बल्कि चिदानंद (परम सुख और चेतना) के स्रोत भी हैं।
यह श्लोक भक्त के हृदय से निकली एक विनम्र प्रार्थना है, जिसमें वह बार-बार “प्रसीद प्रसीद प्रभो” कहकर भगवान शिव से कृपा की याचना करता है।
श्लोक (Shloka):
कलातीतकल्याण कल्पान्तकारी सदा सज्जनानन्ददाता पुरारी
चिदानन्दसंदोह मोहापहारी प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी
इस श्लोक का महत्व (Benefits)
यह श्लोक रुद्राष्टकम का अत्यंत प्रभावशाली भाग है, जिसमें भगवान शिव के परम दिव्य स्वरूप का वर्णन किया गया है। इसका जाप केवल स्तुति नहीं, बल्कि गहरी आध्यात्मिक साधना भी माना जाता है।
- मानसिक शांति और स्थिरता
इस श्लोक के नियमित जाप से मन शांत होता है और चिंता, तनाव तथा नकारात्मक विचार कम होते हैं। यह व्यक्ति को भीतर से मजबूत और संतुलित बनाता है। - अज्ञान और मोह का नाश
श्लोक में शिव को “मोहापहारी” कहा गया है, यानी जो भ्रम और अज्ञान को दूर करते हैं। इसका जाप करने से जीवन में स्पष्टता और सही निर्णय लेने की क्षमता बढ़ती है। - भगवान शिव की कृपा प्राप्ति
“प्रसीद प्रसीद प्रभो” जैसे शब्द इस श्लोक को एक सच्ची प्रार्थना बनाते हैं। श्रद्धा से इसका पाठ करने पर शिव कृपा प्राप्त होने की मान्यता है। - नकारात्मक शक्तियों से रक्षा
शिव को संहारक और रक्षक दोनों माना जाता है। इस श्लोक का जाप व्यक्ति को नकारात्मक ऊर्जा, भय और बाधाओं से बचाने में सहायक माना जाता है। - आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग
यह श्लोक “चिदानंद” (परम आनंद) की ओर ले जाने वाला है। नियमित जप से व्यक्ति ध्यान, भक्ति और आत्मज्ञान की ओर अग्रसर होता है। - जीवन में सुख और संतुलन
यह श्लोक सिखाता है कि सच्चा सुख बाहरी चीजों में नहीं, बल्कि भीतर की शांति और भगवान से जुड़ाव में है।


