उच्छिष्ट गणपति स्तोत्रम् भगवान श्री गणेश के एक विशिष्ट और रहस्यमय स्वरूप की स्तुति है। यह स्तोत्र श्रीरुद्रयामल तंत्र के हर-गौरी संवाद से प्राप्त हुआ है, जिसमें देवी पार्वती द्वारा भगवान गणेश की महिमा का वर्णन किया गया है। उच्छिष्ट गणपति वह रूप है जिसमें गणेशजी भक्तों के अत्यंत समीप माने जाते हैं और उनकी त्वरित कृपा के लिए प्रसिद्ध हैं।
इस स्तोत्र में भगवान गणेश के सौंदर्य, करुणा, बाल-लीलाओं, विघ्ननाशक शक्ति तथा सर्वसिद्धिदाता स्वरूप का भावपूर्ण चित्रण किया गया है। प्रत्येक श्लोक में गणपति की लीलाओं और दिव्य गुणों का स्मरण कर भक्त को शरणागति और विश्वास का मार्ग दिखाया गया है।
मान्यता है कि श्रद्धा, पवित्रता और एकाग्र चित्त से इस स्तोत्र का पाठ करने से दरिद्रता का नाश होता है, विघ्न दूर होते हैं और साधक को ऐश्वर्य, बुद्धि तथा सौभाग्य की प्राप्ति होती है। विशेष रूप से गणेश उपासना, साधना अथवा तांत्रिक परंपरा में इस स्तोत्र का महत्वपूर्ण स्थान है।
उच्छिष्ट गणपति स्तोत्रम् (Uchchiṣṭa Gaṇapati Stotram)
देव्युवाच ।
नमामि देवं सकलार्थदं तं
सुवर्णवर्णं भुजगोपवीतम् ।
गजाननं भास्करमेकदन्तं
लम्बोदरं वारिभवासनं च ॥ १ ॥
केयूरिणं हारकिरीटजुष्टं
चतुर्भुजं पाशवराभयानि ।
सृणिं च हस्तं गणपं त्रिनेत्रं
सचामरस्त्रीयुगलेन युक्तम् ॥ २ ॥
षडक्षरात्मानमनल्पभूषं
मुनीश्वरैर्भार्गवपूर्वकैश्च ।
संसेवितं देवमनाथकल्पं
रूपं मनोज्ञं शरणं प्रपद्ये ॥ ३ ॥
वेदान्तवेद्यं जगतामधीशं
देवादिवन्द्यं सुकृतैकगम्यम् ।
स्तम्बेरमास्यं ननु चन्द्रचूडं
विनायकं तं शरणं प्रपद्ये ॥ ४ ॥
भवाख्यदावानलदह्यमानं
भक्तं स्वकीयं परिषिञ्चते यः ।
गण्डस्रुताम्भोभिरनन्यतुल्यं
वन्दे गणेशं च तमोऽरिनेत्रम् ॥ ५ ॥
शिवस्य मौलाववलोक्य चन्द्रं
सुशुण्डया मुग्धतया स्वकीयम् ।
भग्नं विषाणं परिभाव्य चित्ते
आकृष्टचन्द्रो गणपोऽवतान्नः ॥ ६ ॥
पितुर्जटाजूटतटे सदैव
भागीरथी तत्र कुतूहलेन ।
विहर्तुकामः स महीध्रपुत्र्या
निवारितः पातु सदा गजास्यः ॥ ७ ॥
लम्बोदरो देवकुमारसङ्घैः
क्रीडन्कुमारं जितवान्निजेन ।
करेण चोत्तोल्य ननर्त रम्यं
दन्तावलास्यो भयतः स पायात् ॥ ८ ॥
आगत्य योच्चैर्हरिनाभिपद्मं
ददर्श तत्राशु करेण तच्च ।
उद्धर्तुमिच्छन्विधिवादवाक्यं
मुमोच भूत्वा चतुरो गणेशः ॥ ९ ॥
निरन्तरं संस्कृतदानपट्टे
लग्नां तु गुञ्जद्भ्रमरावलीं वै ।
तं श्रोत्रतालैरपसारयन्तं
स्मरेद्गजास्यं निजहृत्सरोजे ॥ १० ॥
विश्वेशमौलिस्थितजह्नुकन्या
जलं गृहीत्वा निजपुष्करेण ।
हरं सलीलं पितरं स्वकीयं
प्रपूजयन्हस्तिमुखः स पायात् ॥ ११ ॥
स्तम्बेरमास्यं घुसृणाङ्गरागं
सिन्दूरपूरारुणकान्तकुम्भम् ।
कुचन्दनाश्लिष्टकरं गणेशं
ध्यायेत्स्वचित्ते सकलेष्टदं तम् ॥ १२ ॥
स भीष्ममातुर्निजपुष्करेण
जलं समादाय कुचौ स्वमातुः ।
प्रक्षालयामास षडास्यपीतौ
स्वार्थं मुदेऽसौ कलभाननोऽस्तु ॥ १३ ॥
सिञ्चाम नागं शिशुभावमाप्तं
केनापि सत्कारणतो धरित्र्याम् ।
वक्तारमाद्यं नियमादिकानां
लोकैकवन्द्यं प्रणमामि विघ्नम् ॥ १४ ॥
आलिङ्गितं चारुरुचा मृगाक्ष्या
सम्भोगलोलं मदविह्वलाङ्गम् ।
विघ्नौघविध्वंसनसक्तमेकं
नमामि कान्तं द्विरदाननं तम् ॥ १५ ॥
हेरम्ब उद्यद्रविकोटिकान्तः
पञ्चाननेनापि विचुम्बितास्यः ।
मुनीन्सुरान्भक्तजनांश्च सर्वान्
स पातु रथ्यासु सदा गजास्यः ॥ १६ ॥
द्वैपायनोक्तानि स निश्चयेन
स्वदन्तकोट्या निखिलं लिखित्वा ।
दन्तं पुराणं शुभमिन्दुमौलिः
तपोभिरुग्रं मनसा स्मरामि ॥ १७ ॥
क्रीडातटान्ते जलधाविभास्ये
वेलाजले लम्बपतिः प्रभीतः ।
विचिन्त्य कस्येति सुरास्तदा तं
विश्वेश्वरं वाग्भिरभिष्टुवन्ति ॥ १८ ॥
वाचां निमित्तं स निमित्तमाद्यं
पदं त्रिलोक्यामददत्स्तुतीनाम् ।
सर्वैश्च वन्द्यं न च तस्य वन्द्यः
स्थाणोः परं रूपमसौ स पायात् ॥ १९ ॥
इमां स्तुतिं यः पठतीह भक्त्या
समाहितप्रीतिरतीव शुद्धः ।
संसेव्यते चेन्दिरया नितान्तं
दारिद्र्यसङ्घं स विदारयेन्नः ॥ २० ॥
इति श्रीरुद्रयामलतन्त्रे हरगौरीसंवादे उच्छिष्टगणेशस्तोत्रं समाप्तम् ।
उच्छिष्ट गणपति स्तोत्रम् के लाभ
- विघ्नों का नाश
इस स्तोत्र के नियमित पाठ से जीवन में आने वाली बाधाएँ, अकारण रुकावटें और मानसिक उलझनें दूर होती हैं। - संतान-सुख की प्राप्ति
श्रद्धा और नियमपूर्वक पाठ करने से संतान संबंधी कष्ट, विलंब और चिंताएँ शांत होती हैं। यह संतान-कामना रखने वालों के लिए विशेष फलदायी माना गया है। - दरिद्रता का निवारण
स्तोत्र में स्वयं दरिद्रता-नाश का फल बताया गया है। इसके पाठ से आर्थिक संकट, ऋण और अभाव धीरे-धीरे समाप्त होते हैं। - त्वरित फलदायक साधना
उच्छिष्ट गणपति शीघ्र प्रसन्न होने वाले देवता माने जाते हैं, इसलिए यह स्तोत्र अल्प समय में प्रभाव दिखाता है। - बुद्धि और विवेक की वृद्धि
विद्यार्थियों और निर्णय लेने वाले कार्यों में लगे लोगों के लिए यह स्तोत्र बुद्धि, एकाग्रता और स्मरण-शक्ति बढ़ाता है। - गृहस्थ जीवन में सुख-शांति
पारिवारिक कलह, तनाव और अशांति में कमी आती है तथा घर का वातावरण सकारात्मक बनता है। - तांत्रिक और साधनात्मक सिद्धि में सहायक
तांत्रिक मार्ग में रुचि रखने वाले साधकों के लिए यह स्तोत्र विशेष रूप से सिद्धिदायक माना गया है। - भक्ति और आत्मबल की वृद्धि
नियमित पाठ से मन में श्रद्धा, आत्मविश्वास और ईश्वर पर अटूट विश्वास बढ़ता है।


