
स्वर्गलोक में दो सुंदर अप्सराएँ रहती थीं — तारा और रुक्मन।
दोनों बहनें थीं — एक धर्मपरायण और दूसरी चंचल स्वभाव की। तारा को भगवान की भक्ति, मंदिर-दर्शन और तप का बड़ा शौक था; जबकि रुक्मन भोग-विलास और आनंदमयी जीवन की इच्छुक थी।
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देवलोक से पृथ्वी पर आगमन
एक दिन उनके नृत्य से प्रसन्न होकर देवराज इंद्र ने दोनों से कहा कि वे जो चाहे वर माँग सकती हैं।
तब दोनों ने कहा — “हे देवेश! हम कुछ समय के लिए पृथ्वी-लोक पर भ्रमण करना चाहती हैं।”
इंद्रदेव ने अनुमति दे दी।
पृथ्वी-लोक में धर्म और भोग का मार्ग

धरती पर आने के बाद तारा ने मंदिरों के दर्शन, तीर्थ-स्नान और पूजा-पाठ का निश्चय किया।
रुक्मन भी साथ चली गई, पर उसका मन मौज-मस्ती और विलासिता में अधिक लगा।
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एक दिन तारा ने कहा —
“बहन! आज हम दोनों एकादशी-व्रत करेंगे। यह भगवान विष्णु को प्रसन्न करने वाला महान व्रत है।”
रुक्मन ने भी सहमति दे दी। तारा व्रत की तैयारी में लग गई और रुक्मन फलों-फूलों को लेने चली गई।
प्रलोभन और पतन
जहाँ वह फल ले रही थी, वहीं पास में मछली का मांस पक रहा था।
उसकी सुगंध से रुक्मन का मन विचलित हो गया।
वह बहुत कोशिश करती रही कि खुद को रोके, पर अंततः वह मछली खा बैठी।
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जब वह तारा के पास लौटी, तो उसके मुख से गंध आने लगी।
तारा ने पूछताछ की, तो रुक्मन ने डरते-डरते सब स्वीकार कर लिया।
श्राप और पछतावा

यह सुनकर तारा अत्यंत क्रोधित हुई और बोली —
“तुमने एकादशी-व्रत का अपमान किया है।
तुमने कीट-भक्षी जीवों जैसा आचरण किया है।
अतः मैं तुम्हें श्राप देती हूँ कि तुम एक छिपकली बन जाओ!”
श्राप सुनते ही रुक्मन छिपकली बन गई।
तारा को तुरंत अपने क्रोध पर पछतावा हुआ। उसने भगवान से प्रार्थना की कि उसकी बहन को मुक्ति मिले।
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तपस्या और पुनर्जन्म
छिपकली-रूप में रुक्मन ऋषि गौरेक (या गौरक) के आश्रम पहुँची।
वहाँ भक्ति, यज्ञ और भजन-कीर्तन का वातावरण देखकर उसके मन में पश्चाताप उत्पन्न हुआ।
वह पेड़ पर बैठकर दिन-रात भजन सुनती और प्रार्थना करती रहती थी।
प्राण-बलिदान
एक दिन आश्रम में भंडारा चल रहा था।
एक दुष्ट शिष्य ने क्रोधवश कheer में एक मरा हुआ साँप डाल दिया।
यह दृश्य ऊपर बैठी छिपकली (रुक्मन) ने देख लिया।
सभी ऋषियों को बचाने के लिए उसने बिना सोचे-समझे गरम-गरम खीर में छलांग लगाकर अपने प्राण त्याग दिए।
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जब ऋषियों ने यह देखा, तो उन्होंने दिव्य दृष्टि से जाना कि यह वही छिपकली है जिसे तारा ने श्राप दिया था।
🌼 मुक्ति और आशीर्वाद
ऋषि गौरेक ने कहा —
“इसने अपने प्राणों की आहुति दूसरों की रक्षा के लिए दी है।
यह अपने श्राप से मुक्त होकर अगले जन्म में मनुष्य-रूप प्राप्त करेगी।”
इस प्रकार तारा की बहन रुक्मन को अपने कर्मों और बलिदान से मोक्ष प्राप्त हुआ।
इस कथा का संदेश
यह कथा हमें सिखाती है कि —
- व्रत और पूजा का अपमान करना पाप है।
- क्रोध में दिया गया श्राप भी कभी-कभी पछतावे का कारण बनता है।
- पश्चाताप और भक्ति से कोई भी जीव मुक्ति पा सकता है।
- छिपकली को देख कर “नारायण” कहना शुभ माना जाता है — क्योंकि वह तारा की बहन रुक्मन की याद दिलाती है जिसने प्राण देकर ऋषियों की रक्षा की थी।
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