हिंदू धर्म में वृक्षों की पूजा का विशेष महत्व है, क्योंकि इन्हें जीवन, ऊर्जा और ईश्वर की उपस्थिति का प्रतीक माना गया है।
इनमें से सबसे पवित्र और पूजनीय वृक्ष है पीपल (अश्वत्थ) — जिसे स्वयं त्रिदेवों का निवास स्थान कहा गया है।
शास्त्रों में वर्णित है कि पीपल के मूल में भगवान ब्रह्मा, छाल में भगवान विष्णु और शाखाओं में भगवान शंकर (शिव) का वास है।
इस कारण यह वृक्ष “वृक्षराज” कहलाता है — अर्थात् वृक्षों का राजा।
‘पिप्पल स्तुति’ एक पवित्र स्तोत्र है जिसमें पीपल वृक्ष को प्रणाम कर उसके दिव्य स्वरूप की वंदना की जाती है।
इस स्तुति का पाठ करने से व्यक्ति के पाप नष्ट होते हैं, जीवन में शुभता, स्वास्थ्य और सौभाग्य की प्राप्ति होती है।
पीपल की पूजा न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि वैज्ञानिक रूप से भी यह वातावरण में प्राणवायु (ऑक्सीजन) बढ़ाता है और सकारात्मक ऊर्जा फैलाता है।
इसलिए कहा गया है —
“जहाँ पीपल है, वहाँ देवताओं का वास है।”
पिप्पलस्तुति (Pippal Stuti)
अश्वत्थ हुतभुग्वास गोविन्दस्य गदाप्रिय।
अशोकं हर मे पापं वृक्षराज! नमोऽस्तु ते॥ १॥
मूले ब्रह्मा त्वचि विष्णुः शाखायां शंकर एव च।
पत्रे पत्रे सर्वदेवा वासुदेवाय ते नमः॥ २॥
हिन्दी अर्थ:
(१)
हे अश्वत्थ (पीपल) वृक्ष! तुम अग्निदेव का निवास स्थान हो,
भगवान गोविन्द (विष्णु) को अत्यंत प्रिय हो।
हे वृक्षराज! मेरे सारे पापों को दूर करो,
तुम्हें नमस्कार है।
(२)
तेरी जड़ में भगवान ब्रह्मा का वास है,
तेरी छाल में भगवान विष्णु निवास करते हैं,
और तेरी शाखाओं में भगवान शंकर (शिव) का निवास है।
तेरे प्रत्येक पत्ते में सभी देवता विराजमान हैं —
हे वासुदेव रूपी वृक्षराज! तुझे बार-बार नमस्कार है।


