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श्री देवी खड्गमाला स्तोत्रम् (Devi Khadgamala Stotram)

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“श्री शुद्ध शक्ति माला महा मन्त्र” जिसे देवी खड्गमाला स्तोत्र भी कहा जाता है, श्रीविद्या साधना का अत्यंत गूढ़ और दिव्य स्तोत्र है। यह श्री ललिता त्रिपुरसुंदरी के नवावरण — अर्थात् श्रीचक्र के नौ मंडलों — में स्थित देवी शक्तियों की स्तुति है। प्रत्येक शक्ति दिव्य सामर्थ्य, ज्ञान और सिद्धि की अधिष्ठात्री मानी जाती है।

इस स्तोत्र में साधक क्रमशः देवी के रूपों, शक्तियों, और आंतरिक ऊर्जा केंद्रों का आवाहन करता है। यह केवल एक प्रार्थना नहीं, बल्कि आध्यात्मिक आरोहण की साधना है, जो साधक को अंतःकरण की शुद्धि, आत्मबल, और परमचैतन्य से जोड़ती है।

यह खड्गमाला स्तोत्र देवी के खड्ग (ज्ञान) और माला (भक्ति) का संगम है — जो अज्ञान को नष्ट कर ज्ञान का प्रकाश फैलाता है। इसे “सर्वसिद्धिदायिनी विद्या” कहा गया है, क्योंकि इसका स्मरण मात्र भी सभी प्रकार के भय, रोग, और संकटों से रक्षा करता है।

जो साधक नित्य श्रद्धा से इसका पाठ करता है, वह देवी की कृपा से राजसत्ता, धन, सौभाग्य, और मोक्ष — चारों पुरुषार्थ प्राप्त करता है।
यह स्तोत्र ललिता महामहेश्वरी की कृपा का दिव्य मार्ग है, जहाँ भक्त का हर श्वास “जय श्रीमाताजी” का जप बन जाता है।

श्री देवी खड्गमाला स्तोत्रम् (Devi Khadgamala Stotram)

प्रार्थना ।
ह्रीङ्कारासनगर्भितानलशिखां सौः क्लीं कलां बिभ्रतीं
सौवर्णाम्बरधारिणीं वरसुधाधौतां त्रिणेत्रोज्ज्वलाम् ।
वन्दे पुस्तकपाशमङ्कुशधरां स्रग्भूषितामुज्ज्वलां
त्वां गौरीं त्रिपुरां परात्परकलां श्रीचक्रसञ्चारिणीम् ॥

अस्य श्रीशुद्धशक्तिमालामहामन्त्रस्य, उपस्थेन्द्रियाधिष्ठायी वरुणादित्य ऋषिः, दैवी गायत्री छन्दः, सात्त्विक ककारभट्टारकपीठस्थित कामेश्वराङ्कनिलया महाकामेश्वरी श्री ललिता भट्टारिका देवता, ऐं बीजं क्लीं शक्तिः सौः कीलकं मम
खड्गसिद्ध्यर्थे सर्वाभीष्टसिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः ।
मूलमन्त्रेण षडङ्गन्यासं कुर्यात् ॥

ध्यानम् ।
आरक्ताभां त्रिनेत्रामरुणिमवसनां रत्नताटङ्करम्यां ।
हस्ताम्भोजैस्सपाशाङ्कुशमदन धनुस्सायकैर्विस्फुरन्तीम् ।
आपीनोत्तुङ्गवक्षोरुहकलशलुठत्तारहारोज्ज्वलाङ्गीं ।
ध्यायेदम्भोरुहस्थामरुणिमवसनामीश्वरीमीश्वराणाम् ॥

लमित्यादि पञ्च पूजां कुर्यात्, यथाशक्ति मूलमन्त्रं जपेत् ।

लं – पृथिवीतत्त्वात्मिकायै श्रीललितात्रिपुरसुन्दरी पराभट्टारिकायै गन्धं
परिकल्पयामि – नमः
हं – आकाशतत्त्वात्मिकायै श्रीललितात्रिपुरसुन्दरी पराभट्टारिकायै पुष्पं
परिकल्पयामि – नमः
यं – वायुतत्त्वात्मिकायै श्रीललितात्रिपुरसुन्दरी पराभट्टारिकायै धूपं
परिकल्पयामि – नमः
रं – तेजस्तत्त्वात्मिकायै श्रीललितात्रिपुरसुन्दरी पराभट्टारिकायै दीपं
परिकल्पयामि – नमः
वं – अमृततत्त्वात्मिकायै श्रीललितात्रिपुरसुन्दरी पराभट्टारिकायै
अमृतनैवेद्यं परिकल्पयामि – नमः
सं – सर्वतत्त्वात्मिकायै श्रीललितात्रिपुरसुन्दरी पराभट्टारिकायै
ताम्बूलादिसर्वोपचारान् परिकल्पयामि – नमः

(श्रीदेवी सम्बोधनं-१)
ओं ऐं ह्रीं श्रीं ऐं क्लीं सौः ओं नमस्त्रिपुरसुन्दरि ।

(न्यासाङ्गदेवताः-६)
हृदयदेवि, शिरोदेवि, शिखादेवि, कवचदेवि, नेत्रदेवि, अस्त्रदेवि,

(तिथिनित्यादेवताः-१६)
कामेश्वरी, भगमालिनि, नित्यक्लिन्ने, भेरुण्डे, वह्निवासिनि, महावज्रेश्वरी, शिवदूति, त्वरिते, कुलसुन्दरि, नित्ये, नीलपताके, विजये, सर्वमङ्गले, ज्वालामालिनि, चित्रे, महानित्ये,

(दिव्यौघगुरवः-७)
परमेश्वरपरमेश्वरी, मित्रेशमयि, षष्ठीशमयि, उड्डीशमयि, चर्यानाथमयि, लोपामुद्रामयि, अगस्त्यमयि,

(सिद्धौघगुरवः-४)
कालतापनमयि, धर्माचार्यमयि, मुक्तकेशीश्वरमयि, दीपकलानाथमयि,

(मानवौघगुरवः-८)
विष्णुदेवमयि, प्रभाकरदेवमयि, तेजोदेवमयि, मनोजदेवमयि, कल्याणदेवमयि, वासुदेवमयि, रत्नदेवमयि, श्रीरामानन्दमयि,

(श्रीचक्र प्रथमावरणदेवताः-३०)
अणिमासिद्धे, लघिमासिद्धे, [गरिमासिद्धे], महिमासिद्धे, ईशित्वसिद्धे, वशित्वसिद्धे, प्राकाम्यसिद्धे, भुक्तिसिद्धे, इच्छासिद्धे, प्राप्तिसिद्धे, सर्वकामसिद्धे, ब्राह्मि, माहेश्वरी, कौमारि, वैष्णवि, वाराहि, माहेन्द्रि, चामुण्डे, महालक्ष्मि, सर्वसङ्क्षोभिणी, सर्वविद्राविणी, सर्वाकर्षिणी, सर्ववशङ्करि, सर्वोन्मादिनि, सर्वमहाङ्कुशे, सर्वखेचरि, सर्वबीजे, सर्वयोने, सर्वत्रिखण्डे, त्रैलोक्यमोहनचक्रस्वामिनि, प्रकटयोगिनि,

(श्रीचक्र द्वितीयावरणदेवताः-१८)
कामाकर्षिणि, बुद्ध्याकर्षिणि, अहङ्काराकर्षिणि, शब्दाकर्षिणि, स्पर्शाकर्षिणि, रूपाकर्षिणि, रसाकर्षिणि, गन्धाकर्षिणि, चित्ताकर्षिणि, धैर्याकर्षिणि, स्मृत्याकर्षिणि, नामाकर्षिणि, बीजाकर्षिणि, आत्माकर्षिणि, अमृताकर्षिणि, शरीराकर्षिणि, सर्वाशापरिपूरकचक्रस्वामिनि, गुप्तयोगिनि,

(श्रीचक्र तृतीयावरणदेवताः-१०)
अनङ्गकुसुमे, अनङ्गमेखले, अनङ्गमदने, अनङ्गमदनातुरे, अनङ्गरेखे, अनङ्गवेगिनि, अनङ्गाङ्कुशे, अनङ्गमालिनि, सर्वसङ्क्षोभणचक्रस्वामिनि, गुप्ततरयोगिनि,

(श्रीचक्र चतुर्थावरणदेवताः-१६)
सर्वसङ्क्षोभिणि, सर्वविद्राविणि, सर्वाकर्षिणि, सर्वह्लादिनि, सर्वसम्मोहिनि, सर्वस्तम्भिनि, सर्वजृम्भिणि, सर्ववशङ्करि, सर्वरञ्जनि, सर्वोन्मादिनि, सर्वार्थसाधिके, सर्वसम्पत्तिपूरणि, सर्वमन्त्रमयि, सर्वद्वन्द्वक्षयङ्करि, सर्वसौभाग्यदायकचक्रस्वामिनि, सम्प्रदाययोगिनि,

(श्रीचक्र पञ्चमावरणदेवताः-१२)
सर्वसिद्धिप्रदे, सर्वसम्पत्प्रदे, सर्वप्रियङ्करि, सर्वमङ्गलकारिणि, सर्वकामप्रदे, सर्वदुःखविमोचनि, सर्वमृत्युप्रशमनि, सर्वविघ्ननिवारिणि, सर्वाङ्गसुन्दरि,
सर्वसौभाग्यदायिनि, सर्वार्थसाधकचक्रस्वामिनि, कुलोत्तीर्णयोगिनि,

(श्रीचक्र षष्ठावरणदेवताः-१२)
सर्वज्ञे, सर्वशक्ते, सर्वैश्वर्यप्रदायिनि, सर्वज्ञानमयि, सर्वव्याधिविनाशिनि, सर्वाधारस्वरूपे, सर्वपापहरे, सर्वानन्दमयि, सर्वरक्षास्वरूपिणि, सर्वेप्सितफलप्रदे, सर्वरक्षाकरचक्रस्वामिनि, निगर्भयोगिनि,

(श्रीचक्र सप्तमावरणदेवताः-१०)
वशिनि, कामेश्वरी, मोदिनि, विमले, अरुणे, जयिनि, सर्वेश्वरि, कौलिनि, सर्वरोगहरचक्रस्वामिनि, रहस्ययोगिनि,

(श्रीचक्र अष्टमावरणदेवताः-९)
बाणिनि, चापिनि, पाशिनि, अङ्कुशिनि, महाकामेश्वरि, महावज्रेश्वरि, महाभगमालिनि, सर्वसिद्धिप्रदचक्रस्वामिनि, अतिरहस्ययोगिनि,

(श्रीचक्र नवमावरणदेवताः-३)
श्रीश्रीमहाभट्टारिके, सर्वानन्दमयचक्रस्वामिनि, परापररहस्ययोगिनि,

(नवचक्रेश्वरी नामानि-९)
त्रिपुरे, त्रिपुरेशि, त्रिपुरसुन्दरि, त्रिपुरवासिनि, त्रिपुराश्रीः, त्रिपुरमालिनि, त्रिपुरासिद्धे, त्रिपुराम्ब, महात्रिपुरसुन्दरि,

(श्रीदेवी विशेषणानि, नमस्कारनवाक्षरी च-९)
महामहेश्वरी, महामहाराज्ञि, महामहाशक्ते, महामहागुप्ते, महामहाज्ञप्ते, महामहानन्दे, महामहास्कन्धे, महामहाशये, महामहा श्रीचक्रनगरसाम्राज्ञि नमस्ते नमस्ते नमस्ते नमः ।

फलश्रुतिः ।
एषा विद्या महासिद्धिदायिनी स्मृतिमात्रतः ।
अग्निवातमहाक्षोभे राजाराष्ट्रस्य विप्लवे ॥

लुण्ठने तस्करभये सङ्ग्रामे सलिलप्लवे ।
समुद्रयानविक्षोभे भूतप्रेतादिके भये ॥

अपस्मारज्वरव्याधि-मृत्युक्षामादिजे भये ।
शाकिनी पूतनायक्षरक्षःकूश्माण्डजे भये ॥

मित्रभेदे ग्रहभये व्यसनेष्वाभिचारिके ।
अन्येष्वपि च दोषेषु मालामन्त्रं स्मरेन्नरः ॥

सर्वोपद्रवनिर्मुक्त्स्साक्षाच्छिवमयोभवेत् ।
आपत्काले नित्यपूजां विस्तारात्कर्तुमारभेत् ॥

एकवारं जपध्यानम् सर्वपूजाफलं लभेत् ।
नवावरणदेवीनां ललिताया महौजसः ॥

एकत्रगणनारूपो वेदवेदाङ्गगोचरः ।
सर्वागमरहस्यार्थः स्मरणात्पापनाशिनी ॥

ललिताया महेशान्या माला विद्यामहीयसी ।
नरवश्यं नरेन्द्राणां वश्यं नारीवशङ्करम् ॥

अणिमादिगुणैश्वर्यं रञ्जनं पापभञ्जनम् ।
तत्तदावरणस्थायि देवताबृन्दमन्त्रकम् ॥

मालामन्त्रं परं गुह्यं परंधाम प्रकीर्तितम् ।
शक्तिमाला पञ्चधा स्याच्छिवमाला च तादृशी ॥

तस्माद्गोप्यतराद्गोप्यं रहस्यं भुक्तिमुक्तिदम् ॥

इति श्रीवामकेश्वरतन्त्रे उमामहेश्वरसंवादे श्री देवीखड्गमालास्तोत्ररत्नम् ।

पाठ के लाभ (Benefits of Recitation)

  1. सर्वसिद्धिदायिनी — इस मन्त्र का नित्य जप साधक को ज्ञान, बल, वैभव, सौभाग्य, और आध्यात्मिक सिद्धियाँ प्रदान करता है।
  2. भय और बाधा से रक्षा — किसी भी संकट, शत्रु, रोग, या नकारात्मक ऊर्जा से सुरक्षा प्रदान करता है।
  3. आत्मशुद्धि और शक्ति जागरण — यह साधक के शरीर में स्थित सूक्ष्म चक्रों को जाग्रत कर ऊर्जा प्रवाह को संतुलित करता है।
  4. गृह-शांति और समृद्धि — घर में सौभाग्य, सुख, शांति और देवी का वास होता है।
  5. आध्यात्मिक उत्थान — साधक धीरे-धीरे श्रीविद्या के उच्च रहस्यों की ओर अग्रसर होता है और आत्मसाक्षात्कार की दिशा में प्रगति करता है।
  6. संकट मुक्ति और विजय — देवी के खड्ग के समान यह स्तोत्र नकारात्मक कर्मों और अज्ञान को नष्ट करता है, जिससे जीवन में विजय और सफलता आती है।
  7. स्मरण मात्र से पुण्य — ग्रंथ में कहा गया है कि केवल इसका नाम लेने से ही पुण्य प्राप्त होता है, और इसका एक बार जप करने से नित्यपूजन का फल मिलता है।

पाठ की विधि (Vidhi of Recitation)

  1. स्थान व समय
    • स्वच्छ स्थान पर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें।
    • भोर के समय या संध्याकाल में पाठ श्रेष्ठ माना गया है।
  2. आसन और पूजन
    • लाल या पीले वस्त्र धारण करें।
    • आसन पर कुशा या लाल कपड़ा बिछाएँ।
    • श्री ललिता त्रिपुरसुंदरी की प्रतिमा या श्रीचक्र के सामने दीप जलाएँ।
  3. आवश्यक सामग्री
    • लाल पुष्प, चंदन, दीपक, धूप, और नैवेद्य (मिठाई या फल)।
    • श्रीचक्र या ललिता की तस्वीर/प्रतिमा पूजन हेतु रखें।
  4. प्रारम्भिक जप
    • पहले “ॐ ऐं ह्रीं श्रीं” का 9 या 27 बार जप करें।
    • फिर ललिता देवी का ध्यान करें — “सिन्दूरारुणविग्राहां त्रिनेत्रां…”
  5. मूल स्तोत्र का पाठ
    • श्रद्धा और शुद्ध उच्चारण के साथ सम्पूर्ण “श्री शुद्ध शक्ति माला महा मन्त्र” या “देवी खड्गमाला स्तोत्र” का पाठ करें।
    • पाठ के अंत में “ललिता त्रिपुरसुंदरी पराभट्टारिकायै नमः” कहकर प्रार्थना करें।
  6. समापन विधि
    • आरती या “जय जय श्रीमाताजी” का संकीर्तन करें।
    • फल के रूप में देवी से केवल “भक्ति और विवेक” की याचना करें।

विशेष निर्देश

  • नारी-पुरुष दोनों इसे कर सकते हैं, किन्तु पवित्रता और श्रद्धा आवश्यक है।
  • किसी गुरु के निर्देशन में करने से इसका प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है।
  • यदि नित्य पाठ न कर सकें, तो पूर्णिमा, शुक्रवार या नवरात्रि में इसका पाठ अवश्य करें।
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