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सिंगौरगढ़ किला – वीरता, रोमांच और इतिहास का अद्भुत संगम (Singorgarh Fort – A wonderful amalgamation of valor, adventure and history)

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मध्य प्रदेश के दमोह ज़िले के घने जंगलों और पहाड़ियों के बीच स्थित सिंगौरगढ़ किला सिर्फ पत्थरों की दीवारों और खंडहरों का ढांचा नहीं, बल्कि यह वीरता, संघर्ष और गौरव की अमर कहानी है। यहाँ की हवा में अब भी तलवारों की टकराहट की गूंज और रणभूमि की धूल की महक महसूस होती है। इस किले की लोकेशन इतनी रणनीतिक है कि चारों तरफ पहाड़ और जंगल इसे प्राकृतिक दुर्ग का रूप देते हैं। प्राचीन जलाशय, विशाल द्वार, गुप्त मार्ग, और रानी दुर्गावती से जुड़ी कहानियाँ इसे भारत के ऐतिहासिक खजानों में खास स्थान देती हैं। यहाँ आने वाला हर यात्री खुद को मानो अतीत के युद्धक्षेत्र में पाता है—जहाँ कभी घोड़ों की टापें गूंजती थीं, रणभेरी बजती थी, और वीर योद्धा मातृभूमि की रक्षा के लिए अंतिम सांस तक लड़े थे।

कुण्डलपुर जैन मंदिर, दमोह

सिंगौरगढ़ किला का इतिहास (History of Singorgarh Fort)

damoh fort

सिंगौरगढ़ का इतिहास कई शताब्दियों पुराना है और यह अलग-अलग राजवंशों के उत्थान-पतन का साक्षी रहा है। प्रारंभिक दौर में किले की नींव 14वीं शताब्दी में प्रतिहार राजपूतों ने रखी थी। उस समय इसे “गजसिंह दुर्ग” कहा जाता था। किले की मजबूत दीवारें और ऊँची पहाड़ी पर इसकी स्थिति इसे दुश्मनों के लिए लगभग अभेद्य बनाती थी। 15वीं सदी में गोंड शासक संग्राम शाह ने इस किले पर अधिकार किया और इसे गढ़ा-कटंगा राज्य का एक अहम गढ़ बनाया। इस दौर में किले का विस्तार हुआ और यहाँ नए महल, चौक, और सुरक्षा द्वार बनाए गए। दालपत शाह और रानी दुर्गावती ने इस किले में कई वर्ष निवास किया। 1564 में जब मुगल सेनापति आसफ़ खान ने आक्रमण किया, तब रानी दुर्गावती ने अद्वितीय साहस और नेतृत्व का परिचय दिया। युद्ध में किले को भारी क्षति पहुँची, लेकिन रानी की वीरता की गाथा अमर हो गई। यह किला उस समय न केवल एक सैन्य अड्डा था, बल्कि गढ़ा-कटंगा राज्य के सांस्कृतिक और प्रशासनिक केंद्र के रूप में भी जाना जाता था। यहाँ से आसपास के गांवों, व्यापार मार्गों और जंगलों पर नज़र रखी जाती थी।

श्री जागेश्वरनाथ शिव मंदिर, बांदकपुर

सिंगौरगढ़ किला की वास्तुकला (Architecture of Singorgarh Fort)

सिंगौरगढ़ किले की वास्तुकला में शक्ति और सौंदर्य का अद्भुत मेल देखने को मिलता है। यह किला एक पहाड़ी के ऊपर स्थित है, जिसके चारों ओर घना जंगल है। यह प्राकृतिक सुरक्षा कवच इसे युद्धकाल में बेहद सुरक्षित बनाता था। किले की दीवारें विशाल पत्थरों से बनी हैं, जो समय के थपेड़ों को झेलते हुए आज भी मजबूती से खड़ी हैं। हाथी द्वार जैसे विशाल प्रवेशद्वार इसकी भव्यता को और बढ़ाते हैं। रानी महल, सैनिक चौक, और प्रशासनिक कक्ष अब खंडहर रूप में हैं, लेकिन उनकी बनावट और पत्थरों की नक्काशी आज भी आकर्षित करती है। किले में एक बड़ा प्राचीन जलाशय है, जो वर्षा जल को संचित करने की अनोखी तकनीक पर आधारित है। यह जलाशय पूरे साल पानी से भरा रहता था, जिससे लंबे समय तक घेराबंदी झेलना संभव होता था। किले में कई गुप्त रास्ते और सुरंगें बनाई गई थीं, जिनका उपयोग आपात स्थिति में भागने, संदेश पहुंचाने या अचानक हमला करने के लिए किया जाता था। इसमें राजपूत और गोंड स्थापत्य का मिश्रण देखने को मिलता है—मजबूत किलेबंदी, मेहराबदार दरवाजे, और स्थानीय पत्थरों से बनी मोटी दीवारें इसकी खास पहचान हैं।

Bharat Kup Chitrakoot. Click to read more

देखने लायक चीज़ें (Things to see)

रानी महल के अवशेष, हाथी द्वार, प्राचीन जलाशय, गुप्त सुरंगें, पहाड़ी से दिखने वाले प्राकृतिक नज़ारे और आसपास का वन्यजीव (तेंदुआ, भेड़िया, लकड़बग्घा और पक्षी)।

Sphatik Shila Chitrakoot Satna. Click here to read more

क्या खास है यहाँ (What is special here)

रानी दुर्गावती की वीरता से जुड़ी ऐतिहासिक कहानियाँ, प्राकृतिक और मानव निर्मित सुरक्षा का अद्वितीय संगम, गुप्त मार्ग और जल संरक्षण तकनीक, वीरता, रणनीति और संस्कृति का जीवंत प्रमाण।

Kalinjar Fort Banda. Click to read more

विशेषताएं (Properties)

ऐतिहासिक महत्व, अनोखी वास्तुकला, जंगल और पहाड़ियों से घिरा वातावरण, एडवेंचर और हेरिटेज टूरिज्म का बेहतरीन संगम।

खुलने और बंद होने का समय (Opening and closing hours)

सुबह 7:00 बजे से शाम तक। मानसून या विशेष परिस्थितियों में प्रवेश सीमित हो सकता है।

Ganesh Bagh Chitrakoot. Click to read more

एंट्री टिकट (Entry Ticket)

कोई आधिकारिक शुल्क निर्धारित नहीं है, लेकिन यह वन क्षेत्र में आता है, इसलिए प्रवेश के लिए फॉरेस्ट विभाग की अनुमति आवश्यक हो सकती है।

कैसे जाएं (How to reach)

हवाई मार्ग से निकटतम एयरपोर्ट जबलपुर (लगभग 65 किमी), रेल मार्ग से निकटतम रेलवे स्टेशन दमोह (लगभग 75 किमी) और सड़क मार्ग से दमोह व जबलपुर से टैक्सी या निजी वाहन द्वारा पहुँचा जा सकता है। अंतिम 6-10 किमी जंगल का कच्चा रास्ता है।

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कब जाएं (Best time to visit)

अक्टूबर से अप्रैल का समय सबसे अच्छा है। बरसात में जाने से बचें—रास्ते कीचड़ और पानी से भर सकते हैं।

पता (Address)

सिंगरंपुर गांव, दमोह ज़िला, मध्य प्रदेश, पिन – 470881

सिंगोरगढ़ किले की तस्वीरें (Images of Singorgarh Fort)

सिंगौरगढ़ किले के पास घूमने लायक जगहें (Places to visit near Singorgarh Fort)

1. नोहटा (Nohata) का जैन मंदिर

  • यह जैन धर्म का प्रमुख स्थल है, जहाँ सुंदर और प्राचीन जैन मंदिर बने हुए हैं।
  • यह सिंगौरगढ़ किले से लगभग 20-22 किमी दूर है।

2. रतनगढ़ माता मंदिर (Ratangarh Mata Temple)

  • पहाड़ी पर स्थित यह माता का प्राचीन मंदिर आस्था और प्राकृतिक सुंदरता का संगम है।
  • यहाँ से आसपास के जंगल और घाटी का दृश्य बेहद मनमोहक दिखाई देता है।
  • यह किले से लगभग 25-30 किमी की दूरी पर है।

3. बांदकपुर का जागेश्वरनाथ शिव मंदिर (Jageshwarnath Shiva Temple of Bandakpur)

  • यह बुंदेलखंड का प्रसिद्ध शिव मंदिर है, जहाँ एक स्वयंभू शिवलिंग स्थित है।
  • मंदिर के ठीक सामने माँ पार्वती का मंदिर भी है।
  • सिंगौरगढ़ से दूरी लगभग 30-35 किमी।

4. कुंडलपुर जैन तीर्थ (Kundalpur Jain Shrine)

  • यह दमोह का सबसे बड़ा जैन तीर्थ है, जिसे “बड़े बाबा मंदिर” भी कहा जाता है।
  • यहाँ 63 भव्य जैन मंदिर बने हैं और यह पहाड़ी पर बसा हुआ स्थल बेहद शांत और दिव्य है।
  • सिंगौरगढ़ से दूरी लगभग 40-45 किमी।

5. घुघरा झरना (Ghughra Waterfall)

  • यह प्राकृतिक झरना दमोह शहर से करीब 3-4 किमी की दूरी पर है।
  • यहाँ बरसात के मौसम में ज्यादा सुंदरता देखने को मिलती है।
  • सिंगौरगढ़ से यह लगभग 20-25 किमी की दूरी पर पड़ता है।

6. खेरमाई मंदिर, दमोह (Khermai Temple, Damoh)

  • दमोह शहर का प्रसिद्ध मंदिर, जिसे बड़ी खेरमाई माता के नाम से जाना जाता है।
  • धार्मिक महत्व के साथ-साथ यहाँ का वातावरण भी आकर्षक है।
  • सिंगौरगढ़ से दूरी लगभग 25 किमी।

7. तेंदूखेड़ा कस्बा और आसपास के मंदिर (Tendukheda town and nearby temples)

  • तेंदूखेड़ा क्षेत्र में भी कुछ छोटे-छोटे प्राचीन मंदिर और प्राकृतिक स्थल हैं।
  • यह सिंगौरगढ़ किले से करीब 20 किमी दूर है।

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