श्रीमद्भगवद्गीता, सनातन धर्म का ऐसा अमूल्य ग्रंथ है जिसे स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कुरुक्षेत्र के युद्धभूमि में उपदेश रूप में प्रदान किया। यह केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि जीवन के हर पहलू को दिशा देने वाला एक शाश्वत ज्ञान-स्रोत है। इसमें 700 श्लोकों के माध्यम से धर्म, कर्म, भक्ति, ज्ञान और मोक्ष की गहराई से व्याख्या की गई है।
लेकिन व्यस्त जीवनशैली और समय की कमी के कारण, सभी श्लोकों का अध्ययन और पाठ करना हमेशा संभव नहीं हो पाता। इसी को ध्यान में रखते हुए गीता से सात सर्वाधिक सारगर्भित और शक्तिशाली श्लोकों का चयन किया गया है, जिन्हें “सप्तश्लोकी गीता” कहा जाता है। यह सात श्लोक गीता के मूल तात्त्विक सन्देश को संक्षेप में समेटे हुए हैं, और इन्हें नियमित रूप से पढ़ने से व्यक्ति आध्यात्मिक रूप से समृद्ध होता है।
सप्तश्लोकी गीता स्तोत्र
Saptashloki Gita Stotra
ॐ इत्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन् मामनुस्मरन् ।
यः प्रयाति त्यजन् देहं स याति परमान् गतिम् ।। 1
स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या
जगत्प्रहृष्यत्यनुरज्यते च ।
रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति
सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसंघाः ।। 2
सर्वतः पाणिपादं तत् सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् ।
सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ।। 3
कविं पुराणमनुशासितारं
अणोरणीयांसमनुस्मरेद्यः ।
सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूपं
आदित्यवर्णं तमसः परस्तात् ।। 4
ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम् ।
छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित् ।। 5
सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो
मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च ।
वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो
वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम् ।। 6
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु ।
मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः ।। 7
।। इति सप्तश्लोकी गीता स्तोत्र सम्पूर्णम् ।।
सप्तश्लोकी गीता स्तोत्र हिंदी अनुवाद (Saptashloki Geeta Stotra Hindi translation)
ॐ इत्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन् मामनुस्मरन् ।
यः प्रयाति त्यजन् देहं स याति परमान् गतिम् ।। 1
अनुवाद:
जो व्यक्ति “ॐ” इस एक अक्षर ब्रह्म का उच्चारण करता हुआ और मेरा स्मरण करता हुआ शरीर त्याग करता है, वह परम गती (मोक्ष) को प्राप्त होता है।
स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या
जगत्प्रहृष्यत्यनुरज्यते च ।
रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति
सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसंघाः ।। 2
अनुवाद:
हे हृषीकेश! आपके यश का गुणगान उचित ही है, जिससे यह सम्पूर्ण जगत् हर्षित होता है और आपमें अनुरक्त होता है। भयभीत राक्षस सभी दिशाओं में भाग जाते हैं और सिद्धों की मंडली आपको नमस्कार करती है।
सर्वतः पाणिपादं तत् सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् ।
सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ।। 3
अनुवाद:
उस परमात्मा के हाथ-पैर सर्वत्र हैं, आँखें, सिर और मुख सब ओर हैं। इस संसार में उसके कान सब जगह हैं और वह सब कुछ ढँक कर स्थित है।
कविं पुराणमनुशासितारं
अणोरणीयांसमनुस्मरेद्यः ।
सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूपं
आदित्यवर्णं तमसः परस्तात् ।। 4
अनुवाद:
जो परमात्मा कवि (सर्वज्ञ), सनातन, समस्त का शासक, अणु से भी सूक्ष्म, समस्त का धारणकर्ता, अचिंत्यरूप वाला, सूर्य के समान तेजस्वी तथा अंधकार से परे है— उस परमात्मा को जो स्मरण करता है…
ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम् ।
छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित् ।। 5
अनुवाद:
जिस अश्वत्थ (पीपल) वृक्ष को ऊपर मूल और नीचे शाखाएँ वाला कहा गया है, और वेद जिसके पत्ते हैं— जो उसे जानता है, वही वेद का ज्ञाता कहलाता है।
सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो
मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च ।
वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो
वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम् ।। 6
अनुवाद:
मैं सभी प्राणियों के हृदय में स्थित हूँ, मुझसे ही स्मृति, ज्ञान और भ्रांति होती है। समस्त वेदों से मैं ही जानने योग्य हूँ; मैं ही वेदांत का कर्ता और वेदों का ज्ञाता हूँ।
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु ।
मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः ।। 7
अनुवाद:
मुझमें मन लगाने वाला बन, मेरा भक्त बन, मेरी पूजा कर और मुझे नमस्कार कर। इस प्रकार अपने मन को मुझमें लगाकर, तू निश्चय ही मुझको प्राप्त होगा।
।। इति सप्तश्लोकी गीता स्तोत्र सम्पूर्णम् ।।
सप्तश्लोकी गीता पाठ के लाभ (Benefits of reciting Saptashloki Geeta):
- यह स्तोत्र आत्मा की शुद्धि और मोक्ष की ओर ले जाने वाला माध्यम है।
- इसका नित्य पाठ मानसिक तनाव और चिंता को दूर करता है।
- जीवन की उलझनों और कठिनाइयों में मार्गदर्शन और शांति प्रदान करता है।
- नकारात्मकता, भय और भ्रम की स्थिति से उबारने में सहायक है।
किन्हें इसका पाठ करना चाहिए (Who should read it):
- वे लोग जो जीवन में बार-बार अस्थिरता, भ्रम या निर्णयहीनता का अनुभव कर रहे हों।
- जो भक्त गीता के सार को संक्षिप्त रूप में दैनिक जीवन में उतारना चाहते हैं।
- विद्यार्थी, गृहस्थ, संन्यासी – हर कोई इससे लाभान्वित हो सकता है।


