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श्रीकृष्ण केशादिपदम वर्णमा स्तोत्रं (Srikrishna Keshadipadam Varnana Stotram)

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“श्रीकृष्ण की शादीपाद-वर्णन स्तोत्रम्” एक दिव्य स्तोत्र है जिसमें भगवान श्रीकृष्ण के स्वरूप की “केश से लेकर चरणों तक” अत्यंत सुंदर और भक्तिपूर्ण वर्णना की गई है। यह स्तोत्र श्रीकृष्ण के रूप, सौंदर्य, माधुर्य और करुणा का ऐसा अद्भुत चित्र प्रस्तुत करता है, जो भक्त के मन को मंत्रमुग्ध कर देता है।

इस स्तोत्र में प्रत्येक श्लोक भगवान के शरीर के एक-एक अंग का वर्णन करता है — सिर पर सुशोभित मोरपंखमुकुट से लेकर कमनीय चरणों तक। उनके नेत्रों की करुणा, अधरों की मुस्कान, वंशी की मधुरता, कंठ की शोभा, पीताम्बर की छवि और चरणों की दिव्यता इस स्तोत्र में अत्यंत काव्यमय और आध्यात्मिक शैली में वर्णित है।

यह स्तोत्र न केवल भक्तों को श्रीकृष्ण के सौंदर्य में डुबो देता है, बल्कि उन्हें प्रभु के प्रेम, करुणा और दिव्यता से भी जोड़ता है। इसका पाठ भक्त के हृदय में भक्ति की गहराई को बढ़ाता है और मन को शांत एवं निर्मल बनाता है।

श्रीकृष्ण केशादिपदम वर्णमा स्तोत्रं (Srikrishna Keshadipadam Varnana Stotram)

अग्रे पश्यामि तेजो निबिडतरकलायावलीलोभनीयं,
पीयूषाप्लावितोऽहं तदनु तदुदरे दिव्यकैशोरवेषम् ।
तारुण्यारम्भरम्यं परमसुखरसास्वादरोमाञ्चिताङ्गै,
रावीतं नारदाद्यैर्विलसदुपनिषद्सुन्दरीमण्डलैश्च ॥ १ ॥

नीलाभं कुञ्चिताग्रं घनममलतरं संयतं चारुभङ्ग्या,
रत्नोत्तंसाभिरामं वलयितमुदयच्चन्द्रकैः पिञ्छजालैः ।
मन्दारस्रङ्निवीतं तव पृथुकबरीभारमालोकयेऽहं,
स्निग्द्धश्वेतोर्ध्वपुण्ड्रामपि च सुललितां फालबालेन्दुवीथीम् ॥ २ ॥

हृद्यं पूर्णानुकंपार्णवमृदुलहरी चञ्चलभ्रूविलासैः,
आनीलस्निग्द्धपक्ष्मावलि परिलसितं नेत्रयुग्मं विभो ते ।
सान्द्रच्छायं विशालारुणकमलदलाकारमामुग्धतारं,
कारुण्यालोकलीला शिशिरितभुवनं क्षिप्यतां मय्यनाथे ॥ ३ ॥

उत्तुङ्गोल्लासिनासं हरिमणिमुकुरप्रोल्लसद्गण्डपाली,
व्यालोलत्कर्णपाशाञ्चितमकरमणी कुण्डलद्वन्द्वदीप्रम् ।
उन्मीलद्दन्तपङ्क्तिः स्फुरदरुणतरच्छाय बिम्बाधरान्तः,
प्रीतिप्रस्यन्दिमन्दस्मितमधुरतरं वक्त्रमुद्भासतां मे ॥ ४ ॥

बाहुद्वन्द्वेन रत्नाङ्गुलिवलयभृता शोणपाणिप्रवाले,
नोपात्तां वेणुनालीं प्रसृतनखमयूखाङ्गुलीसङ्गशाराम् ।
कृत्वा वक्त्रारविन्दे सुमधुरविकसद्रागमुद्भाव्यमानैः,
शब्दब्रह्मामृतैस्त्वं शिशिरितभुवनैः सिञ्च मे कर्णवीथीम् ॥ ५ ॥

उत्सर्पत्कौस्तुभश्रीततिभिररुणितं कोमलं कण्ठदेशं,
वक्षः श्रीवत्सरम्यं तरलतरसमुद्दीप्तहारप्रतानम् ।
नानावर्णप्रसूनावलिकिसलयिनीं वन्यमालां विलोल,
ल्लोलम्बां लम्बमानामुरसि तव तथा भावये रत्नमालाम् ॥ ६ ॥

अंगे पंचांगरागैरतिशयविकसत्सौरभाकृष्टलोकं,
लीनानेकत्रिलोकीविततिमपि कृशां बिभ्रतं मध्यवल्लीम् ।
शक्राश्मन्यस्त तप्तोज्ज्वलकनकनिभं पीतचेलं दधानं,
ध्यायामो दीप्तरश्मि स्फुटमणिरशनाकिङ्किणी मण्डितं त्वाम् ॥ ७ ॥

ऊरू चारू तवोरू घनमसृणरुचौ चित्तचोरौ रमायाः,
विश्वक्षोभं विशङ्क्य ध्रुवमनिशमुभौ पीतचेलावृताङ्गौ ।
आनम्राणां पुरस्तान्न्यसनधृतस्मस्तार्थपालीसमुद्ग,
च्छायं जानुद्वयं च क्रमपृथुलमनोज्ञे च जङ्घे निषेवे ॥ ८ ॥

मञ्जीरं मञ्जुनादैरिव पदभजनं श्रेय इत्यालपन्तं,
पादाग्रं भ्रान्तिमज्जत् प्रणतजनमनोमन्दरोद्धारकूर्मम् ।
उत्तुङ्गाताम्रराजन्नखरहिमकरज्योत्स्नया चाश्रितानाम्,
संताप ध्वान्तहन्त्रीं ततिमनुकलये मङ्गलामङ्गुलीनाम् ॥ ९ ॥

योगीन्द्राणां त्वदङ्गेष्वधिकसुमधुरं मुक्तिभाजां निवासो,
भाक्तानां कामवर्षद्युतरुकिसलयं नाथ ते पादमूलम् ।
नित्यं चित्तस्थितं मे पवनपुरपते कृष्ण कारुण्यसिन्धो,
हृत्वा निश्शेषतापान् प्रदिशतु परमानन्दसन्दोहलक्ष्मीम् ॥ १० ॥

॥ इति श्रीकृष्ण की शादीपाद-वर्णन स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥

श्रीकृष्ण की शादीपाद-वर्णन स्तोत्रम्
हिंदी अनुवाद (Shaadipad-description stotram of Shri Krishna
hindi translation
)

मैं सामने एक ऐसा प्रकाश देख रहा हूँ जो सघन नीले कमल के समान आकर्षक है।
उसके बाद मैं उस रूप को देख रहा हूँ जिसमें दिव्य किशोर अवस्था की शोभा है।
वह तारुण्य की आरंभिक रमणीयता लिए हुए है, जिससे रोमांच उठ रहा है।
उस दिव्य स्वरूप की स्तुति नारद आदि ऋषि और सुंदर उपनिषदों की देवियाँ कर रही हैं। ॥१॥

हे कृष्ण! मैं तुम्हारे नीले रंग के, सुंदरता से लहराते, सघन, स्वच्छ, और कलात्मक रूप से व्यवस्थित बालों को देखता हूँ।
उसमें रत्नजटित मुकुट, चंद्र के समान कलाएं, और सुंदर मोरपंख लगे हैं।
मंदार पुष्पों की माला उसमें गूंथी हुई है और सिर पर घनी जटाओं का भार है।
तिलक की सफेदी और माथे पर अर्धचंद्र जैसी सुंदर रेखा भी दिखाई दे रही है। ॥२॥

हे प्रभु! आपकी भौंहों के खेल से लहराती हुई करुणा की तरंगें मन को हरने वाली हैं।
गहरे नीले और कोमल पलकों से सजे हुए आपके नेत्र सुंदरता से चमक रहे हैं।
वे नेत्र गहरे रंग के, बड़े और अरुण कमल की पंखुड़ियों जैसे हैं — अत्यंत मोहक।
उनकी करुणामयी दृष्टि से यह समस्त संसार शीतल हो जाए और मैं भी, जो निराश हूं, उसकी कृपा पाऊँ। ॥३॥

आपकी उन्नत नाक, हरित रत्न के दर्पण जैसी चमकती गालों की रेखा को और सुंदर बनाती है।
आपके कानों में मकराकार रत्नों से जड़े झुमके हैं जो हिलते हुए प्रकाश फैला रहे हैं।
आपके होंठों पर मंद हँसी खेल रही है, दाँतों की पंक्ति झलक रही है, जो अत्यंत मधुर है।
वह मुख कमल समान, सौंदर्य और आनंद से भरपूर, मुझे दर्शन दे। ॥४॥

आपके दो भुजाओं में रत्नजटित अंगूठियां और कंगन हैं, जो रक्तवर्ण हथेलियों को सजाते हैं।
उनसे पकड़ी हुई बांसुरी की ध्वनि, आपके मुखकमल से प्रकट होती है।
उस मधुर स्वर और राग से उत्पन्न शब्दरूपी अमृत से, जो पूरे संसार को शीतलता देता है,
मेरे कानों की नाड़ियों को भी आप सिंचित करें। ॥५॥

आपके गले में कौस्तुभ मणि की आभा है, जिससे वह कोमल कंठभाग अरुण हो गया है।
वक्षस्थल पर श्रीवत्स की शोभा है और उसमें झिलमिलाती हुई हारमालाएँ हैं।
वनमालाएँ रंगबिरंगे पुष्पों से बनी हैं जो आपकी छाती पर लहराती हुई लटकी हैं।
उन्हीं के साथ मैं आपकी छाती पर झूलती रत्नमालाओं का ध्यान करता हूँ। ॥६॥

आपके अंगों पर पाँच प्रकार के चंदन, अगर, कुंकुम आदि से बनी सुगंधित अंगराग है,
जिसकी सुगंध से सारा संसार आकर्षित हो रहा है।
आप पतली कमर के साथ तीनों लोकों को समेटे हुए हैं।
आपने चमकते पीतवर्ण वस्त्र धारण किए हैं और रत्नों से जड़ी करधनी तथा घुंघरू धारण किए हैं। ॥७॥

आपकी सुंदर जाँघें घनी, चिकनी और रमणीय हैं, जो माता लक्ष्मी का भी मन चुरा लेती हैं।
वे संसार को आंदोलित करने वाली हैं, इसलिए आपने उन्हें पीताम्बर से ढँक रखा है।
विनम्र भक्तों के सामने हाथ फैलाकर दान देने हेतु, आपके घुटनों की छाया भी कल्याणकारी है।
आपकी जंघाएँ क्रमशः मोटी और अत्यंत मनोहर हैं, मैं उनका भी सेवन करता हूँ। ॥८॥

आपके चरणों में मञ्जीर हैं, जो मधुर ध्वनि करते हैं — मानो कह रहे हों कि चरणसेवा ही परम कल्याण है।
आपके चरणों की अग्रभाग पर स्थित नखों की ज्योति ब्रह्मांड की अंधकार को दूर करती है।
वे चरण ही उन भक्तों के मन को संभालते हैं जो संसार की भ्रम-जाल में डूबे हुए हैं।
उनकी किरणें ताप और अंधकार का नाश करती हैं, मैं उन शुभ अँगुलियों की रेखाओं का ध्यान करता हूँ। ॥९॥

हे योगेश्वर! तुम्हारा शरीर योगियों के लिए मधुरता से भरा हुआ है और मुक्तिप्राप्त जनों का वह निवास है।
भक्तों के लिए वह कामना पूर्ति करने वाला कल्पवृक्ष है — हे नाथ! तुम्हारे चरणों की शरण ही सर्वोत्तम है।
हे पवनपुत्रों के स्वामी! हे करुणा के सागर! कृपा कर मेरे चित्त में नित्य विराजमान हो जाओ।
मेरे सभी दुखों को हरकर मुझे परम आनंद की लक्ष्मी प्रदान करो। ॥१०॥

॥ इति श्रीकृष्ण की शादीपाद-वर्णन स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥

🔹 लाभ (Benefits)

  1. भगवत स्वरूप का साक्षात्कार
    – यह स्तोत्र श्रीकृष्ण के दिव्य रूप का अत्यंत सुंदर वर्णन करता है, जिससे मन प्रभु की भक्ति में सहज लग जाता है।
  2. मन और चित्त की शांति
    – स्तोत्र के नियमित पाठ से तनाव, चिंता और अशांति दूर होती है। मन शुद्ध, शांत और आनंदमय होता है।
  3. भक्ति एवं ध्यान में प्रगाढ़ता
    – यह स्तोत्र ध्यान और ध्यानयोग में सहायता करता है, जिससे साधक की एकाग्रता बढ़ती है।
  4. करुणा और कृपा की प्राप्ति
    – श्रीकृष्ण के करुणामय नेत्रों, मधुर मुस्कान और वंशी की ध्वनि का वर्णन करते हुए यह स्तोत्र ईश्वर की कृपा को आकर्षित करता है।
  5. रूप और स्वरूप के सौंदर्य की अनुभूति
    – शरीर के प्रत्येक अंग की दिव्यता को समझने और अनुभव करने का यह एक अनोखा मार्ग है जो अंततः आत्मज्ञान की ओर ले जाता है।
  6. सकारात्मक ऊर्जा का संचार
    – यह स्तोत्र पाठक/श्रद्धालु के आसपास की नकारात्मकता को हटाकर सकारात्मकता का संचार करता है।

पाठ विधि (Vidhi)

  1. शुभ दिन या प्रतिदिन करें – यह स्तोत्र किसी भी दिन पढ़ा जा सकता है, विशेषतः गुरुवार, एकादशी, जन्माष्टमी, या श्रावण मास में विशेष फलदायी होता है।
  2. शुद्धता का पालन करें – स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके बैठे।
  3. दीप एवं धूप जलाएं – श्रीकृष्ण के सामने दीपक और अगरबत्ती जलाकर उनका ध्यान करें।
  4. मनोयोग से पढ़ें – मन शांत और एकाग्र रखें। यदि संभव हो तो श्रीकृष्ण के चित्र के समक्ष बैठकर पाठ करें।
  5. संस्कार और श्रद्धा आवश्यक – केवल शुद्ध उच्चारण ही नहीं, श्रद्धा और समर्पण से किया गया पाठ ही फलदायी होता है।

🔹 जप / पाठ का उचित समय (Best Time for Jaap or Paath)

समयलाभ
प्रातः काल (4:30 AM – 6:30 AM)सर्वोत्तम समय, ब्रह्ममुहूर्त में पढ़ने से मन स्थिर होता है और आध्यात्मिक ऊर्जा मिलती है।
सायं काल (5:30 PM – 7:30 PM)दिन भर की थकान के बाद मानसिक शांति देता है, मन को प्रभु के निकट लाता है।
रात्रि में सोने से पहलेप्रभु का स्मरण करते हुए निद्रा में जाने से अच्छे स्वप्न और आंतरिक सुख की प्राप्ति होती है।

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