“श्री सूर्यमंडल अष्टक स्तोत्रम्” एक अत्यंत शक्तिशाली एवं पवित्र स्तोत्र है जो भगवान सूर्य नारायण को समर्पित है। यह स्तोत्र सूर्य के दिव्य मंडल—अर्थात् उनके तेज, ज्योतिर्मय स्वरूप और सृजनात्मक शक्तियों—का स्तुति करता है। इसमें कुल ग्यारह श्लोक हैं, जिनमें प्रत्येक श्लोक “तत्सवितुर्वरेण्यम्” (जो गायत्री मंत्र का भी मुख्य भाग है) से जुड़ा हुआ है और यही इसकी विशेषता है।
इस स्तोत्र में भगवान सूर्य को सृष्टि के एकमात्र चक्षु (नेत्र) कहा गया है, जो संपूर्ण ब्रह्मांड के जीवन, धर्म, स्वास्थ्य, प्रकाश और ऊर्जा के मूल स्रोत हैं। यह उनके त्रिगुणात्मक स्वरूप, ज्ञान, धर्म, योग, वेद, और प्रलयकालीन संहार शक्ति का वर्णन करता है।
यह स्तोत्र न केवल भक्तिपूर्वक सूर्य की उपासना का माध्यम है, बल्कि इसका पाठ मानसिक, शारीरिक और आध्यात्मिक रूप से भी उत्तम स्वास्थ्य, धन, तेज, बुद्धि, और पापों के नाश का साधन माना जाता है।
जो व्यक्ति श्रद्धा और निष्ठा के साथ इस स्तोत्र का नियमित पाठ करता है, उस पर सूर्यदेव की कृपा सदा बनी रहती है और जीवन में प्रकाश, ऊर्जा और सफलता प्राप्त होती है।
श्री सूर्यमंडल अष्टक स्तोत्रम्
नमः सवित्रे जगदेकचक्षुषे
जगत्प्रसूतिस्थितिनाश हेतवे ।
त्रयीमयाय त्रिगुणात्मधारिणे
विरञ्चि नारायण शंकरात्मने ॥ १ ॥
यन्मडलं दीप्तिकरं विशालं
रत्नप्रभं तीव्रमनादिरुपम् ।
दारिद्र्यदुःखक्षयकारणं च
पुनातु मां तत्सवितुर्वरेण्यम् ॥ २ ॥
यन्मण्डलं देवगणैः सुपूजितं
विप्रैः स्तुत्यं भावमुक्तिकोविदम् ।
तं देवदेवं प्रणमामि सूर्यं
पुनातु मां तत्सवितुर्वरेण्यम् ॥ ३ ॥
यन्मण्डलं ज्ञानघनं त्वगम्यं
त्रैलोक्यपूज्यं त्रिगुणात्मरुपम् ।
समस्ततेजोमयदिव्यरुपं
पुनातु मां तत्सवितुर्वरेण्यम् ॥ ४ ॥
यन्मडलं गूढमतिप्रबोधं
धर्मस्य वृद्धिं कुरुते जनानाम् ।
यत्सर्वपापक्षयकारणं च
पुनातु मां तत्सवितुर्वरेण्यम् ॥ ५ ॥
यन्मडलं व्याधिविनाशदक्षं
यदृग्यजुः सामसु सम्प्रगीतम् ।
प्रकाशितं येन च भुर्भुवः स्वः
पुनातु मां तत्सवितुर्वरेण्यम् ॥ ६ ॥
यन्मडलं वेदविदो वदन्ति
गायन्ति यच्चारणसिद्धसंघाः ।
यद्योगितो योगजुषां च संघाः
पुनातु मां तत्सवितुर्वरेण्यम् ॥ ७ ॥
यन्मडलं सर्वजनेषु पूजितं
ज्योतिश्च कुर्यादिह मर्त्यलोके ।
यत्कालकल्पक्षयकारणं च
पुनातु मां तत्सवितुर्वरेण्यम् ॥ ८ ॥
यन्मडलं विश्वसृजां प्रसिद्धम्
उत्पत्तिरक्षाप्रलयप्रगल्भम् ।
यस्मिन् जगत् संहरतेऽखिलं च
पुनातु मां तत्सवितुर्वरेण्यम् ॥ ९ ॥
यन्मडलं सर्वगतस्य विष्णोः
आत्मा परं धाम विशुद्ध तत्त्वम् ।
सूक्ष्मान्तरैर्योगपथानुगम्यं
पुनातु मां तत्सवितुर्वरेण्यम् ॥ १० ॥
यन्मडलं वेदविदि वदन्ति
गायन्ति यच्चारणसिद्धसंघाः ।
यन्मण्डलं वेदविदः स्मरन्ति
पुनातु मां तत्सवितुर्वरेण्यम् ॥ ११ ॥
॥ इति श्री सूर्यमंडल अष्टक स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥
श्री सूर्यमंडल अष्टक स्तोत्रम् – हिंदी अनुवाद सहित (Sri Suryamandal Ashtak Stotram – with Hindi translation)
1.
मैं उस सविता (सूर्य) देव को नमस्कार करता हूँ, जो संपूर्ण जगत की एकमात्र आंख हैं,
जो सृष्टि की उत्पत्ति, पालन और संहार के हेतु हैं।
जो वेदत्रयी (ऋग्, यजुः, साम) से युक्त हैं,
जो सत्व, रज और तम – इन तीन गुणों को धारण करते हैं,
और जो ब्रह्मा, विष्णु एवं शंकर के स्वरूप हैं। ॥१॥
2.
वह सूर्य मंडल, जो प्रज्वलित, विशाल, रत्नों के समान प्रभामय,
तीव्र और अनादि रूप वाला है,
जो दरिद्रता और दुःखों को नष्ट करने का कारण है—
वह “तत् सवितुः वरेण्यम्” स्वरूप मुझे शुद्ध करे। ॥२॥
3.
वह सूर्य मंडल, जिसे देवताओं ने पूजा है,
जिसकी स्तुति ब्राह्मणों द्वारा की जाती है,
जो भाव से मुक्त (मोक्ष) का ज्ञान देने में निपुण है—
मैं उस देवाधिदेव सूर्य को प्रणाम करता हूँ,
वह “तत् सवितुः वरेण्यम्” स्वरूप मुझे शुद्ध करे। ॥३॥
4.
वह सूर्य मंडल, जो ज्ञान का घन है,
जिसका स्वभाव हमारी इंद्रियों से परे है,
जो तीनों लोकों में पूज्य है और त्रिगुणात्म स्वरूप है,
जो सम्पूर्ण तेज से युक्त दिव्य रूप है—
वह “तत् सवितुः वरेण्यम्” स्वरूप मुझे शुद्ध करे। ॥४॥
5.
वह सूर्य मंडल, जो गूढ़ बुद्धि को प्रकाशित करता है,
जो धर्म की वृद्धि करता है,
जो सभी पापों के नाश का कारण है—
वह “तत् सवितुः वरेण्यम्” स्वरूप मुझे शुद्ध करे। ॥५॥
6.
वह सूर्य मंडल, जो रोगों का नाश करने में सक्षम है,
जो ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद में गाया गया है,
जिसके द्वारा “भूः भुवः स्वः” प्रकाशित हुआ—
वह “तत् सवितुः वरेण्यम्” स्वरूप मुझे शुद्ध करे। ॥६॥
7.
वह सूर्य मंडल, जिसका वर्णन वेदज्ञ लोग करते हैं,
जिसका गायन चारण और सिद्धों के समूह करते हैं,
जिसका ध्यान योग में रत साधक करते हैं—
वह “तत् सवितुः वरेण्यम्” स्वरूप मुझे शुद्ध करे। ॥७॥
8.
वह सूर्य मंडल, जो सभी लोगों द्वारा पूजित है,
जो मृत्युलोक में प्रकाश देता है,
जो समय और कल्प का संहार करने वाला है—
वह “तत् सवितुः वरेण्यम्” स्वरूप मुझे शुद्ध करे। ॥८॥
9.
वह सूर्य मंडल, जो सृष्टिकर्ताओं में प्रसिद्ध है,
जो सृष्टि की उत्पत्ति, रक्षा और संहार करने में समर्थ है,
जिसमें सम्पूर्ण जगत विलीन हो जाता है—
वह “तत् सवितुः वरेण्यम्” स्वरूप मुझे शुद्ध करे। ॥९॥
10.
वह सूर्य मंडल, जो सर्वव्यापक विष्णु का आत्मस्वरूप है,
जो परम धाम और विशुद्ध तत्त्व है,
जिसे सूक्ष्म अंतःकरण से योगमार्ग द्वारा जाना जा सकता है—
वह “तत् सवितुः वरेण्यम्” स्वरूप मुझे शुद्ध करे। ॥१०॥
11.
वह सूर्य मंडल, जिसका वर्णन वेदवित करते हैं,
जिसका गायन सिद्धों और चारणों के समूह करते हैं,
जिसका स्मरण वेदज्ञजन करते हैं—
वह “तत् सवितुः वरेण्यम्” स्वरूप मुझे शुद्ध करे। ॥११॥
॥ इति श्री सूर्यमंडल अष्टक स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥
श्री सूर्यमंडल अष्टक स्तोत्रम् के लाभ (Benefits):
- आरोग्य प्राप्ति:
इस स्तोत्र के नियमित पाठ से रोगों का नाश होता है और शरीर में तेज, ऊर्जा एवं ओज की वृद्धि होती है। यह विशेष रूप से नेत्र, चर्म और हृदय संबंधी रोगों में लाभकारी माना गया है। - दरिद्रता एवं दुःखों का नाश:
यह स्तोत्र दारिद्र्य, कष्ट, और विपत्तियों को नष्ट कर जीवन में समृद्धि, सुख और शांति लाता है। - पापों का क्षय:
पूर्वजन्म एवं इस जन्म के पापों का क्षय होता है और साधक का चेतना स्तर (consciousness level) ऊँचा होता है। - बुद्धि, स्मृति और ज्ञान में वृद्धि:
विद्यार्थी एवं जिज्ञासुओं के लिए यह स्तोत्र अत्यंत उपयोगी है। यह मन को स्थिर, बुद्धि को तेज और स्मरण शक्ति को प्रबल करता है। - धर्म एवं योग में उन्नति:
साधक का धार्मिक जीवन पुष्ट होता है और योग, ध्यान व साधना में सहजता आती है। - आत्मिक शुद्धि और मुक्ति का मार्ग:
यह स्तोत्र साधक को आत्मिक शुद्धि, शांति और मोक्ष के मार्ग की ओर प्रेरित करता है।
पाठ विधि (Vidhi):
- स्थान चयन:
पूर्वमुख या उत्तरमुख होकर सूर्य की ओर मुख करके किसी शांत और पवित्र स्थान पर बैठें। यदि संभव हो तो सूर्य के सामने बैठना श्रेष्ठ है। - शुद्धि और संकल्प:
हाथ में जल लेकर संकल्प करें:
“आज मैं श्रद्धा से श्री सूर्यमंडल अष्टक स्तोत्र का पाठ कर रहा/रही हूँ। सूर्यदेव मुझ पर कृपा करें।” - दीपक और अर्घ्य:
तांबे के लोटे में स्वच्छ जल लेकर सूर्य को अर्घ्य दें और दीपक प्रज्वलित करें। - शुद्ध उच्चारण:
श्लोकों का उच्चारण स्पष्ट, शांत मन, और श्रद्धा पूर्वक करें। मानसिक रूप से “ॐ सूर्याय नमः” मंत्र का ध्यान रखें। - समर्पण:
अंत में सूर्य देव को प्रणाम करें और अपने व परिवार की रक्षा, आरोग्य और उन्नति की प्रार्थना करें।
जप / पाठ का समय (Best Time to Chant):
- प्रातःकाल (सुबह 6 से 8 बजे के बीच):
यह सबसे उत्तम समय है क्योंकि सूर्य की पहली किरणें शक्तिशाली और शुद्ध मानी जाती हैं। - सप्ताह का दिन:
रविवार को विशेष फलदायक माना गया है। यदि आप केवल साप्ताहिक पाठ करना चाहते हैं, तो हर रविवार करें। - संख्या:
आप इसे 1 बार प्रतिदिन पढ़ सकते हैं। विशेष लाभ के लिए रविवार को 11 या 21 बार पाठ करना भी शुभ होता है।


