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श्री वेंकटेस स्तोत्रं (Shri Venkatesa Stotram)

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श्री वेङ्कटेश स्तोत्रम् भगवान विष्णु के प्रसिद्ध स्वरूप श्री वेङ्कटेश्वर को समर्पित एक अत्यंत पवित्र और शक्तिशाली स्तोत्र है। वेङ्कटेश भगवान तिरुमला (आंध्रप्रदेश) के श्री तिरुपति बालाजी रूप में विश्वविख्यात हैं। इस स्तोत्र में भगवान के विविध नामों, स्वरूपों, गुणों और अवतारों का गहन वर्णन किया गया है—जैसे वासुदेव, प्रद्युम्न, संकर्षण, नारायण, राम, कृष्ण, वराह, वामन, नरसिंह, अच्युत, माधव, गोविन्द आदि।

यह स्तोत्र न केवल भगवान के दिव्य रूपों का स्मरण कराता है, बल्कि उनकी सर्वशक्तिमत्ता, भक्तवत्सलता, और पाप-विनाशक स्वरूप को भी उजागर करता है। इसे श्रद्धापूर्वक पढ़ने से मनुष्य के सारे पाप नष्ट हो जाते हैं, भय समाप्त होता है, और सभी इच्छाएं पूर्ण होती हैं

श्री वेङ्कटेश स्तोत्रम् एक ऐसा स्तुति-पाठ है जो भक्ति, शक्ति और शांति का त्रिवेणी संगम है। यह स्तोत्र आत्मा को ईश्वर से जोड़ता है और जीवन में मंगलमय प्रभाव लाता है।

श्री वेङ्कटेश स्तोत्रम् हिन्दी पाठ

वेङ्कटेशो वासुदेवः प्रद्युम्नोऽमितविक्रमः ।
सङ्कर्षणोऽनिरुद्धश्च शेषाद्रिपतिरेव च ॥ 1 ॥

जनार्दनः पद्मनाभो वेङ्कटाचलवासनः ।
सृष्टिकर्ता जगन्नाथो माधवो भक्तवत्सलः ॥ 2 ॥

गोविन्दो गोपतिः कृष्णः केशवो गरुडध्वजः ।
वराहो वामनश्चैव नारायण अधोक्षजः ॥ 3 ॥

श्रीधरः पुण्डरीकाक्षः सर्वदेवस्तुतो हरिः ।
श्रीनृसिंहो महासिंहः सूत्राकारः पुरातनः ॥ 4 ॥

रमानाथो महीभर्ता भूधरः पुरुषोत्तमः ।
चोळपुत्रप्रियः शान्तो ब्रह्मादीनां वरप्रदः ॥ 5 ॥

श्रीनिधिः सर्वभूतानां भयकृद्भयनाशनः ।
श्रीरामो रामभद्रश्च भवबन्धैकमोचकः ॥ 6 ॥

भूतावासो गिरावासः श्रीनिवासः श्रियःपतिः ।
अच्युतानन्तगोविन्दो विष्णुर्वेङ्कटनायकः ॥ 7 ॥

सर्वदेवैकशरणं सर्वदेवैकदैवतम् ।
समस्तदेवकवचं सर्वदेवशिखामणिः ॥ 8 ॥

इतीदं कीर्तितं यस्य विष्णोरमिततेजसः ।
त्रिकाले यः पठेन्नित्यं पापं तस्य न विद्यते ॥ 9 ॥

राजद्वारे पठेद्घोरे सङ्ग्रामे रिपुसङ्कटे ।
भूतसर्पपिशाचादिभयं नास्ति कदाचन ॥ 10 ॥

अपुत्रो लभते पुत्रान् निर्धनो धनवान् भवेत् ।
रोगार्तो मुच्यते रोगाद् बद्धो मुच्येत बन्धनात् ॥ 11 ॥

यद्यदिष्टतमं लोके तत्तत्प्राप्नोत्यसंशयः ।
ऐश्वर्यं राजसम्मानं भक्तिमुक्तिफलप्रदम् ॥ 12 ॥

विष्णोर्लोकैकसोपानं सर्वदुःखैकनाशनम् ।
सर्वैश्वर्यप्रदं नॄणां सर्वमङ्गलकारकम् ॥ 13 ॥

मायावी परमानन्दं त्यक्त्वा वैङ्कुण्ठमुत्तमम् ।
स्वामिपुष्करिणीतीरे रमया सह मोदते ॥ 14 ॥

कल्याणाद्भुतगात्राय कामितार्थप्रदायिने ।
श्रीमद्वेङ्कटनाथाय श्रीनिवासाय ते नमः ॥ 15 ॥

वेङ्कटाद्रिसमं स्थानं ब्रह्माण्डे नास्ति किञ्चन ।
वेङ्कटेशसमो देवो न भूतो न भविष्यति ॥ 16 ॥

॥ इति श्री वेङ्कटेश स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥

श्री वेङ्कटेश स्तोत्रम् — हिन्दी अनुवाद सहित (Shri Venkatesh Stotram – with Hindi translation)

वेङ्कटेश भगवान ही वासुदेव हैं, वे ही प्रद्युम्न हैं, जिनकी शक्ति असीम है।
वे ही संकर्षण हैं, अनिरुद्ध हैं और शेष पर्वत के स्वामी भी हैं। ॥1॥

वे ही जनार्दन हैं, पद्मनाभ हैं और वेङ्कटाचल पर्वत पर निवास करते हैं।
वे सृष्टि के कर्ता, जगन्नाथ, माधव तथा भक्तों पर कृपा करने वाले हैं। ॥2॥

वे ही गोविन्द, गोधन के स्वामी, कृष्ण, केशव और गरुड़ध्वज हैं।
वे वराह, वामन, नारायण और अधोक्षज (संसार से परे) हैं। ॥3॥

वे श्रीधर, पुण्डरीकाक्ष (कमलनयन), सभी देवताओं द्वारा स्तुत्य हरि हैं।
वे ही श्रीनृसिंह, महाशक्तिशाली सिंह, सूत्रकर्ता और सनातन पुरुष हैं। ॥4॥

वे रमा (लक्ष्मी) के नाथ, पृथ्वी के स्वामी, पर्वतों के धारक और पुरुषोत्तम हैं।
चोलवंशीयों को प्रिय, शांति स्वरूप और ब्रह्मा आदि को वर देने वाले हैं। ॥5॥

वे श्रीनिधि (श्री का भंडार), समस्त प्राणियों के आश्रय, भय उत्पन्न करने वाले और भय नष्ट करने वाले हैं।
वे ही श्रीराम और रामभद्र हैं, जो संसार के बंधनों को काटने वाले हैं। ॥6॥

वे भूतों के वासस्थल हैं, पर्वतों में रहने वाले हैं, श्रीनिवास हैं और श्री (लक्ष्मी) के पति हैं।
वे अच्युत, अनंत, गोविन्द, विष्णु और वेङ्कटाचल के नायक हैं। ॥7॥

वे सभी देवताओं का एकमात्र आश्रय हैं, सभी देवताओं के पूज्य देव हैं।
वे समस्त देवों की रक्षा करने वाले और सभी देवताओं के मुकुटमणि हैं। ॥8॥

जिसका यह अमिट तेज वाला विष्णु नाम कीर्तन किया गया है,
जो इसे प्रतिदिन तीनों समय पढ़ता है, उसका कोई पाप नहीं रहता। ॥9॥

जो इसे महलों के द्वार पर, भयंकर युद्ध में या शत्रु संकट में पढ़ता है,
उसे भूत, साँप, पिशाच आदि से कभी भय नहीं होता। ॥10॥

जो निःसंतान है, उसे संतान की प्राप्ति होती है; निर्धन, धनवान बनता है।
जो रोगी है, वह रोग से मुक्त होता है; जो बंदी है, वह बंधन से छूट जाता है। ॥11॥

जो व्यक्ति जो भी मन में चाहना करता है, वह निःसंदेह उसे प्राप्त करता है।
ऐश्वर्य, राजसम्मान, भक्ति और मोक्ष फल की प्राप्ति होती है। ॥12॥

यह विष्णु का लोकों तक पहुंचाने वाला एकमात्र मार्ग है,
जो सारे दुखों का नाश करता है, सभी ऐश्वर्य और मंगल प्रदान करता है। ॥13॥

जो मायावी परम आनंदस्वरूप हैं, जिन्होंने वैकुण्ठ को त्याग कर
स्वामि पुष्करिणी तीर्थ के किनारे श्री लक्ष्मी जी के साथ विहार किया है। ॥14॥

जो कल्याणकारी, अद्भुत अंगों वाले और मनोवांछित फल देने वाले हैं,
उन श्री वेङ्कटनाथ श्रीनिवास को मैं नमस्कार करता हूँ। ॥15॥

ब्रह्मांड में वेङ्कटाद्रि (वेङ्कट पर्वत) के समान कोई स्थान नहीं है।
वेङ्कटेश भगवान के समान कोई देवता न पहले था, न आगे होगा। ॥16॥

॥ इति श्री वेङ्कटेश स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥

श्री वेङ्कटेश स्तोत्रम् के लाभ (Benefits):

  1. पापों का नाश:
    जो व्यक्ति इस स्तोत्र का नित्य पाठ करता है, उसके समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं।
  2. भय का नाश:
    इसे पढ़ने से भूत, प्रेत, पिशाच, सांप, और अन्य अदृश्य भय दूर हो जाते हैं।
  3. मनोकामना पूर्ति:
    अपुत्र को पुत्र, निर्धन को धन, रोगी को स्वास्थ्य और बंधन में फंसे को मुक्ति मिलती है।
  4. भक्ति व मोक्ष प्राप्ति:
    यह स्तोत्र भक्ति और मुक्ति दोनों का फल देने वाला है।
  5. संकट में रक्षा:
    युद्ध, राजद्वार या विपत्तिकाल में इसका पाठ अद्भुत सुरक्षा कवच प्रदान करता है।
  6. ऐश्वर्य और सम्मान की प्राप्ति:
    राजसम्मान, पद-प्रतिष्ठा, और समस्त ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है।
  7. समस्त देवताओं का कवच:
    यह स्तोत्र सारे देवताओं का संयुक्त आशीर्वाद है—एक ही पाठ से सर्वदेवताओं की कृपा प्राप्त होती है।

श्री वेङ्कटेश स्तोत्रम् की पाठ विधि (Pāṭh Vidhi):

  1. स्थान:
    शांत, पवित्र और साफ स्थान पर पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके बैठें।
  2. स्नान व पूजन:
    स्नान करके शुद्ध वस्त्र पहनें। दीपक जलाएं, वेङ्कटेश भगवान की मूर्ति या चित्र के समक्ष पुष्प अर्पण करें।
  3. संकल्प:
    भगवान से अपने उद्देश्य/संकल्प को मन में बोलें या प्रार्थना करें।
  4. पाठ की विधि:
    पूरे स्तोत्र का उच्चारण भावपूर्वक करें। यदि संस्कृत कठिन हो तो हिंदी अनुवाद के साथ पढ़ सकते हैं।
  5. समर्पण:
    पाठ के अंत में भगवान को प्रणाम करें और आरती करें।

श्री वेङ्कटेश स्तोत्रम् जप/पाठ का समय (Best Time for Chanting):

  • प्रातःकाल (सुबह) – सर्वश्रेष्ठ समय है, जब मन शांत और पवित्र होता है।
  • सायंकाल – कार्यों के बाद भगवान का स्मरण करने के लिए उपयुक्त है।
  • विशेष अवसरों पर:
    • श्रीविष्णु या वेङ्कटेश भगवान के व्रत/उत्सव में,
    • गुरुवार, एकादशी, या पूर्णिमा के दिन,
    • संकट या निर्णय के समय, विशेष फलदायक होता है।
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