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श्री राज मातंगी स्तोत्र (Shri Raj Matangi Stotra)

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“श्री राज मातंगी स्तोत्र” एक अत्यंत शक्तिशाली और रहस्यमय स्तोत्र है, जो त्रिपुरा की दस महाविद्याओं में से एक — देवी राज मातंगी को समर्पित है। यह स्तोत्र तांत्रिक साधना की गूढ़ परंपरा से जुड़ा हुआ है और इसका पाठ साधक को वाणी, विद्या, ऐश्वर्य, सिद्धि और आकर्षण की शक्ति प्रदान करता है।

राज मातंगी को “शब्द की देवी”, “वाक् सिद्धि प्रदायिनी” और “गूढ़ विद्याओं की अधिष्ठात्री” माना जाता है। वे चाण्डाल कन्या रूप में साक्षात परमेश्वरी हैं, जो समाज के सीमाओं से परे होकर भी दिव्यतम शक्ति का प्रतिनिधित्व करती हैं। वह विद्रोह, स्वतंत्रता और सम्पूर्ण ज्ञान का स्वरूप हैं।

इस स्तोत्र में देवी की रूप माधुरी, उनके कार्य, महिमा, और उपासक को प्राप्त होने वाले दिव्य फल का विस्तार से वर्णन किया गया है।
श्लोकों में देवी को सौंदर्य, शक्तिशाली वाणी, मोहिनी शक्ति, पाप विनाशिनी और मोक्ष प्रदायिनी के रूप में पूजा गया है।

विशेषतः:

  • यह स्तोत्र पाठ करने वाला व्यक्ति शब्द सिद्धि, राज सम्मान, वाणी में आकर्षण, अणिमा-लघिमा जैसे योग सिद्धि,
    मनोवांछित फल, संपूर्ण भौतिक ऐश्वर्य, और अंततः मोक्ष प्राप्त करता है।
  • कहा गया है कि यह स्तोत्र गन्धर्वों, तांत्रिकों, और महाकवियों का प्रिय स्तोत्र है।

श्री राज मातंगी स्तोत्र
Shri Raj Matangi Stotra

मातङ्गीं मधुपानमत्तनयनां मातङ्ग सञ्चारिणीं
कुम्भीकुम्भविवृत्तपीवरकुचां कुम्भादिपात्राञ्चिताम् ।
ध्यायेऽहं मधुमारणैकसहजां ध्यातुस्सुपुत्रप्रदां ।
शर्वाणीं सुरसिद्धसाध्यवनिता संसेविता पादुकाम् ॥ १ ॥

मातङ्गी महिषादिराक्षसकृतध्वान्तैकदीपो मणिः
मन्वादिस्तुत मन्त्रराजविलसत्सद्भक्त चिन्तामणिः ।
श्रीमत्कौलिकदानहास्यरचना चातुर्य राकामणिः
देवित्वं हृदये वसाद्यमहिमे मद्भाग्य रक्षामणिः ॥ २ ॥

जयदेवि विशालाक्षि जय सर्वेश्वरि जय ।
जयाञ्जनगिरिप्रख्ये महादेव प्रियङ्करि ॥ ३ ॥

महाविश्वेश दयिते जय ब्रह्मादि पूजिते ।
पुष्पाञ्जलिं प्रदास्यामि गृहाण कुलनायिके ॥ ४ ॥

जयमातर्महाकृष्णे जय नीलोत्पलप्रभे ।
मनोहारि नमस्तेऽस्तु नमस्तुभ्यं वशङ्करि ॥ ५ ॥

जय सौभाग्यदे नॄणां लोकमोहिनि ते नमः ।
सर्वैश्वर्यप्रदे पुंसां सर्वविद्याप्रदे नमः ॥ ६ ॥

सर्वापदां नाशकरीं सर्वदारिद्र्यनाशिनीम् ।
नमो मातङ्गतनये नमश्चाण्डालि कामदे ॥ ७ ॥

नीलाम्बरे नमस्तुभ्यं नीलालकसमन्विते ।
नमस्तुभ्यं महावाणि महालक्ष्मि नमोऽस्तुते ॥ ८ ॥

महामातङ्गि पादाब्जं तव नित्यं नमाम्यहम् ।
एतदुक्तं महादेव्या मातङ्गयाः स्तोत्रमुत्तमम् ॥ ९ ॥

सर्वकामप्रदं नित्यं यः पठेन्मानवोत्तमः ।
विमुक्तस्सकलैः पापैः समग्रं पुण्यमश्नुते ॥ १० ॥

राजानो दासतां यान्ति नार्यो दासीत्वमाप्नुयुः ।
दासीभूतं जगत्सर्वं शीघ्रं तस्य भवेद् ध्रुवम् ॥ ११ ॥

महाकवीभवेद्वाग्भिः साक्षाद् वागीश्वरो भवेत् ।
अचलां श्रियमाप्नोति अणिमाद्यष्टकं लभेत् ॥ १२ ॥

लभेन्मनोरथान् सर्वान् त्रैलोक्ये नापि दुर्लभान् ।
अन्ते शिवत्वमाप्नोति नात्र कार्या विचारणा ॥ १३ ॥

॥ इति श्री राज मातंगी स्तोत्र सम्पूर्णम् ॥

श्री राज मातंगी स्तोत्र (हिंदी अनुवाद सहित)

मैं उस मातंगी देवी का ध्यान करता हूँ, जिनकी आंखें मधु पान से मदमत्त हैं, जो गजगामिनी (हाथी के समान चलने वाली) हैं,
जिनके स्तन भारी और पूर्ण हैं जैसे कलश, और जो पात्रों की अधिष्ठात्री देवी हैं।
जो मधु की भांति प्रिय और सहज रूप से मातृत्व प्रदान करती हैं,
जिनकी पादुकाओं की सेवा देवियाँ, सिद्धियाँ और साध्याएँ करती हैं — ऐसी शर्वाणी का मैं ध्यान करता हूँ। ॥ १ ॥

वह मातंगी देवी दैत्यों और महिषासुरों के अंधकार का नाश करने वाली दीपस्वरूप मणि हैं,
जिनकी स्तुति मनु आदि ऋषियों ने की है, जो मंत्रराज के समान तेजस्विनी हैं,
सच्चे भक्तों की इच्छाओं को पूर्ण करने वाली चिंतामणि हैं,
जो तंत्र के कौलक मार्ग की दात्री, हास्य विनोद से युक्त, रचनात्मकता में कुशल, और रात्रि के चंद्रमा के समान चमकती हैं।
हे मातंगी! तुम मेरे हृदय में देवीत्व सहित निवास करो, यही मेरा सौभाग्य है और मेरी रक्षा करो। ॥ २ ॥

हे विशाल नेत्रों वाली देवी! आपको जय हो। हे सर्वेश्वरी! आपको जय हो।
हे अंजनगिरि के समान प्रसिद्ध महादेव प्रियंवदा! आपको बारंबार जय हो। ॥ ३ ॥

हे महाविश्व के स्वामी की प्रिय देवी! आपको जय हो। हे ब्रह्मा आदि द्वारा पूजिते!
मैं पुष्पांजलि अर्पित करता हूँ, हे कुल की नायिका! कृपया इसे स्वीकार करें। ॥ ४ ॥

हे माता! हे महाकृष्णवर्णा! हे नीलकमल जैसी प्रभा वाली!
हे मन को मोह लेने वाली! आपको बारंबार नमस्कार। आप वशीकरण देने वाली हैं, आपको नमस्कार। ॥ ५ ॥

हे सौभाग्य प्रदान करने वाली! हे लोक को मोहित करने वाली! आपको प्रणाम।
हे समस्त ऐश्वर्य एवं सम्पूर्ण विद्याओं की प्रदायिनी! आपको नमस्कार। ॥ ६ ॥

जो समस्त संकटों का नाश करती हैं, समस्त दरिद्रता को समाप्त करती हैं —
ऐसी मातंगी की कन्या को प्रणाम। हे चाण्डालिनी! हे कामदायिनी! आपको नमस्कार। ॥ ७ ॥

हे नीलवस्त्रधारिणी! आपको नमस्कार। हे नीले केशों से युक्ते!
हे महावाणी! हे महालक्ष्मी! आपको बारंबार नमस्कार। ॥ ८ ॥

हे महामातंगी! मैं सदा आपके चरणकमलों की वंदना करता हूँ।
यह स्तोत्र महादेवी मातंगी का अत्यंत उत्तम स्तुति है। ॥ ९ ॥

जो मनुष्य इस स्तोत्र का नित्य पाठ करता है,
वह सभी पापों से मुक्त होकर समस्त पुण्यों को प्राप्त करता है। ॥ १० ॥

राजा भी उसके सेवक बन जाते हैं, स्त्रियाँ भी उसकी दासी बन जाती हैं।
सम्पूर्ण संसार शीघ्र ही उसकी सेवा में लग जाता है — इसमें कोई संदेह नहीं। ॥ ११ ॥

वह महान कवि बनता है, उसकी वाणी में देवी सरस्वती का वास होता है,
वह स्थायी लक्ष्मी को प्राप्त करता है और अणिमा आदि आठ सिद्धियों को प्राप्त करता है। ॥ १२ ॥

वह सभी मनोवांछित फल प्राप्त करता है, चाहे वे तीनों लोकों में कितने भी दुर्लभ क्यों न हों।
अंत में वह शिवत्व (मोक्ष, दिव्यता) को प्राप्त करता है — इसमें कोई विचार करने की आवश्यकता नहीं। ॥ १३ ॥

॥ इस प्रकार श्री राज मातंगी स्तोत्र सम्पूर्ण हुआ ॥

लाभ (Benefits):

1. वाणी में चमत्कारिक प्रभाव:
देवी मातंगी वाक्-सिद्धि की अधिष्ठात्री हैं। इस स्तोत्र का नियमित पाठ करने से वाणी में आकर्षण, ओज और प्रभाव उत्पन्न होता है। व्यक्ति जो बोले, वही सिद्ध होता है।

2. ऐश्वर्य और आकर्षण की प्राप्ति:
साधक समाज, शासन और सत्ता में प्रभावशाली होता है। राजा तक उसके सेवक बनते हैं और सम्पूर्ण जगत उसकी आज्ञा का पालन करता है।

3. विद्याओं में सिद्धि:
देवी मातंगी सभी विद्याओं की अधिपति हैं। स्तोत्र का पाठ साधक को गूढ़ विद्याओं में सिद्धि, संगीत, कविता, कला एवं भाषण में अद्भुत कौशल प्रदान करता है।

4. अष्टसिद्धियों की प्राप्ति:
इस स्तोत्र के प्रभाव से अणिमा, लघिमा, महिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व, वशित्व और कामावसायिता जैसी अष्टसिद्धियाँ प्राप्त होती हैं।

5. मनोवांछित फल एवं मोक्ष:
साधक को सभी इच्छित भौतिक सुख, सौंदर्य, कीर्ति, विद्या, वैभव और अंत में शिवत्व (मोक्ष) की प्राप्ति होती है — बिना किसी संदेह के।

पाठ विधि (Pāṭh Vidhi):

1. शुद्धता और संकल्प:
सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें। शांत और एकांत स्थान चुनें। देवी राज मातंगी का ध्यान करके पाठ का संकल्प लें।

2. आसन और दिशा:
कुश या ऊन के आसन पर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें।

3. पूजन सामग्री (वैकल्पिक):
नीला या हरा वस्त्र, नीले पुष्प, दीपक, अगरबत्ती, मौसमी फल, और देवी मातंगी का चित्र/यंत्र रखें।

4. ध्यान और स्तोत्र पाठ:

  • आंखें बंद कर देवी मातंगी का ध्यान करें — नीलवर्णा, वीणा वादिनी, नीले वस्त्रधारी।
  • फिर स्तोत्र का पूर्ण भाव से पाठ करें।
  • अंत में देवी को प्रणाम कर, अपने मनोकामना का निवेदन करें।

5. नियम:
पाठ में शुद्धता, भावना और निष्ठा बहुत आवश्यक है। इसे 11, 21 या 41 दिनों तक नियमित करने से अद्भुत फल मिलता है।

जाप/पाठ का श्रेष्ठ समय (Best Time to Chant):

समयविशेषता
ब्रह्ममुहूर्त (सुबह 4-6 बजे)सबसे श्रेष्ठ और सात्विक समय। मन स्थिर रहता है।
रात्रि 10 बजे के बाद (गूढ़ तांत्रिक काल)जो तांत्रिक प्रभाव, वशीकरण या वाक् सिद्धि हेतु साधना करना चाहें, उनके लिए यह समय उत्तम है।
अष्टमी, नवमी, पूर्णिमा, अमावस्याइन तिथियों पर विशेष फल प्राप्त होता है।
नवरात्रिदेवी की उपासना का सबसे श्रेष्ठ काल। पूरे नौ दिन इसका पाठ विशेष लाभकारी होता है।
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