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श्री मृत्युंजय स्तोत्रम् (Shri Mrityunjay Stotra)

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“श्री मृत्युंजय स्तोत्र” एक शक्तिशाली स्तुति है जो भगवान शिव को समर्पित है, विशेष रूप से उनके चन्द्रशेखर रूप को। यह स्तोत्र उन भक्तों द्वारा गाया जाता है जो जीवन में भय, रोग, मृत्यु और कष्टों से रक्षा की कामना करते हैं। इस स्तोत्र में भगवान शिव की महिमा, उनकी शक्तियों और उनके रूपों का वर्णन अत्यंत प्रभावशाली रूप से किया गया है।

श्लोकों में यमराज (मृत्यु) पर विजय प्राप्त करने वाले भगवान शिव की स्तुति करते हुए कहा गया है कि – “जो चन्द्रशेखर की शरण में है, उसके लिए मृत्यु क्या कर सकती है?” यह भावना इस स्तोत्र की आत्मा है।

इस स्तोत्र का पठन अत्यंत शुभ और मंगलकारी माना जाता है, विशेष रूप से जीवन के संकटमय समय में, रोग या मृत्यु के भय से मुक्ति के लिए, और आत्मिक बल को जागृत करने के लिए। यह स्तोत्र शंकराचार्य द्वारा रचित माना जाता है, जिनके अनेक स्तोत्रों में गूढ़ दर्शन और गहन श्रद्धा समाहित होती है।

श्री मृत्युंजय स्तोत्र (संस्कृत पाठ)

रत्नसानुशरासनं रजताद्रिश्रृंगनिकेतनं
शिञ्जिनीकृतपन्नगेश्वरमच्युतानलसायकम् ।
क्षिप्रदग्धपुरत्रयं त्रिदशालयैरभिवंदितं
चन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यमः ॥ 1 ॥

पंचपादपपुष्पगन्धिपदाम्बुजद्वयशोभितं
भाललोचनजातपावकदग्धमन्मथविग्रहम् ।
भस्मदिग्धकलेवरं भवनाशिनं भवमव्ययं
चन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यमः ॥ 2 ॥

मत्तवारणमुख्यचर्मकृतोत्तरीयमनोहरं
पंकजासनपद्मलोचनपूजितांगघ्रिसरोरुहम् ।
देवसिद्धतरंगिणी करसिक्तशीतजटाधरं
चन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यमः ॥ 3 ॥

कुण्डलीकृतकुण्डलीश्वरकुण्डलं वृषवाहनं
नारदादिमुनीश्वरस्तुतवैभवं भुवनेश्वरम् ।
अंधकान्तकमाश्रितामरपादपं शमनान्तकं
चन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यमः ॥ 4 ॥

यक्षराजसखं भगाक्षिहरं भुजंगविभूषणं
शैलराजसुतापरिष्कृतचारुवामकलेवरम् ।
क्ष्वेडनीलगलं परश्वधधारिणं मृगधारिणं
चन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यमः ॥ 5 ॥

भेषजं भवरोगिणामखिलापदामपहारिणं
दक्षयज्ञविनाशिनं त्रिगुणात्मकं त्रिविलोचनम् ।
भुक्तिमुक्तिफलप्रदं निखिलाघसंघनिबर्हणं
चन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यमः ॥ 6 ॥

भक्तवत्सलमर्चतां निधिमक्षयं हरिदम्बरं
सर्वभूतपतिं परात्परमप्रमेयमनूपमम् ।
भूमिवारिनभोहुताशनसोमपालितस्वाकृतिं
चन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यमः ॥ 7 ॥

विश्वसृष्टिविधायिनं पुनरेव पालनतत्परं
संहरन्तमथ प्रपंचमशेषलोकनिवासिनम् ।
क्रीडयन्तमहर्निशं गणनाथयूथसमाव्रतं
चन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यमः ॥ 8 ॥

रुद्रं पशुपतिं स्थाणुं नीलकण्ठमुमापतिम् ।
नमामि शिरसा देवं किं नो मृत्युः करिष्यति ॥ 9 ॥

कालकण्ठं कलामूर्तिं कालाग्निं कालनाशनम् ।
नमामि शिरसा देवं किं नो मृत्युः करिष्यति ॥ 10 ॥

नीलकण्ठं विरुपाक्षं निर्मलं निरूपद्रवम् ।
नमामि शिरसा देवं किं नो मृत्युः करिष्यति ॥ 11 ॥

वामदेवं महादेवं लोकनाथं जगद्गुरुम् ।
नमामि शिरसा देवं किं नो मृत्युः करिष्यति ॥ 12 ॥

देवदेवं जगन्नाथं देवेशमृषभध्वजम् ।
नमामि शिरसा देवं किं नो मृत्युः करिष्यति ॥ 13 ॥

अनन्तमव्ययं शान्तमक्षमालाधरं हरम् ।
नमामि शिरसा देवं किं नो मृत्युः करिष्यति ॥ 14 ॥

आनन्दं परमं नित्यं कैवल्यपदकारणम् ।
नमामि शिरसा देवं किं नो मृत्युः करिष्यति ॥ 15 ॥

स्वर्गापवर्गदातारं सृष्टिस्थित्यन्तकारिणम् ।
नमामि शिरसा देवं किं नो मृत्युः करिष्यति ॥ 16 ॥

॥ इति श्री मृत्युंजय स्तोत्र सम्पूर्णम् ॥

श्री मृत्युंजय स्तोत्र हिन्दी अनुवाद सहित

1
रत्नमय पर्वत पर स्थित, चाँदी जैसे हिमालय शिखर में निवास करने वाले,
साँपों के फुफकार की गूंज से गूँजने वाले, अच्युत (विष्णु) जैसे धनुर्धर,
तीनों पुरों को पल में जलाकर नष्ट करने वाले, देवताओं द्वारा पूजित —
ऐसे चन्द्रशेखर की मैं शरण लेता हूँ। फिर मृत्यु मेरा क्या कर सकती है?

2
जिनके दोनों चरण-पद्म पुष्पों की तरह सुगंधित हैं,
जिनके ललाट के नेत्र की ज्वाला से कामदेव का शरीर भस्म हो गया,
जो भस्म से लिप्त हैं, संसार से मुक्तिदाता हैं और स्वयं अविनाशी हैं —
ऐसे चन्द्रशेखर की मैं शरण लेता हूँ। फिर मृत्यु मेरा क्या बिगाड़ सकती है?

3
जो मतवाले हाथी की खाल ओढ़े हुए हैं, सुंदर हैं,
कमलासन ब्रह्मा व पद्मनेत्र विष्णु जिनके चरणों की पूजा करते हैं,
जिनकी जटाओं से गंगा बहती है —
ऐसे चन्द्रशेखर की मैं शरण लेता हूँ। फिर मृत्यु हमारा क्या कर सकती है?

4
जो नागों को आभूषण की तरह धारण करते हैं, वृषभ (बैल) जिनका वाहन है,
नारद आदि मुनियों द्वारा जिनकी महिमा गाई जाती है,
जो अंधकासुर का वध करने वाले, और संकटों को हरने वाले हैं —
ऐसे चन्द्रशेखर की मैं शरण लेता हूँ। फिर मृत्यु हमें क्या हानि पहुँचा सकती है?

5
जो यक्षराज (कुबेर) के मित्र हैं, त्रिनेत्रधारी हैं,
सर्पों से विभूषित हैं, पार्वती जिनकी वामांगिनी हैं,
गले में विष धारण किए, फरसा और मृग लिए हुए हैं —
ऐसे चन्द्रशेखर की मैं शरण लेता हूँ। फिर यमराज हमें कैसे छू सकता है?

6
जो संसार रूपी रोग का इलाज हैं, सभी दुखों को हरने वाले हैं,
दक्ष के यज्ञ को नष्ट करने वाले, तीनों गुणों वाले, त्रिनेत्रधारी हैं,
भक्ति और मोक्ष प्रदान करने वाले, पापों का नाश करने वाले —
ऐसे चन्द्रशेखर की मैं शरण लेता हूँ। फिर मृत्यु से डर कैसा?

7
जो भक्तों को स्नेह देने वाले, पूजनीय हैं, अमर धन के समान हैं,
सभी प्राणियों के स्वामी हैं, सबसे श्रेष्ठ और अद्वितीय हैं,
जिनकी शक्ति पृथ्वी, जल, आकाश, अग्नि और चन्द्रमा में प्रकट होती है —
ऐसे चन्द्रशेखर की मैं शरण लेता हूँ। मृत्यु हमारा क्या कर सकती है?

8
जो सृष्टि करते हैं, पालन करते हैं और अंत में संहार करते हैं,
सभी लोकों में रहने वाले हैं, दिन-रात गणों के साथ खेलते हैं —
ऐसे चन्द्रशेखर की मैं शरण लेता हूँ। फिर मृत्यु का क्या डर?

9
मैं रुद्र, पशुपति, स्थाणु, नीलकण्ठ और उमा पति को सिर झुकाकर नमस्कार करता हूँ।
मृत्यु हमारा क्या कर सकती है?

10
जो काल के समान गंभीर हैं, कला के स्वरूप हैं, कालाग्नि हैं और काल का भी अंत करने वाले हैं —
मैं उन्हें सिर झुकाकर प्रणाम करता हूँ। मृत्यु हमारा क्या कर सकती है?

11
जो नीलकण्ठ हैं, विरूपाक्ष (विशाल नेत्रों वाले) हैं, निर्मल और निर्भय हैं —
मैं उन्हें प्रणाम करता हूँ। मृत्यु क्या कर लेगी?

12
जो वामदेव, महादेव, लोकों के स्वामी और जगतगुरु हैं —
मैं उन्हें सिर झुकाकर प्रणाम करता हूँ। मृत्यु से हमें डर नहीं।

13
जो देवों के भी देव, जगत के स्वामी, देवों के राजा और वृषध्वज (बैलध्वज) हैं —
मैं उन्हें प्रणाम करता हूँ। मृत्यु का भय नहीं।

14
जो अनन्त, अविनाशी, शांत, अक्षमाला धारण करने वाले हर (शिव) हैं —
मैं उन्हें प्रणाम करता हूँ। मृत्यु मेरा क्या कर लेगी?

15
जो परमानंद स्वरूप, शाश्वत, और मोक्ष देने वाले हैं —
मैं उन्हें सिर झुकाकर प्रणाम करता हूँ। फिर मृत्यु क्या कर सकती है?

16
जो स्वर्ग और मोक्ष दोनों देने में समर्थ हैं, सृष्टि, स्थिति और संहार के कर्ता हैं —
मैं उन्हें सिर झुकाकर प्रणाम करता हूँ। मृत्यु का भय नहीं।

लाभ (Benefits):

श्री मृत्युंजय स्तोत्र का पाठ करने से अनेक दिव्य और व्यावहारिक लाभ प्राप्त होते हैं:

  1. मृत्यु के भय से मुक्ति:
    यह स्तोत्र मृत्यु के समय भय, असहायता और पीड़ा को कम करता है और व्यक्ति को साहस प्रदान करता है।
  2. रोगों से मुक्ति:
    गंभीर बीमारियों, विशेष रूप से असाध्य रोगों में यह स्तोत्र आश्चर्यजनक रूप से लाभदायक माना गया है।
  3. नकारात्मक ऊर्जा से सुरक्षा:
    बुरी दृष्टि, भय, भूत-प्रेत बाधा, दुर्भाग्य आदि से रक्षा करता है।
  4. मानसिक शांति और आत्मबल की वृद्धि:
    लगातार पाठ से आत्मविश्वास बढ़ता है और चिंताओं का नाश होता है।
  5. परिवार की रक्षा:
    यह स्तोत्र पूरे परिवार पर सकारात्मक प्रभाव डालता है और घर में सुख-शांति बनाए रखता है।

पाठ विधि (Vidhi – How to Chant):

  1. शुभ समय चुनें:
    ब्रह्ममुहूर्त (सुबह 4 से 6 बजे) या संध्या समय उत्तम माना जाता है।
  2. स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें।
    सफेद या पीले वस्त्र शुभ माने जाते हैं।
  3. भगवान शिव की मूर्ति/चित्र के सामने दीपक जलाएं और सफेद पुष्प अर्पित करें।
  4. शिवलिंग पर जल या पंचामृत अर्पित करें (यदि संभव हो)।
  5. ॐ नमः शिवाय या महामृत्युंजय मंत्र का जाप करके ध्यान केंद्रित करें।
  6. अब श्री मृत्युंजय स्तोत्र का शांत और एकाग्र मन से पाठ करें।
    यदि आप चाहें तो 3, 5, 11 या 21 बार पाठ कर सकते हैं।
  7. पाठ के बाद शिवजी से प्रार्थना करें कि वे सभी कष्टों से रक्षा करें।

जाप का उपयुक्त समय (Jaap Time):

समयलाभ
ब्रह्ममुहूर्तआध्यात्मिक लाभ, रोग और भय से मुक्ति
प्रातःकालदिन भर ऊर्जा और सुरक्षा
संध्याकालमानसिक शांति, परिवार की रक्षा
अमावस्या/पूर्णिमाविशेष फलदायी, नकारात्मक ऊर्जा नाश के लिए
रोग या संकट में किसी भी समयतत्काल राहत और आत्मबल हेतु

विशेष सुझाव:

  • सोमवार, प्रदोष या महाशिवरात्रि के दिन इसका पाठ विशेष फलदायी माना जाता है।
  • यदि कोई व्यक्ति रोगग्रस्त है, तो उसके पास बैठकर या उसके लिए पाठ करना शुभ होता है।
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