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श्री प्रह्लाद कृतं गणेशा स्तोत्रं (Shri Prahlad Kritam-Ganesha Stotram)

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“श्री प्रह्लाद कृत गणेश स्तोत्र” एक दुर्लभ और गूढ़ तात्त्विक स्तोत्र है, जिसकी रचना भक्त प्रह्लाद जी ने भगवान गणेश की उपासना करते हुए की थी। यह स्तोत्र न केवल भक्ति का प्रतीक है, बल्कि गहन योगदर्शन, चित्तवृत्तियों, माया और मोक्ष के रहस्यों को भी अत्यंत सुंदर ढंग से प्रस्तुत करता है।

प्रह्लाद, जिन्हें भगवान विष्णु का अनन्य भक्त माना जाता है, इस स्तोत्र में भगवान गणनायक श्री गणेश की स्तुति करते हुए बताते हैं कि किस प्रकार चित्त की पाँच वृत्तियाँ, माया के दो स्वरूप, और सिद्धियों के मोह से बचकर साधक सम्पूर्ण योग और मोक्ष की प्राप्ति कर सकता है।

श्री प्रह्लाद कृत गणेश स्तोत्र

॥ श्री गणेशाय नमः ॥

अधुना शृणु देवस्य साधनं योगदं परम् ।
साधयित्वा स्वयं योगी भविष्यसि न संशयः ॥1॥

स्वानन्दः स्वविहारेण संयुक्तश्च विशेषतः ।
सर्वसंयोगकारित्वाद् गणेशो मायया युतः ॥2॥

विहारेण विहीनश्चाऽयोगो निर्मायिकः स्मृतः ।
संयोगाभेद हीनत्वाद् भवहा गणनायकः ॥3॥

संयोगाऽयोगयोर्योगः पूर्णयोगस्त्वयोगिनः ।
प्रह्लाद गणनाथस्तु पूर्णो ब्रह्ममयः परः ॥4॥

योगेन तं गणाधीशं प्राप्नुवन्तश्च दैत्यप ।
बुद्धिः सा पञ्चधा जाता चित्तरूपा स्वभावतः ॥5॥

तस्य माया द्विधा प्रोक्ता प्राप्नुवन्तीह योगिनः ।
तं विद्धि पूर्णभावेन संयोगाऽयोगर्वजितः ॥6॥

क्षिप्तं मूढं च विक्षिप्तमेकाग्रं च निरोधकम् ।
पञ्चधा चित्तवृत्तिश्च सा माया गणपस्य वै ॥7॥

क्षिप्तं मूढं च चित्तं च यत्कर्मणि च विकर्मणि ।
संस्थितं तेन विश्वं वै चलति स्व-स्वभावतः ॥8॥

अकर्मणि च विक्षिप्तं चित्तं जानीहि मानद ।
तेन मोक्षमवाप्नोति शुक्लगत्या न संशयः ॥9॥

एकाग्रमष्टधा चित्तं तदेवैकात्मधारकम् ।
सम्प्रज्ञात समाधिस्थम् जानीहि साधुसत्तम ॥10॥

निरोधसंज्ञितं चित्तं निवृत्तिरूपधारकम् ।
असम्प्रज्ञातयोगस्थं जानीहि योगसेवया ॥11॥

सिद्धिर्नानाविधा प्रोक्ता भ्रान्तिदा तत्र सम्मता ।
माया सा गणनाथस्य त्यक्तव्या योगसेवया ॥12॥

पञ्चधा चित्तवृत्तिश्च बुद्धिरूपा प्रकीर्तिता ।
सिद्ध्यर्थं सर्वलोकाश्च भ्रमयुक्ता भवन्त्यतः ॥13॥

धर्मा-ऽर्थ-काम-मोक्षाणां सिद्धिर्भिन्ना प्रकीर्तिता ।
ब्रह्मभूतकरी सिद्धिस्त्यक्तव्या पंचधा सदा ॥14॥

मोहदा सिद्धिरत्यन्तमोहधारकतां गता ।
बुद्धिश्चैव स सर्वत्र ताभ्यां खेलति विघ्नपः ॥15॥

बुद्ध्या यद् बुद्ध्यते तत्र पश्चान् मोहः प्रवर्तते ।
अतो गणेशभक्त्या स मायया वर्जितो भवेत् ॥16॥

पञ्चधा चित्तवृत्तिश्च पञ्चधा सिद्धिमादरात् ।
त्यक्वा गणेशयोगेन गणेशं भज भावतः ॥17॥

ततः स गणराजस्य मन्त्रं तस्मै ददौ स्वयम् ।
गणानां त्वेति वेदोक्तं स विधिं मुनिसत्तम ॥18॥

तेन सम्पूजितो योगी प्रह्लादेन महात्मना ।
ययौ गृत्समदो दक्षः स्वर्गलोकं विहायसा ॥19॥

प्रह्लादश्च तथा साधुः साधयित्वा विशेषतः ।
योगं योगीन्द्रमुख्यं स शान्तिसद्धारकोऽभवत् ॥20॥

विरोचनाय राज्यं स ददौ पुत्राय दैत्यपः ।
गणेशभजने योगी स सक्तः सर्वदाऽभवत् ॥21॥

सगुणं विष्णु रूपं च निर्गुणं ब्रह्मवाचकम् ।
गणेशेन धृतं सर्वं कलांशेन न संशयः ॥22॥

एवं ज्ञात्वा महायोगी प्रह्लादोऽभेदमाश्रितः ।
हृदि चिन्तामणिम् ज्ञात्वाऽभजदनन्यभावनः ॥23॥

स्वल्पकालेन दैत्येन्द्रः शान्तियोगपरायणः ।
शान्तिं प्राप्तो गणेशेनैकभावोऽभवतत्परः ॥24॥

शापश्चैव गणेशेन प्रह्लादस्य निराकृतः ।
न पुनर्दुष्टसंगेन भ्रान्तोऽभून्मयि मानद ॥25॥

एवं मदं परित्यज ह्येकदन्तसमाश्रयात् ।
असुरोऽपि महायोगी प्रह्लादः स बभूव ह ॥26॥

एतत् प्रह्लादमाहात्म्यं यः शृणोति नरोत्तमः ।
पठेद् वा तस्य सततं भवेदोप्सितदायकम् ॥27॥

॥ इति श्रीप्रहलाद कृत गणेश स्तोत्र सम्पूर्णम् ॥

श्री प्रह्लाद कृत गणेश स्तोत्र (हिंदी अनुवाद) (Ganesh Stotra by Shri Prahlad (Hindi translation))

॥ श्री गणेशाय नमः ॥

अब तुम भगवान का वह साधन सुनो जो श्रेष्ठ योग प्रदान करने वाला है।
उसे साधकर तू निश्चित रूप से योगी बन जाएगा। ॥1॥

जो स्वयं के आनंद में रहता है और विशेष रूप से अपने स्वभाव में स्थित है,
सभी संयोगों का कारण होने के कारण गणेश माया से युक्त हैं। ॥2॥

जो विहार से रहित है वह अयोग कहलाता है, जो माया रहित है वह स्मृतियों में आता है।
संयोग और अभेद के अभाव से, वह भव (जन्म-मरण) को हरने वाले गणनायक हैं। ॥3॥

संयोग और अयोग का जो योग है, वही पूर्ण योग है, जो योगीजन करते हैं।
प्रह्लाद के गणनाथ (गणेश) पूर्ण ब्रह्ममय और परब्रह्म स्वरूप हैं। ॥4॥

हे दैत्यपुत्र! योग के द्वारा जो गणाधीश को प्राप्त करते हैं,
उनकी बुद्धि स्वभावतः चित्तस्वरूप में पांच प्रकार की हो जाती है। ॥5॥

उनकी माया दो प्रकार की कही गई है, जिसे योगी प्राप्त करते हैं।
उसे पूर्ण भाव से जानो, जो संयोग और अयोग से रहित है। ॥6॥

क्षिप्त (चंचल), मूढ़ (जड़), विक्षिप्त (उलझी हुई), एकाग्र (एकाग्रचित्त) और निरुद्ध (नियंत्रित) –
ये चित्त की पाँच वृत्तियाँ हैं, और यही गणपति की माया कहलाती है। ॥7॥

जो चित्त क्षिप्त, मूढ़ और विक्षिप्त है, वह शुभ और अशुभ कर्मों में लगा रहता है।
ऐसे चित्त द्वारा ही यह समस्त विश्व अपने स्वभाव से चलायमान है। ॥8॥

हे मान्यवर! जो चित्त विक्षिप्त होकर निष्क्रिय हो जाता है,
उससे मनुष्य मोक्ष को प्राप्त करता है — इसमें कोई संदेह नहीं। ॥9॥

आठ प्रकार का जो एकाग्र चित्त है, वही आत्मा को धारण करने वाला होता है।
उसे सम्प्रज्ञात समाधि में स्थित जानो, हे श्रेष्ठ साधक! ॥10॥

जो चित्त निरोध कहलाता है, वह निवृत्ति रूप में धारित होता है।
उसे असम्प्रज्ञात योग में स्थित जानो, योग की सेवा द्वारा। ॥11॥

सिद्धियाँ अनेक प्रकार की बताई गई हैं, किंतु वे भ्रम को उत्पन्न करने वाली मानी गई हैं।
गणनाथ की वह माया योगसेवा द्वारा त्यागने योग्य है। ॥12॥

चित्त की पाँच वृत्तियाँ बुद्धिरूप में प्रसिद्ध हैं।
सभी लोक उनके द्वारा सिद्धि प्राप्त करना चाहते हैं, पर वे भ्रमयुक्त बन जाते हैं। ॥13॥

धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष – इन चारों की सिद्धियाँ भिन्न-भिन्न बताई गई हैं।
परंतु ब्रह्मभाव देने वाली पंचविध सिद्धियाँ सदा त्यागने योग्य हैं। ॥14॥

जो सिद्धियाँ मोह देने वाली हैं, वे अत्यंत भ्रम की धारक बन गई हैं।
और बुद्धि भी उसी प्रकार संपूर्ण जगत में भ्रमित होती है, जिससे विघ्नकर्ता खेलता है। ॥15॥

बुद्धि से जो समझा जाता है, उसके पीछे मोह कार्य करता है।
इसलिए गणेश की भक्ति के द्वारा ही उस माया से रहित हुआ जा सकता है। ॥16॥

पांच प्रकार की चित्तवृत्तियाँ और पांच प्रकार की सिद्धियाँ —
इनका त्याग करके गणेशयोग से गणेश का भावपूर्वक भजन करो। ॥17॥

तब स्वयं गणराज ने उसे मंत्र प्रदान किया —
“गणानां त्वा गणपतिं हवामहे” — यह वेद में कहा गया विधान है। ॥18॥

प्रह्लाद महान आत्मा द्वारा उस मंत्र से पूजन करने पर,
गृत्समद नामक दक्ष ऋषि आकाश मार्ग से स्वर्ग लोक चला गया। ॥19॥

प्रह्लाद ने भी उसी प्रकार विशेष रूप से योग साधा,
और वह महान योगी, शांतिदायक एवं परम योग का धारक बन गया। ॥20॥

उस दैत्य ने अपने पुत्र विरोचन को राज्य प्रदान किया।
और स्वयं गणेश के भजन में निरंतर लीन रहने वाला योगी बन गया। ॥21॥

सगुण विष्णु रूप और निर्गुण ब्रह्म —
सभी रूपों को गणेश ने अपने अंश से धारण किया है, इसमें कोई संशय नहीं। ॥22॥

ऐसा जानकर महायोगी प्रह्लाद अद्वैत भाव में स्थित हो गया।
उसने अपने हृदय में चित्तमणि को जानकर, एकनिष्ठ भाव से गणेश का भजन किया। ॥23॥

थोड़े ही समय में वह दैत्यराज शांत योग में प्रवृत्त हो गया।
गणेश द्वारा प्रदान की गई शांति के साथ वह एकभाव और तद्भाव में लीन हो गया। ॥24॥

गणेश ने प्रह्लाद को शाप से मुक्त कर दिया।
और वह कभी भी दुष्ट संगति में नहीं फंसा, हे मान्यवर! ॥25॥

इस प्रकार अहंकार को त्यागकर, एकदंत (गणेश) का आश्रय लो।
तब असुर भी महान योगी प्रह्लाद बन गया। ॥26॥

जो मनुष्य इस प्रह्लाद महात्म्य को सुनता या पढ़ता है,
उसे सतत मनवांछित फल की प्राप्ति होती है। ॥27॥

॥ इति श्रीप्रहलाद कृत गणेश स्तोत्र सम्पूर्णम् ॥

इस स्तोत्र की विशेषताएँ (Features of this hymn):

  • यह स्तोत्र केवल स्तुति नहीं है, बल्कि यह योग, साधना, चित्त की स्थितियाँ, समाधि और गणेश तत्व का दार्शनिक विवेचन भी करता है।
  • इसमें बताया गया है कि कैसे प्रह्लाद जैसे असुरकुल में जन्मे व्यक्ति ने भी गणेश भक्ति द्वारा परम शांति, ज्ञान और मोक्ष को प्राप्त किया।
  • यह स्तोत्र योगियों के लिए एक आध्यात्मिक मार्गदर्शक बनता है, जो साधना में चित्त की वृत्तियों, माया और सिद्धियों के प्रभाव को समझना चाहते हैं।

प्रमुख संदेश (Key Messages):

  • गणेश केवल विघ्नहर्ता नहीं, वे पूर्ण ब्रह्म स्वरूप भी हैं।
  • सच्ची भक्ति और योग के माध्यम से कोई भी — चाहे असुर हो या साधु — मोक्ष प्राप्त कर सकता है।
  • चित्त की वृत्तियों और माया का ज्ञान प्राप्त कर व्यक्ति शुद्ध बुद्धि और शांति को पा सकता है।

पाठ करने का लाभ (Benefit of Reciting):

  • यह स्तोत्र पढ़ने या सुनने से अध्यात्मिक ज्ञान, मानसिक शांति, सिद्धि से बचाव और मोक्ष की दिशा में मार्गदर्शन प्राप्त होता है।
  • यह साधक को गणेश योग से जोड़ता है और जीवन के समस्त विघ्नों का नाश करता है।

“श्री प्रह्लाद कृत गणेश स्तोत्र” केवल भक्ति नहीं, बल्कि ज्ञान और ध्यान की उस ऊँचाई पर पहुँचने का मार्ग है, जहाँ साधक गणेश तत्व में पूर्णतः एकाकार हो जाता है।

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