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श्री नरसिम्हा पंचामरुथा स्तोत्रं (Sri Narasimha Panchamrutha Stotram)

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“श्री नृसिंह पंचामृत स्तोत्र” एक दिव्य स्तोत्र है, जिसकी रचना स्वयं भगवान श्रीराम ने अहोबिल क्षेत्र में भगवान नृसिंह की स्तुति करते समय की थी। यह स्तोत्र भगवान विष्णु के उग्र और रक्षक स्वरूप श्री नृसिंह भगवान की महिमा का सार है, जिसे “पंचामृत” अर्थात पाँच अमृततुल्य श्लोकों के रूप में वर्णित किया गया है।

इस स्तोत्र में भगवान नृसिंह की अनंत शक्ति, अपरंपार कृपा, और भक्तों की रक्षा करने की क्षमता का आदरपूर्वक वर्णन किया गया है। यह भक्त को भय, संकट, और नकारात्मक ऊर्जा से मुक्त करता है और उसमें साहस, भक्ति और दिव्यता भरता है।

इस स्तोत्र के माध्यम से श्रीराम जी यह संदेश देते हैं कि जब भी जीवन में संकट आए, तब नृसिंह भगवान की शरण ही सर्वोत्तम मार्ग है।

जो भक्त श्रद्धा से इसका नित्य पाठ करते हैं, उन्हें धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष – चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति होती है। साथ ही, उन्हें भगवद्कृपा से लोक-परलोक में आनंद और शांति मिलती है।

श्री नृसिंह पंचामृत स्तोत्र
Sri Narasimha Panchamrutha Stotram

अहोबिलं नारसिंहं गत्वा रामः प्रतापवान् ।
नमस्कृत्वा श्रीनृसिंहं अस्तौषीत् कमलापतिम् ॥ १ ॥

गोविन्द केशव जनार्दन वासुदेव
विश्वेश विश्व मधुसूदन विश्वरूप ।
श्री पद्मनाभ पुरुषोत्तम पुष्कराक्ष
नारायणाच्युत नृसिंह नमो नमस्ते ॥ २ ॥

देवाः समस्ताः खलु योगिमुख्याः
गन्धर्व विद्याधर किन्नराश्च ।
यत्पादमूलं सततं नमन्ति तं
नारसिंहं शरणं गतोऽस्मि ॥ ३ ॥

वेदान् समस्तान् खलु शास्त्रगर्भान्
विद्याबले कीर्तिमतीं च लक्ष्मीम् ।
यस्य प्रसादात् सततं लभन्ते तं
नारसिंहं शरणं गतोऽस्मि ॥ ४ ॥

ब्रह्मा शिवस्त्वं पुरुषोत्तमश्च
नारायणोऽसौ मरुतां पतिश्च ।
चन्द्रार्क वाय्वग्नि मरुद्गणाश्च त्वमेव
तं त्वां सततं नतोऽस्मि ॥ ५ ॥

स्वप्नेऽपि नित्यं जगतां त्रयाणाम्
स्रष्टा च हन्ता विभुरप्रमेयः ।
त्राता त्वमेकस्त्रिविधो विभिन्नः
तं त्वां नृसिंहं सततं नतोऽस्मि ॥ ६ ॥

राघवेण कृतं स्तोत्रं पञ्चामृतमनुत्तमम् ।
पठन्ति ये द्विजवराः तेषां स्वर्गस्तु शाश्वतः ॥ ७ ॥

॥ इति श्री नृसिंह पंचामृत स्तोत्र सम्पूर्णम् ॥

श्री नृसिंह पंचामृत स्तोत्र (हिंदी अनुवाद) (Sri Nrisinha Panchamrit Stotram (Hindi translation))

पराक्रमी श्रीराम जी अहोबिल क्षेत्र में नृसिंह भगवान के दर्शन के लिए गए।
उन्होंने श्रीनृसिंह भगवान को प्रणाम करके, कमलपति विष्णु की स्तुति की। ॥ १ ॥

हे गोविंद! हे केशव! हे जनार्दन! हे वासुदेव!
हे विश्वेश्वर! हे संपूर्ण विश्व के रूप! हे मधुसूदन!
हे पद्मनाभ! हे पुरुषोत्तम! हे कमलनयन!
हे नारायण! हे अच्युत! हे नृसिंह! आपको बार-बार नमस्कार है। ॥ २ ॥

सभी देवता, प्रमुख योगी,
गंधर्व, विद्याधर और किन्नरगण –
सभी सदा जिनके चरणकमलों की वंदना करते हैं,
मैं उसी नृसिंह भगवान की शरण में हूँ। ॥ ३ ॥

जो सभी वेदों को, समस्त शास्त्रों की गहराइयों को,
विद्या, बल, कीर्ति और लक्ष्मी को
अपने कृपा से सहज ही प्रदान करते हैं,
मैं ऐसे नृसिंह भगवान की शरण में हूँ। ॥ ४ ॥

आप ही ब्रह्मा हैं, आप ही शिव हैं, आप ही पुरुषोत्तम हैं,
आप ही नारायण हैं, और आप ही वायु देवों के स्वामी हैं।
चंद्रमा, सूर्य, वायु, अग्नि और मरुद्गण – आप ही वह सब हैं,
मैं सदैव आपको नमन करता हूँ। ॥ ५ ॥

आप ही सदा तीनों लोकों के
स्वप्न में भी सृजनहार, संहारक और
असीम शक्ति से युक्त पालक हैं।
आप त्रिविध रूपों में एक ही हैं –
ऐसे नृसिंह भगवान को मैं सदा नमन करता हूँ। ॥ ६ ॥

परम उत्तम यह पंचामृत स्तोत्र श्रीराम द्वारा रचा गया है।
जो भी श्रेष्ठ ब्राह्मण इसका पाठ करते हैं,
उन्हें नित्य शाश्वत स्वर्ग की प्राप्ति होती है। ॥ ७ ॥

॥ इति श्री नृसिंह पंचामृत स्तोत्र सम्पूर्णम् ॥

लाभ (Benefits) of Shri Narasimha Panchamrutha Stotram

  1. भय और संकट से रक्षा:
    यह स्तोत्र विशेष रूप से भय, शत्रु बाधा, बुरी शक्तियों, और मानसिक क्लेश से बचाने में सहायक है।
    भगवान नृसिंह को रक्षक अवतार कहा गया है – जो अपने भक्तों की रक्षा हेतु प्रकट होते हैं।
  2. नकारात्मक ऊर्जा का नाश:
    स्तोत्र का नियमित पाठ घर, कार्यस्थल या किसी भी स्थान की नकारात्मकता को समाप्त करता है और सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है।
  3. साहस और आत्मबल की वृद्धि:
    यह स्तोत्र हृदय में आत्मविश्वास, साहस और निर्भयता उत्पन्न करता है, जिससे व्यक्ति निर्णय लेने और कठिन समय से जूझने में समर्थ बनता है।
  4. आरोग्यता और मानसिक शांति:
    भगवान नृसिंह की कृपा से शारीरिक-मानसिक रोगों से मुक्ति, भयमुक्त निद्रा और संतुलित चित्त की प्राप्ति होती है।
  5. पापों का क्षय और मोक्ष की ओर अग्रसरता:
    यह स्तोत्र पापों का नाश करता है और आध्यात्मिक उन्नति की ओर ले जाता है।
  6. श्रीराम जी के भाव से किया गया स्तवन:
    चूंकि इसे श्रीराम ने रचा माना जाता है, इसलिए यह स्तोत्र विष्णु और नृसिंह भक्ति के उच्चतम रूप में प्रतिष्ठित है।

पाठ विधि (Path Vidhi)

  1. शुद्धता:
    स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजा स्थल पर दीपक और अगरबत्ती जलाएं।
  2. आसन:
    पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके कम्बल/कुशासन पर बैठें।
  3. आवश्यक सामग्री:
    दीपक, फूल, अक्षत (चावल), जल, श्रीनृसिंह जी की मूर्ति या चित्र, घंटी।
  4. ध्यान:
    पहले भगवान नृसिंह का ध्यान करें – उनके सिंहवदन रूप, उनके नख, उनकी उग्र मुद्रा और करुणा को स्मरण करें।
  5. पाठ आरंभ:
    “ॐ श्रीं नमो भगवते नृसिंहाय” मंत्र से प्रारंभ करें। फिर श्रद्धा से नृसिंह पंचामृत स्तोत्र का पाठ करें।
  6. पाठ के बाद:
    “नृसिंह गायत्री मंत्र” या “नृसिंह कवच” का संक्षिप्त जाप करें। अंत में प्रार्थना करें: “हे प्रभु, मेरी रक्षा करें, मेरे भय को दूर करें, और मुझे धर्मपथ पर अग्रसर करें।”

जाप का उचित समय (Jaap Time)

समयमहत्व
प्रातः काल (4:00–6:00 AM)सबसे उत्तम समय – मन शांत होता है, ध्यान गहरा होता है।
संध्या काल (6:00–7:30 PM)गृहस्थों के लिए उपयुक्त – नकारात्मकता दूर होती है।
असाधारण परिस्थिति मेंजैसे डरावने सपने, भय, मानसिक चिंता या शत्रु बाधा हो, तब किसी भी समय इसका पाठ करें।
विशेष तिथि:नृसिंह जयंती, होलिका दहन के बाद, चतुर्दशी, मंगलवार और शनिवार को पाठ करने से विशेष फल मिलता है।
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