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श्री त्रिपुर सुंदरी स्तोत्रम् (Shri Tripura Sundari Stotram)

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त्रिपुरसुंदरी देवी को सौंदर्य, शक्ति और करुणा की अधिष्ठात्री देवी माना जाता है। उन्हें “षोडशी” यानी सोलह वर्ष की अलौकिक कन्या भी कहा जाता है। त्रिपुरा का अर्थ होता है – तीन लोक या तीन नगर, और सुंदरि का अर्थ है – अति सुंदर नारी। इस तरह त्रिपुरसुंदरी का अर्थ हुआ – तीनों लोकों की सुंदरता की प्रतीक देवी

त्रिपुरसुंदरी देवी को ललिता, राजराजेश्वरी और महा त्रिपुरसुंदरी नामों से भी जाना जाता है। वे दस महाविद्याओं में सर्वोच्च मानी जाती हैं और आदि पराशक्ति का परम रूप मानी जाती हैं। श्रीविद्या साधना और तंत्र परंपरा में इनका अत्यंत विशेष स्थान है। त्रिपुरोपनिषद में इन्हें सृष्टि की सर्वोच्च ऊर्जा बताया गया है।

यह भी कहा गया है कि त्रिपुरसुंदरी देवी, भगवान शिव के कामेश्वर रूप की अर्धांगिनी हैं – जो “इच्छा के स्वामी” कहे जाते हैं। इस देवी की कथा में वर्णन मिलता है कि जब भंडासुर नामक राक्षस ने देवताओं को सताना शुरू किया, तब परमशक्ति के रूप में त्रिपुरसुंदरी प्रकट हुईं और उन्होंने भंडासुर का वध कर देवताओं को मुक्ति दिलाई।

श्री त्रिपुरसुंदरी स्तोत्रम् (Shri Tripura Sundari Stotram)

कदंबवनचारिणीं मुनिकदम्बकादंविनीं,
नितंबजितभूधरां सुरनितंबिनीसेविताम्।
नवंबुरुहलोचनामभिनवांबुदश्यामलां,
त्रिलोचनकुटुम्बिनीं त्रिपुरसुंदरीमाश्रये॥

कदंबवनवासिनीं कनकवल्लकीधारिणीं,
महार्हमणिहारिणीं मुखसमुल्लसद्वारुणींम्।
दया विभव कारिणी विशद लोचनी चारिणी,
त्रिलोचन कुटुम्बिनी त्रिपुर सुंदरी माश्रये॥

कदंबवनशालया कुचभरोल्लसन्मालया,
कुचोपमितशैलया गुरुकृपालसद्वेलया।
मदारुणकपोलया मधुरगीतवाचालया,
कयापि घननीलया कवचिता वयं लीलया॥

कदंबवनमध्यगां कनकमंडलोपस्थितां,
षडंबरुहवासिनीं सततसिद्धसौदामिनीम्।
विडंवितजपारुचिं विकचचंद्रचूडामणिं,
त्रिलोचनकुटुंबिनीं त्रिपुरसुंदरीमाश्रये॥

कुचांचितविपंचिकां कुटिलकुंतलालंकृतां,
कुशेशयनिवासिनीं कुटिलचित्तविद्वेषिणीम्।
मदारुणविलोचनां मनसिजारिसंमोहिनीं,
मतंगमुनिकन्यकां मधुरभाषिणीमाश्रये॥

स्मरेत्प्रथमपुष्प्णीं रुधिरबिन्दुनीलांबरां,
गृहीतमधुपत्रिकां मधुविघूर्णनेत्रांचलाम्।
घनस्तनभरोन्नतां गलितचूलिकां श्यामलां,
त्रिलोचनकुटंबिनीं त्रिपुरसुंदरीमाश्रये॥

सकुंकुमविलेपनामलकचुंबिकस्तूरिकां,
समंदहसितेक्षणां सशरचापपाशांकुशाम्।
असेष जनमोहिनी मरूण माल्य भुषाम्बरा,
जपाकुशुम भाशुरां जपविधौ स्मराम्यम्बिकाम॥

पुरम्दरपुरंध्रिकां चिकुरबंधसैरंध्रिकां,
पितामहपतिव्रतां पटुपटीरचर्चारताम्।
मुकुंदरमणीं मणिलसदलंक्रियाकारिणीं,
भजामि भुवनांबिकां सुरवधूटिकाचेटिकाम॥

।। इति श्री त्रिपुरसुंदरी स्तोत्रम् संपूर्णम्।।

श्री त्रिपुरसुंदरी स्तोत्रम् – हिंदी अनुवाद (Sri Tripurasundari Stotram – Hindi Translation)

जो कदंब वन में विचरण करती हैं, मुनियों के समूह द्वारा पूजित हैं,
जिनका नितंब पर्वतों को भी पराजित करता है, देवांगनाएँ जिनकी सेवा करती हैं,
जिनकी आँखें नव खिले कमलों जैसी हैं, जो नये बादल जैसी श्यामल हैं,
त्रिनेत्रधारी भगवान शिव के कुल की स्वामिनी त्रिपुरसुंदरी की मैं शरण लेता हूँ॥

जो कदंब वन में निवास करती हैं, स्वर्ण वीणा धारण किए रहती हैं,
कीमती हारों से विभूषित हैं, जिनके मुख पर वारुणी (मदिरा) की आभा झलकती है,
जो करुणा और ऐश्वर्य की साक्षात रूप हैं, जिनकी आँखें उज्जवल हैं और स्वच्छंद विचरण करती हैं,
त्रिनेत्रधारी के कुल की स्वामिनी त्रिपुरसुंदरी की मैं शरण लेता हूँ॥

जो कदंब वन के भवन में निवास करती हैं, जिनके स्तनों का भार पुष्पमालाओं को ढँक देता है,
जिनके स्तन पर्वतों के समान हैं, जो गुरु की कृपा की सरिता हैं,
जिनके कपोल (गाल) मादक अरुण रंग के हैं, जिनकी वाणी मधुर गीतों से भरपूर है,
जो घने नील वर्ण में लिपटी हुई हैं, और अपनी लीला से हमारी रक्षा करती हैं॥

जो कदंब वन के मध्य में विराजमान हैं, स्वर्णमय मंडल में स्थित हैं,
जो छह कमलों में निवास करती हैं, सिद्धों की विद्युत के समान तेजस्विनी हैं,
जिनके जप का तेज चमकता है, जो खिले हुए चंद्र के समान मुकुट धारण करती हैं,
त्रिनेत्रधारी शिव के कुल की स्वामिनी त्रिपुरसुंदरी की मैं शरण लेता हूँ॥

जिनके स्तन वीणा जैसे ऊँचे हैं, जिनकी लटें सुंदर रूप से सजी हैं,
जो कमल के आसन पर निवास करती हैं, कुटिल हृदय वाले लोगों की शत्रु हैं,
जिनकी आँखें मादक अरुण रंग की हैं, जो कामदेव के शत्रु शिव को भी मोहित करती हैं,
जो मुनि मतंग की पुत्री हैं, मधुर वाणी से बोलने वाली हैं — उन्हें मैं शरण में लेता हूँ॥

जो प्रथम पुष्प जैसी स्मरणीय हैं, रक्त बिंदु जैसी नीले वस्त्रों वाली हैं,
जिनके हाथ में मधुमक्खियों से बनी पंखी है, जिनकी दृष्टि मत्त मधु की तरह चंचल है,
जिनके स्तनों का भार विशाल है, जिनकी जूड़ा खुल गई है, और जो श्यामवर्णा हैं,
त्रिनेत्रधारी शिव के कुल की स्वामिनी त्रिपुरसुंदरी की मैं शरण लेता हूँ॥

जो कुमकुम से लिपटी हैं, बालों में कस्तूरी की महक है,
जिनकी दृष्टि मंद-मंद मुस्कान वाली है, हाथों में बाण, धनुष, पाश और अंकुश हैं,
जो सम्पूर्ण जगत को मोहित करने वाली हैं, रक्तवर्ण माला और वस्त्र धारण करती हैं,
जपाकुसुम के समान दमकती हैं — मैं जप करते समय अम्बा देवी का स्मरण करता हूँ॥

जो इंद्र की पत्नी शची की जैसी प्रतीत होती हैं, जिनके बालों में सखी सौंदर्यसज्जा करती हैं,
जो ब्रह्मा की बहू (पतिव्रता) हैं, जो चतुर स्त्रियों की पूजा में रत रहती हैं,
जो भगवान विष्णु की प्रिया हैं, जो रत्नों से सजे अलंकरण करती हैं,
मैं उस भुवन की अम्बा, देवांगनाओं की अधीक्षिका देवी की भक्ति करता हूँ॥

।। इस प्रकार श्री त्रिपुरसुंदरी स्तोत्र का हिंदी अनुवाद संपूर्ण हुआ ।।

श्री त्रिपुरसुंदरी स्तोत्र पाठ के लाभ (Benefits of reciting Shri Tripurasundari Stotra)

  • विवाह में विलंब, वैवाहिक कलह, या संतान प्राप्ति की समस्या से ग्रसित व्यक्तियों के लिए यह स्तोत्र अत्यंत प्रभावी है।
  • आर्थिक तंगी, कर्ज़, दुर्भाग्य और ग्रहबाधाओं विशेषकर बुध ग्रह के दोष से मुक्ति दिलाने वाला यह स्तोत्र परम फलदायक है।
  • यह स्तोत्र साधक को सौंदर्य, यश, आकर्षण शक्ति और मानसिक शांति प्रदान करता है।
  • देवी त्रिपुरसुंदरी की कृपा से साधक को आत्मिक शुद्धि और आध्यात्मिक उन्नति भी प्राप्त होती है।

किसे करना चाहिए यह स्तोत्र पाठ (Who should recite this hymn?)

  • जिन व्यक्तियों की शादी में अड़चनें आ रही हों।
  • जिनके जीवन में आर्थिक तंगी या कर्ज़ की समस्या हो।
  • जिनके दांपत्य जीवन में शांति और प्रेम की कमी हो।
  • जिन्हें बुध ग्रह की अशुभ दशा या प्रभाव से पीड़ा हो।
  • जो देवी साधना, श्रीविद्या या महाविद्या मार्ग में अग्रसर हों।
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