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महागणपति स्तोत्र (Mahaganpati Stotra)

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श्री गणेश — विघ्नों के नाशक, बुद्धि और सिद्धि के अधिपति, प्रथम पूज्य देवता हैं। उनके विविध स्वरूपों में “महागणपति” का स्थान अत्यंत विशेष और रहस्यमयी है। यह स्वरूप केवल विघ्नहर्ता ही नहीं, बल्कि समस्त ब्रह्मांडीय शक्तियों के समन्वय का भी प्रतीक है। महागणपति स्तोत्र उन्हीं के इस महाशक्तिशाली रूप की स्तुति में रचा गया एक अद्भुत स्तोत्र है।

इस स्तोत्र में गणपति के दिव्य स्वरूप, उनके शक्तिशाली अस्त्र-शस्त्र, उनके वाहन, गणों, उनकी शक्तियों और सिद्धियों का विस्तृत वर्णन मिलता है। यह स्तोत्र न केवल काव्यात्मक सौंदर्य से परिपूर्ण है, बल्कि तांत्रिक दृष्टि से भी अत्यंत प्रभावशाली और रहस्यमयी माना जाता है। इसमें गणपति को षट्कोण, त्रिकोण, अक्षरब्रह्म, कल्पवृक्ष, कमल, रत्नमय द्वीप, अमृत तरंगों और दिव्य देवियों के बीच प्रतिष्ठित किया गया है — जो दर्शाता है कि यह स्तोत्र साधारण स्तुति नहीं, बल्कि गणपति के परम रहस्य और आध्यात्मिक गूढ़ता का साक्षात् स्त्रोत है।

महागणपति स्तोत्र (Mahaganpati Stotra)

योगं योगविदां विधूतविविधव्यासंगशुद्धा शयप्रादुर्भूतसुधारसप्रस्रमरध्यानास्पदाध्यासिनाम्।
आनन्दप्लवमानबोधमधुरामोदच्छटामेदुरं तं भूमानमुपास्महे परिणतं दन्तावलास्यात्मना।। 1

तारश्रीपरशक्तिकामवसुधारुपानुगं यं विदुस्तस्मै स्यात्प्रणतिर्गुणाधिपतये यो रागिणाऽभ्यथ्र्यते।
आमन्त्र्य प्रथमं वरेति वरदेत्यार्तेन सर्वं जनं स्वामिन्मे वशमानयेति सततं स्वाहादिभि: पूजित:।। 2

कल्लोलाञ्चलचुम्बिताम्बुदतताविक्षुद्रवाम्भो निधौ द्वीपे रत्नमये सुरद्रुमवनामोदैकमेदस्विनि।
मूले कल्पतरोर्महापणिमये पीठेऽक्षराम्भोरुहे षट्कोणाकलित-त्रिकोणरचनासत्कीर्णकेऽमुं भजे।। 3

चक्रप्रासरसालकार्मुकगदासद्विजपूरद्विज ब्रीहाग्रोत्पलपाशपंकजकरं शुंडाग्रजाग्रद्घटम।
आश्लिष्टं प्रियया सरोजकरया रत्नस्फुरद्भूषया माणिक्यप्रतिमं महागणपतिं विश्र्वेशमाशास्महे।। 4

दानाम्भ: परिमेदुरप्रस्रमरव्यालम्बिरोलम्बभ्रत्सिन्दूरारुणगंडमण्डलयुगव्याजात्प्रशस्तिद्वयम्।
त्रैलोक्येष्टविधानवर्णसुभंग य: पद्मरागोपमं धत्ते स श्रियमातनोतु सततं देवो गणानां पति:।। 5

भ्राम्यन्मन्दरघूर्णनापरवशक्षीराब्धिवीचिच्छटासच्छायाश्र्चलचामरव्यतिकरश्रीगर्वसवंकषा:।
दिक्कांताघनसारचन्दनरसासाराश्रयन्तां मन: स्वच्छन्दप्रसरप्रलिप्तवियतो हेरम्बदन्तत्विष:।। 6

मुक्ताजालकरम्बितप्रविकसन्माणिक्यपुंजच्छटाकांता: कम्बुकदम्बचुम्बितवनाभोगप्रवालोपमा:।
ज्योत्स्नापूरतरंगमन्थरतरत्सन्ध्यावयवश्रिचरं हेरम्बस्य जयन्ति दन्तकिरणाकीर्णा: शरीरत्विष:।। 7

शुंडाग्राकलितेन हेमकमलशेनावर्जितेन क्षरन्नानारत्नचयेन साधकजनान्संभावयन्कोटिश:।
दानामोदविनोदलुब्धमधुपप्रोत्सारणाविर्भवत्कर्णान्दोलनचखेलनो विजयते देवो गणग्रामणी:।। 8

हेरम्बं प्रणमामि यस्य पुरत: शाण्डिल्यमूले श्रिया बिभ्रत्याम्बुरुहे समं मधुरिपुस्ते शंखचक्रे वहन्।
न्यग्रोधस्य तले सहाद्रिसुतया शंभुस्तथा दक्षिणे विभ्राण: परशुं त्रिशूलमितया देव्या धरण्या सह।। 9

पश्र्चात्पिप्पलमाश्रितो रतिपतिर्देवस्य रत्योत्पले बिभ्रत्या सममैक्षवं धनूरिषून्पौष्पान्वहन्पंच च।
वामे चक्रगदाधर: स भगवान्क्रोड: प्रियंगोस्तले हस्तोद्च्छुकशालि-मंजरिकाया देव्या धरण्या सह।। 10

षट्कोणाश्रिषु षट्सु पंकजमुखा: पाशांकुशाभयवरान्बिभ्रणा: प्रमदासखा: पृथुमहाशोणाश्मपुंजत्विष:।
आमोद: पुरत: प्रमोदसुमुखौ तं चाभितो दुर्मुख: पश्र्चात्पार्श्र्वगतोऽस्य विघ्न इति यो यो विघ्नकर्तेति च।। 11

आमोदादिगणेश्वरप्रियतमास्तत्रैव नित्यं स्थिता: कांताश्लेषरसज्ञमन्थरदृश: सिद्धि: समृद्धिस्तत:।
कान्तिर्या मदनावतीत्यपि तथा कल्पेषु या गीयते साऽन्या यापि मदद्रवा तदपरा द्राविण्यभू: पूजिता:।। 12

आश्लिष्टा वसुधेत्यथो वसुमती ताभ्यां सितालोहितौ वर्षन्तौ वसुपार्श्र्वयोर्विलसतस्तौ शंखपद्मौ निधी।
अंगान्यन्वथ मातरश्च परित: शुक्रादयोऽब्जाश्रयास्तद्वाहमो कुलिशादय: परिपतत्कालानल-ज्योतिष:।। 13

इत्थं विष्णुशिवादितत्त्वतनवे श्रीवक्रतुंडाय हुंकाराक्षिप्तसमस्तदैत्यपृतनाव्राताय दीप्तत्विषे।
आनन्दैकरसावबोधलहरीविध्वस्तसर्वोर्मये सर्वत्र प्रथमानमुग्धमहसे तस्मै परस्मै नम:।। 14

सेवाहेवाकिदेवासुरनरनिकरस्फारकीटोरकोटीकोटिव्याटीकमानद्युमणिसममणिश्रेणिभावेणिकानाम।
राजन्नीराजनश्रीमुखचरणखद्योतविद्योतमान: श्रेय: स्थेय: स देयान्मम विमलदृशो बन्धुरं सिन्धुरास्य:।। 15

एतेन प्रकटरहस्यमन्त्रमालागर्भेण स्फुटतरसंविदा स्तवेन।
य: स्तौति प्रचुरतरं महागणेशं तस्येयं भवति वशंवदा त्रिलोकी।। 16

॥ इति महागणपति स्तोत्र सम्पूर्णम् ॥

महागणपति स्तोत्र का हिन्दी अनुवाद

जो योगियों के लिए योग स्वरूप हैं, जिनकी उपस्थिति से विवेक उत्पन्न होता है,
जो ध्यान में आनंद रस से परिपूर्ण दिखाई देते हैं – ऐसे महागणपति को हम नमन करते हैं,
जो हाथी के समान मुख में परिणत होकर दिव्यता के प्रतीक हैं।

जिन्हें तारक, लक्ष्मी और शक्ति रूपी देवियाँ भी जानती हैं,
जो सभी गुणों के अधिपति हैं और भक्तों को वरदान देते हैं,
जो “स्वाहा” आदि मंत्रों द्वारा सदा पूजित रहते हैं – उन्हें मैं नमन करता हूँ।

रत्नमयी द्वीप के भीतर, दिव्य वृक्षों और अमृत के जल से भरपूर क्षेत्र में,
कल्पवृक्ष की जड़ों के पास, महान पद्म के केंद्र में,
षट्कोण और त्रिकोण युक्त पवित्र स्थान पर स्थित गणेशजी को मैं भजता हूँ।

जो चक्र, गदा, धनुष, बाण, पाश आदि आयुधों से सुशोभित हैं,
जिनके हाथों में चावल, नीला कमल, और जलपात्र हैं,
जो अपनी प्रिय देवी के साथ, रत्नाभूषणों से सुसज्जित हैं – ऐसे महागणपति को मैं नमस्कार करता हूँ।

जिनका मुख सिंदूरी आभा से चमकता है,
जिनके मुख की शोभा दो विशाल गालों से है,
जो तीनों लोकों में आदर के पात्र हैं – ऐसे देवताओं के अधिपति श्री गणेश हमारी रक्षा करें।

मंदराचल के घूमने से निकली क्षीर सागर की लहरों से उनकी शोभा बढ़ती है,
श्वेत चामरों से उनका सम्मान होता है,
जिनके दांतों की चमक दिशाओं को आलोकित करती है – ऐसे हेरम्ब गणेश का ध्यान करें।

जिनके शरीर की आभा मोतियों और माणिक्यों की किरणों से उज्जवल है,
जो चंद्रप्रकाश और संध्या की लालिमा से भी सुंदर हैं,
उनके दांतों से निकलती दिव्य ज्योति सारे शरीर को प्रकाशित करती है।

जिनकी सूंड से सोने का कमल लटकता है,
जो विविध रत्नों से साधकों का सम्मान करते हैं,
जो मधु-लोभी भौंरों को आकर्षित कर खेलते हैं – ऐसे गणेशजी को बारंबार वंदन।

मैं उस हेरम्ब को प्रणाम करता हूँ, जिनके समक्ष लक्ष्मी कमल पर विराजती हैं,
और मधुसूदन उनके साथ शंख और चक्र धारण करते हैं,
शिवजी, पार्वती के साथ, उनके दक्षिण में हैं, हाथ में त्रिशूल और परशु लिए हुए।

पीछे कामदेव पीपल के नीचे खड़े हैं,
बाएं ओर चक्र और गदा धारण करने वाले विष्णु हैं,
और पास में हाथ में शालि धान की बाल लिए देवी हैं।

षट्कोण के छः स्थानों पर छह कमल स्वरूप गणपति उपस्थित हैं,
जो पाश, अंकुश, अभय और वरमुद्रा धारण किए हैं,
आगे आमोद, प्रमोद, सुमुख और पीछे दुर्मुख – सभी विघ्नहर्ता हैं।

आमोद आदि गणेशों की प्रिय पत्नियाँ सदा उनके संग हैं,
सिद्धि, समृद्धि, कान्ति और द्राविणी (धन की देवी) सदा उनकी सेवा में रहती हैं।
जो प्रेम और रस की ज्ञाता हैं, जो कामिनी से भी अधिक सुंदर हैं – वे सभी पूज्य हैं।

धरती माँ को आलिंगनबद्ध किए हुए,
सफ़ेद और लाल रंग के दो रत्नस्वरूप निधि (शंख और पद्म) उनके पास हैं,
चारों ओर मातृशक्ति विराजित हैं, शुक्रादि ग्रह, उनके वाहक, अस्त्र लिए हैं।

जो विष्णु और शिव के सार रूप हैं,
जिनके हुंकार से समस्त दैत्य सेनाएं नष्ट हो जाती हैं,
जो आनंद और ज्ञान के सागर हैं – ऐसे परात्पर महागणपति को मैं नमन करता हूँ।

जिनकी सेवा करोड़ों देव, असुर और कीट तक करते हैं,
जो रत्नों की ज्योति से दमकते हैं,
जिनके चरणों से मंगल प्रकाशित होता है – वे मेरे जीवन में कल्याण और स्थिरता लाएं।

जो इस स्तोत्र को, जो रहस्यमयी मंत्रमाला से युक्त है,
श्रद्धा और ज्ञान से पढ़ता है,
उसके लिए यह समस्त त्रिलोकी को वश में करने वाला बन जाता है।

॥ इति महागणपति स्तोत्रम् हिन्दी अनुवाद सम्पूर्णम् ॥

महागणपति स्तोत्र के लाभ

  1. विघ्नों का नाश होता है – कोई भी कार्य बिना बाधा के पूर्ण होता है।
  2. शत्रु नाशक – शत्रुओं की चालें निष्फल हो जाती हैं, कोर्ट केस या सरकारी परेशानियों से मुक्ति मिलती है।
  3. धन, बुद्धि और विवेक में वृद्धि – व्यापार, पढ़ाई, निर्णय क्षमता में सुधार आता है।
  4. संकटमोचन – जीवन के हर क्षेत्र में आने वाले संकटों से रक्षा होती है।
  5. तांत्रिक/रहस्यमयी साधना के लिए उपयुक्त – यह स्तोत्र तंत्र-साधकों के लिए भी अत्यंत फलदायक है।
  6. सपनों और मानसिक भ्रमों से छुटकारा – अनजाने भय, चिंता, भ्रम, और मानसिक दुर्बलता दूर होती है।
  7. योग और ध्यान में सफलता – जो साधक आत्मिक उन्नति या कुंडलिनी जागरण की ओर बढ़ रहे हैं, उन्हें विशेष फल मिलता है।
  8. गुप्त विद्याओं और सिद्धियों की प्राप्ति – यह स्तोत्र विशेषतः महागणपति की तांत्रिक आराधना से जुड़ा है, जिससे दुर्लभ सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं।
  9. शांत, संतुलित और प्रभावशाली व्यक्तित्व की प्राप्ति – साधक का तेज बढ़ता है।

🙏 महागणपति स्तोत्र पाठ विधि (Vidhi)

  1. शुभ दिन चुनें – बुधवार, चतुर्थी तिथि, अथवा कोई भी शुभ मुहूर्त।
  2. स्नान कर शुद्ध वस्त्र पहनें, विशेष रूप से हरे या पीले रंग के वस्त्र उत्तम माने जाते हैं।
  3. पूजा स्थान पर श्री गणेश जी की प्रतिमा/चित्र स्थापित करें।
  4. उन्हें दूर्वा, लाल फूल, मोदक, गुड़, और गंध अर्पित करें।
  5. एक दीपक और धूप जलाएं।
  6. “ॐ गं गणपतये नमः” बीज मंत्र से ध्यान करें।
  7. फिर महागणपति स्तोत्र का श्रद्धा से पाठ करें।
  8. अंत में आरती करें और प्रसाद वितरण करें।
  9. यदि संभव हो तो 11, 21 या 108 बार पाठ का अनुष्ठान करें।

🕯️ जप / पाठ का श्रेष्ठ समय (Best Time to Chant)

समयफल
प्रातः काल (4:00 AM – 6:00 AM)ध्यान के साथ पाठ करने पर विशेष तेज और शांति मिलती है।
चतुर्थी तिथि (शुक्ल या कृष्ण पक्ष)गणेश जी को अत्यंत प्रिय, विशेष फलदायी।
बुधवारबुद्धि, विवेक और व्यापार में उन्नति के लिए उत्तम।
गणेश चतुर्थी, संकष्टी चतुर्थीइन विशेष पर्वों पर पाठ करने से सौ गुना फल मिलता है।
रोजाना रात में (सोने से पहले)चित्त शुद्ध होता है और विघ्न-दोष समाप्त होते हैं।
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