श्री कुंजबिहारी जी की आरती का महत्व (Importance of Shri Kunjbihari Ji’s Aarti)
आदित्य हृदय स्तोत्र (Aditya Hridaya Stotra)
भगवान श्रीकृष्ण के अनेक स्वरूपों में से एक अत्यंत प्रिय स्वरूप है श्री कुंजबिहारी जी। “कुंजबिहारी” का अर्थ है – वे भगवान जो वृंदावन के कुंजों और उपवनों में विहार करते हैं। यह नाम विशेष रूप से राधा-कृष्ण की दिव्य लीलाओं से जुड़ा हुआ है। उत्तर भारत के अनेक मंदिरों और घरों में श्री कुंजबिहारी जी की आरती अत्यंत श्रद्धा और भक्ति के साथ गाई जाती है।
सनातन परंपरा में माना जाता है कि किसी भी पूजा, जप, अनुष्ठान या भक्ति साधना की पूर्णता आरती के बिना नहीं होती। आरती केवल दीप प्रज्वलित करके भगवान के समक्ष घुमाने की क्रिया नहीं है, बल्कि यह भक्त के हृदय में बसे प्रेम, श्रद्धा और समर्पण की अभिव्यक्ति है। जब भक्त श्री कुंजबिहारी जी की आरती गाते हैं, तब वे भगवान श्रीकृष्ण की सुंदर छवि, उनकी मधुर मुरली, मोर मुकुट, बैजंती माला और उनकी अलौकिक लीलाओं का स्मरण करते हैं।
ऐसी मान्यता है कि इस आरती के नियमित पाठ से घर और परिवार में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। भगवान श्रीकृष्ण की कृपा से मन की अशांति दूर होती है और भक्त के जीवन में प्रेम, आनंद तथा संतोष की वृद्धि होती है। जो लोग मानसिक तनाव, चिंता या जीवन की कठिनाइयों से गुजर रहे हों, उनके लिए भी यह आरती आध्यात्मिक शांति का माध्यम बन सकती है।
भक्तों का विश्वास है कि श्री कुंजबिहारी जी की आरती करने से घर में सुख-समृद्धि बनी रहती है, नकारात्मक शक्तियों का प्रभाव कम होता है और परिवार के सदस्यों के बीच प्रेम एवं सौहार्द बढ़ता है। विशेष रूप से जन्माष्टमी, राधाष्टमी, गोवर्धन पूजा, एकादशी तथा अन्य वैष्णव पर्वों पर इस आरती का पाठ अत्यंत शुभ माना जाता है।
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ऐसा कहा जाता है कि कोई भी पूजा आरती के बिना पूर्ण नहीं होती। उत्तर भारत में श्री कुंजबिहारी जी, अर्थात भगवान श्री कृष्ण की आरती का विशेष महत्व है। उनकी आरती के बिना उनकी पूजा अधूरी मानी जाती है। श्री कुंजबिहारी जी की आरती से घर में नकारात्मक शक्तियां प्रवेश नहीं करतीं और सभी प्रकार के दुख एवं परेशानियां दूर हो जाती हैं।
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श्री कुंजबिहारी आरती कब करनी चाहिए? (When Should Shri Kunjbihari Aarti Be Performed?)
श्री कुंजबिहारी जी की आरती प्रतिदिन प्रातःकाल और सायंकाल की जा सकती है। मंदिरों में आमतौर पर भगवान के श्रृंगार, भोग और शयन के समय भी आरती की जाती है। यदि कोई भक्त प्रतिदिन आरती नहीं कर सकता, तो वह गुरुवार, एकादशी, जन्माष्टमी अथवा अन्य विशेष अवसरों पर श्रद्धा से इसका पाठ कर सकता है।
आरती से पहले भगवान श्रीकृष्ण की प्रतिमा या चित्र के समक्ष दीपक जलाना, पुष्प अर्पित करना और तुलसी दल चढ़ाना विशेष फलदायी माना जाता है।
श्री कुंजबिहारी आरती (Shri Kunjbihari Aarti)
आरती कुंजबिहारी की,
श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की।
आरती कुंजबिहारी की,
श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥
आरती कुंजबिहारी की,
श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की।
आरती कुंजबिहारी की,
श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥
गले में बैजंती माला,
बजावै मुरली मधुर बाला।
श्रवण में कुण्डल झलकाला,
नंद के आनंद नंदलाला।
गगन सम अंग कांति काली,
राधिका चमक रही आली।।
लतन में ठाढ़े बनमाली
भ्रमर सी अलक,
कस्तूरी तिलक,
चंद्र सी झलक,
ललित छवि श्यामा प्यारी की,
श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥
आरती कुंजबिहारी की,
श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥
आरती कुंजबिहारी की,
श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥
कनकमय मोर मुकुट बिलसै,
देवता दरसन को तरसैं।
गगन सों सुमन रासि बरसै।
बजे मुरचंग, मधुर मिरदंग, ग्वालिन संग,
अतुल रति गोप कुमारी की,
श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥
आरती कुंजबिहारी की,
श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥
आरती कुंजबिहारी की,
श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥
जहां ते प्रकट भई गंगा,
सकल मन हारिणि श्री गंगा।
स्मरन ते होत मोह भंगा।
बसी शिव सीस, जटा के बीच, हरै अघ कीच,
चरन छवि श्री बनवारी की,
श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥
आरती कुंजबिहारी की,
श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की।
आरती कुंजबिहारी की,
श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥
चमकती उज्ज्वल तट रेनू,
बज रही वृंदावन बेनू।
चहुँ दिसि गोपी ग्वाल धेनू।
हंसत मृदु मंद, चांदनी चंद, कटत भव फंद,
टेर सुन दीन दुखारी की,
श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥
आरती कुंजबिहारी की,
श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की।
आरती कुंजबिहारी की,
श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥
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