हनुमान जी को संकटमोचक, बल-बुद्धि के दाता और श्रीराम के परम भक्त के रूप में जाना जाता है। जब जीवन में भय, बाधाएँ या मानसिक अशांति घेर लेती हैं, तब हनुमान जी की शरण सबसे सशक्त सहारा बनती है। “अंजनीगर्भ संभूत कपिन्द्र सचिवोत्तम” यह मंत्र हनुमान जी के उसी दिव्य स्वरूप का स्मरण कराता है, जिसमें वे माता अंजनी के पुत्र, सुग्रीव के श्रेष्ठ मंत्री और श्रीराम के अत्यंत प्रिय भक्त हैं। यह मंत्र न केवल रक्षा और निर्भयता प्रदान करता है, बल्कि साधक के भीतर साहस, विवेक और भक्ति का संचार भी करता है। श्रद्धा के साथ किया गया इसका जप जीवन के हर संकट में हनुमान जी की कृपा का अनुभव कराता है।
मंत्र (Mantra)
अंजनीगर्भ संभूत कपिन्द्र सचिवोत्तम।
रामप्रिय नमस्तुभ्यं हनुमान् रक्ष सर्वदा॥
मंत्र का भावार्थ (The meaning of the mantra)
हे हनुमान जी!
आप माता अंजनी के गर्भ से उत्पन्न हुए हैं।
आप वानरों के राजा सुग्रीव के सबसे श्रेष्ठ मंत्री हैं।
आप श्रीराम के अत्यंत प्रिय भक्त हैं।
मैं आपको नमन करता हूँ—कृपया हर समय मेरी रक्षा करें।
इस मंत्र का आध्यात्मिक महत्व (The spiritual significance of this mantra)
- यह मंत्र रामभक्ति से जुड़े हनुमान जी के स्वरूप को दर्शाता है
- इसमें हनुमान जी को:
- वीर (बल और साहस के प्रतीक)
- बुद्धिमान (श्रेष्ठ सचिव)
- परम भक्त (रामप्रिय)
- रक्षक (रक्ष सर्वदा)
मंत्र जप के प्रमुख लाभ (The main benefits of chanting mantras)
भय और संकट से रक्षा
- अचानक आने वाले भय, अनिष्ट, बुरे स्वप्न, नकारात्मक ऊर्जा से रक्षा
- शनि, मंगल या राहु के दुष्प्रभाव में विशेष सहायक
आत्मबल और साहस में वृद्धि
- मन का डर कम होता है
- आत्मविश्वास और निर्णय शक्ति बढ़ती है
बुद्धि और कार्य-सफलता
- विद्यार्थी, नौकरीपेशा और व्यापारियों के लिए लाभकारी
- कार्यों में बाधाएँ कम होती हैं
भक्ति और मानसिक शांति
- मन स्थिर होता है
- हनुमान जी की कृपा से रामभक्ति गहरी होती है
मंत्र जप की विधि (Method of chanting mantras)
श्रेष्ठ दिन
- मंगलवार और शनिवार
- विशेष रूप से ब्रह्ममुहूर्त या सूर्योदय के बाद
जप विधि
- स्नान कर स्वच्छ वस्त्र पहनें
- हनुमान जी की मूर्ति या चित्र के सामने बैठें
- दीपक जलाएँ (सरसों का तेल उत्तम)
- पहले राम नाम का स्मरण करें
- फिर इस मंत्र का जप करें
जप संख्या
- न्यूनतम: 11 बार
- सामान्य साधना: 21 या 51 बार
- विशेष साधना: 108 बार
जप के बाद मन ही मन यह प्रार्थना करें:
“हे हनुमान जी, मेरी बुद्धि, बल और भक्ति की रक्षा करें।”


