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हनुमान बाहुक स्तोत्र (Hanuman Bahuk)

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हनुमान बाहुक एक अत्यंत प्रभावशाली और श्रद्धा से परिपूर्ण स्तोत्र है, जिसकी रचना श्री गोस्वामी तुलसीदास जी ने की थी। यह स्तोत्र श्री हनुमान जी की महिमा का गान करते हुए उन्हें कष्टहरण करने वाले, बल और भक्ति के प्रतीक रूप में चित्रित करता है।

“बाहुक” का अर्थ है – बाहु यानी बांह (हाथ), और यह स्तोत्र स्वयं तुलसीदास जी द्वारा उस समय रचा गया था जब वे भुजा-वेदना (बांह में तेज दर्द) से पीड़ित थे। उन्होंने अपनी पीड़ा से मुक्ति के लिए श्री हनुमान जी का स्मरण कर यह स्तोत्र रचा।

हनुमान बाहुक के 44 श्लोकों में श्री हनुमान जी की शक्ति, पराक्रम, भक्ति, विनय, और उनके कृपा-स्वरूप का अत्यंत भावपूर्ण वर्णन किया गया है। तुलसीदास जी ने इन श्लोकों में श्रीराम के प्रति हनुमान जी की अनन्य भक्ति का भी गुणगान किया है।

इस स्तोत्र को श्रद्धा और विश्वास के साथ पढ़ने या सुनने से शारीरिक और मानसिक कष्टों से मुक्ति मिलने का विश्वास किया जाता है। विशेष रूप से यह स्तोत्र शरीर की पीड़ा, रोग, भय, संकट और दुखों के नाश के लिए अत्यंत प्रभावकारी माना गया है।

हनुमान बाहुक
Hanuman Bahuk

।। श्रीगणेशाय नमः ।।

श्रीजानकीवल्लभो विजयतेश्रीमद्-गोस्वामि-तुलसीदास-कृतहनुमान बाहुक:

सिंधु-तरन, सिय-सोच-हरन, रबि-बाल-बरन तनु ।
भुज बिसाल, मूरति कराल कालहुको काल जनु ।।

गहन-दहन-निरदहन लंक निःसंक, बंक-भुव ।
जातुधान-बलवान-मान-मद-दवन पवनसुव ।।

कह तुलसिदास सेवत सुलभ सेवक हित सन्तत निकट ।
गुन-गनत, नमत, सुमिरत, जपत समन सकल-संकट-विकट ।। 1 ।।

स्वर्न-सैल-संकास कोटि-रबि-तरुन-तेज-घन ।
उर बिसाल भुज-दंड चंड नख-बज्र बज्र-तन ।।

पिंग नयन, भृकुटी कराल रसना दसनानन ।
कपिस केस, करकस लँगूर, खल-दल बल भानन ।।

कह तुलसिदास बस जासु उर मारुतसुत मूरति बिकट ।
संताप पाप तेहि पुरुष पहिं सपनेहुँ नहिं आवत निकट ।। 2 ।।

झूलना –

पञ्चमुख-छमुख-भृगु मुख्य भट असुर सुर,
सर्व-सरि-समर समरत्थ सूरो ।
बाँकुरो बीर बिरुदैत बिरुदावली,
बेद बंदी बदत पैजपूरो ।।

जासु गुनगाथ रघुनाथ कह, जासुबल,
बिपुल-जल-भरित जग-जलधि झूरो ।
दुवन-दल-दमनको कौन तुलसीस है,
पवन को पूत रजपूत रुरो ।। 3 ।।

घनाक्षरी –

भानुसों पढ़न हनुमान गये भानु मन-अनुमानि
सिसु-केलि कियो फेरफार सो ।
पाछिले पगनि गम गगन मगन-मन,
क्रम को न भ्रम, कपि बालक बिहार सो ।।

कौतुक बिलोकि लोकपाल हरि हर बिधि,
लोचननि चकाचौंधी चित्तनि खभार सो ।
बल कैंधौं बीर-रस धीरज कै, साहस कै,
तुलसी सरीर धरे सबनि को सार सो ।। 4 ।।

भारत में पारथ के रथ केथू कपिराज,
गाज्यो सुनि कुरुराज दल हल बल भो ।

कह्यो द्रोन भीषम समीर सुत महाबीर,
बीर-रस-बारि-निधि जाको बल जल भो ।।

बानर सुभाय बाल केलि भूमि भानु लागि,
फलँग फलाँग हूँतें घाटि नभतल भो ।

नाई-नाई माथ जोरि-जोरि हाथ जोधा जोहैं,
हनुमान देखे जगजीवन को फल भो ।। 5 ।।

गो-पद पयोधि करि होलिका ज्यों लाई लंक,
निपट निसंक परपुर गलबल भो ।
द्रोन-सो पहार लियो ख्याल ही उखारि कर,
कंदुक-ज्यों कपि खेल बेल कैसो फल भो ।।

संकट समाज असमंजस भो रामराज,
काज जुग पूगनि को करतल पल भो ।
साहसी समत्थ तुलसी को नाह जाकी बाँह,
लोकपाल पालन को फिर थिर थल भो ।। 6 ।।

कमठ की पीठि जाके गोडनि की गाड़ैं मानो,
नाप के भाजन भरि जल निधि जल भो ।
जातुधान-दावन परावन को दुर्ग भयो,
महामीन बास तिमि तोमनि को थल भो ।।

कुम्भकरन-रावन पयोद-नाद-ईंधन को,
तुलसी प्रताप जाको प्रबल अनल भो ।
भीषम कहत मेरे अनुमान हनुमान,
सारिखो त्रिकाल न त्रिलोक महाबल भो ।। 7 ।।

दूत रामराय को, सपूत पूत पौनको,
तू अंजनी को नन्दन प्रताप भूरि भानु सो ।
सीय-सोच-समन, दुरित दोष दमन,
सरन आये अवन, लखन प्रिय प्रान सो ।।

दसमुख दुसह दरिद्र दरिबे को भयो,
प्रकट तिलोक ओक तुलसी निधान सो ।
ज्ञान गुनवान बलवान सेवा सावधान,
साहेब सुजान उर आनु हनुमान सो ।। 8 ।।

दवन-दुवन-दल भुवन-बिदित बल,
बेद जस गावत बिबुध बंदीछोर को ।
पाप-ताप-तिमिर तुहिन-विघटन-पटु,
सेवक-सरोरुह सुखद भानु भोर को ।।

लोक-परलोक तें बिसोक सपने न सोक,
तुलसी के हिये है भरोसो एक ओर को ।
राम को दुलारो दास बामदेव को निवास,
नाम कलि-कामतरु केसरी-किसोर को ।। 9 ।।

महाबल-सीम महाभीम महाबान इत,
महाबीर बिदित बरायो रघुबीर को ।
कुलिस-कठोर तनु जोरपरै रोर रन,
करुना-कलित मन धारमिक धीर को ।।

दुर्जन को कालसो कराल पाल सज्जन को,
सुमिरे हरनहार तुलसी की पीर को ।
सीय-सुख-दायक दुलारो रघुनायक को,
सेवक सहायक है साहसी समीर को ।। 10 ।।

रचिबे को बिधि जैसे, पालिबे को हरि,
हर मीच मारिबे को, ज्याईबे को सुधापान भो ।
धरिबे को धरनि, तरनि तम दलिबे को,
सोखिबे कृसानु, पोषिबे को हिम-भानु भो ।।

खल-दुःख दोषिबे को, जन-परितोषिबे को,
माँगिबो मलीनता को मोदक सुदान भो ।
आरत की आरति निवारिबे को तिहुँ पुर,
तुलसी को साहेब हठीलो हनुमान भो ।। 11 ।।

सेवक स्योकाई जानि जानकीस मानै कानि,
सानुकूल सूलपानि नवै नाथ नाँक को ।
देवी देव दानव दयावने ह्वै जोरैं हाथ,
बापुरे बराक कहा और राजा राँक को ।।

जागत सोवत बैठे बागत बिनोद मोद,
ताके जो अनर्थ सो समर्थ एक आँक को ।
सब दिन रुरो परै पूरो जहाँ-तहाँ ताहि,
जाके है भरोसो हिये हनुमान हाँक को ।। 12 ।।

सानुग सगौरि सानुकूल सूलपानि ताहि,
लोकपाल सकल लखन राम जानकी ।
लोक परलोक को बिसोक सो तिलोक ताहि,
तुलसी तमाइ कहा काहू बीर आनकी ।।

केसरी किसोर बन्दीछोर के नेवाजे सब,
कीरति बिमल कपि करुनानिधान की ।
बालक-ज्यों पालिहैं कृपालु मुनि सिद्ध ताको,
जाके हिये हुलसति हाँक हनुमान की ।। 13 ।।

करुनानिधान, बलबुद्धि के निधान मोद
महिमा निधान, गुन-ज्ञान के निधान हौ ।
बामदेव-रुप भूप राम के सनेही,
नाम लेत-देत अर्थ धर्म काम निरबान हौ ।।

आपने प्रभाव सीताराम के सुभाव सील,
लोक-बेद-बिधि के बिदूष हनुमान हौ ।
मन की बचन की करम की तिहूँ प्रकार,
तुलसी तिहारो तुम साहेब सुजान हौ ।। 14 ।।

मन को अगम, तन सुगम किये कपीस,
काज महाराज के समाज साज साजे हैं ।
देव-बंदी छोर रनरोर केसरी किसोर,
जुग जुग जग तेरे बिरद बिराजे हैं ।

बीर बरजोर, घटि जोर तुलसी की ओर,
सुनि सकुचाने साधु खल गन गाजे हैं ।
बिगरी सँवार अंजनी कुमार कीजे मोहिं,
जैसे होत आये हनुमान के निवाजे हैं ।। 15 ।।

सवैया –

जान सिरोमनि हौ हनुमान
सदा जन के मन बास तिहारो ।
ढ़ारो बिगारो मैं काको कहा
केहि कारन खीझत हौं तो तिहारो ।।

साहेब सेवक नाते तो हातो कियो
सो तहाँ तुलसी को न चारो ।
दोष सुनाये तें आगेहुँ को होशियार
ह्वैं हों मन तौ हिय हारो ।। 16 ।।

तेरे थपे उथपै न महेस,
थपै थिरको कपि जे घर घाले ।
तेरे निवाजे गरीब निवाज
बिराजत बैरिन के उर साले ।।

संकट सोच सबै तुलसी लिये
नाम फटै मकरी के से जाले ।
बूढ़ भये, बलि, मेरिहि बार,
कि हारि परे बहुतै नत पाले ।। 17 ।।

सिंधु तरे, बड़े बीर दले खल,
जारे हैं लंक से बंक मवा से ।
तैं रनि-केहरि केहरि के बिदले
अरि-कुंजर छैल छवा से ।।

तोसों समत्थ सुसाहेब सेई सहै
तुलसी दुख दोष दवा से ।
बानर बाज ! बढ़े खल-खेचर,
लीजत क्यों न लपेटि लवा-से ।। 18 ।।

अच्छ-विमर्दन कानन-भानि
दसानन आनन भा न निहारो ।
बारिदनाद अकंपन कुंभकरन्न
से कुञ्जर केहरि-बारो ।।

राम-प्रताप-हुतासन, कच्छ,
बिपच्छ, समीर समीर-दुलारो ।
पाप-तें साप-तें ताप तिहूँ-तें सदा
तुलसी कहँ सो रखवारो ।। 19 ।।

घनाक्षरी –

जानत जहान हनुमान को निवाज्यौ जन,
मन अनुमानि बलि, बोल न बिसारिये ।
सेवा-जोग तुलसी कबहुँ कहा चूक परी,
साहेब सुभाव कपि साहिबी सँभारिये ।।

अपराधी जानि कीजै सासति सहस भाँति,
मोदक मरै जो ताहि माहुर न मारिये ।
साहसी समीर के दुलारे रघुबीर जू के,
बाँह पीर महाबीर बेगि ही निवारिये ।। 20 ।।

बालक बिलोकि, बलि बारेतें आपनो कियो,
दीनबन्धु दया कीन्हीं निरुपाधि न्यारिये ।
रावरो भरोसो तुलसी के, रावरोई बल,
आस रावरीयै दास रावरो बिचारिये ।।

बड़ो बिकराल कलि, काको न बिहाल कियो,
माथे पगु बलि को, निहारि सो निवारिये ।
केसरी किसोर, रनरोर, बरजोर बीर,
बाँहुपीर राहुमातु ज्यौं पछारि मारिये ।। 21 ।।

उथपे थपनथिर थपे उथपनहार,
केसरी कुमार बल आपनो सँभारिये ।
राम के गुलामनि को कामतरु रामदूत,
मोसे दीन दूबरे को तकिया तिहारिये ।।

साहेब समर्थ तोसों तुलसी के माथे पर,
सोऊ अपराध बिनु बीर, बाँधि मारिये ।
पोखरी बिसाल बाँहु, बलि, बारिचर पीर,
मकरी ज्यौं पकरि कै बदन बिदारिये ।। 22 ।।

राम को सनेह, राम साहस लखन सिय,
राम की भगति, सोच संकट निवारिये ।
मुद-मरकट रोग-बारिनिधि हेरि हारे,
जीव-जामवंत को भरोसो तेरो भारिये ।।

कूदिये कृपाल तुलसी सुप्रेम-पब्बयतें,
सुथल सुबेल भालू बैठि कै बिचारिये ।
महाबीर बाँकुरे बराकी बाँह-पीर क्यों न,
लंकिनी ज्यों लात-घात ही मरोरि मारिये ।। 23 ।।

लोक-परलोकहुँ तिलोक न बिलोकियत,
तोसे समरथ चष चारिहूँ निहारिये ।
कर्म, काल, लोकपाल, अग-जग जीवजाल,
नाथ हाथ सब निज महिमा बिचारिये ।।

खास दास रावरो, निवास तेरो तासु उर,
तुलसी सो देव दुखी देखियत भारिये ।
बात तरुमूल बाँहुसूल कपिकच्छु-बेलि,
उपजी सकेलि कपिकेलि ही उखारिये ।। 24 ।।

करम-कराल-कंस भूमिपाल के भरोसे,
बकी बकभगिनी काहू तें कहा डरैगी ।
बड़ी बिकराल बाल घातिनी न जात कहि,
बाँहूबल बालक छबीले छोटे छरैगी ।।

आई है बनाइ बेष आप ही बिचारि देख,
पाप जाय सबको गुनी के पाले परैगी ।
पूतना पिसाचिनी ज्यौं कपिकान्ह तुलसी की,
बाँहपीर महाबीर तेरे मारे मरैगी ।। 25 ।।

भालकी कि कालकी कि रोष की त्रिदोष की है,
बेदन बिषम पाप ताप छल छाँह की ।
करमन कूट की कि जन्त्र मन्त्र बूट की,
पराहि जाहि पापिनी मलीन मन माँह की ।।

पैहहि सजाय, नत कहत बजाय तोहि,
बाबरी न होहि बानि जानि कपि नाँह की ।
आन हनुमान की दुहाई बलवान की,
सपथ महाबीर की जो रहै पीर बाँह की ।। 26 ।।

सिंहिका सँहारि बल, सुरसा सुधारि छल,
लंकिनी पछारि मारि बाटिका उजारी है ।
लंक परजारि मकरी बिदारि बारबार,
जातुधान धारि धूरिधानी करि डारी है ।।

तोरि जमकातरि मंदोदरी कढ़ोरि आनी,
रावन की रानी मेघनाद महँतारी है ।
भीर बाँह पीर की निपट राखी महाबीर,
कौन के सकोच तुलसी के सोच भारी है ।। 27 ।।

तेरो बालि केलि बीर सुनि सहमत धीर,
भूलत सरीर सुधि सक्र-रबि-राहु की ।
तेरी बाँह बसत बिसोक लोकपाल सब,
तेरो नाम लेत रहै आरति न काहु की ।।

साम दान भेद बिधि बेदहू लबेद सिधि,
हाथ कपिनाथ ही के चोटी चोर साहु की ।
आलस अनख परिहास कै सिखावन है,
एते दिन रही पीर तुलसी के बाहु की ।। 28 ।।

टूकनि को घर-घर डोलत कँगाल बोलि,
बाल ज्यों कृपाल नतपाल पालि पोसो है ।
कीन्ही है सँभार सार अँजनी कुमार बीर,
आपनो बिसारि हैं न मेरेहू भरोसो है ।।

इतनो परेखो सब भाँति समरथ आजु,
कपिराज साँची कहौं को तिलोक तोसो है ।
सासति सहत दास कीजे पेखि परिहास,
चीरी को मरन खेल बालकनि को सो है ।। 29 ।।

आपने ही पाप तें त्रिपात तें कि साप तें,
बढ़ी है बाँह बेदन कही न सहि जाति है ।
औषध अनेक जन्त्र मन्त्र टोटकादि किये,
बादि भये देवता मनाये अधिकाति है ।।

करतार, भरतार, हरतार, कर्म काल,
को है जगजाल जो न मानत इताति है ।
चेरो तेरो तुलसी तू मेरो कह्यो राम दूत,
ढील तेरी बीर मोहि पीर तें पिराति है ।। 30 ।।

दूत राम राय को, सपूत पूत बाय को,
समत्व हाथ पाय को सहाय असहाय को ।
बाँकी बिरदावली बिदित बेद गाइयत,
रावन सो भट भयो मुठिका के घाय को ।।

एते बड़े साहेब समर्थ को निवाजो आज,
सीदत सुसेवक बचन मन काय को ।
थोरी बाँह पीर की बड़ी गलानि तुलसी को,
कौन पाप कोप, लोप प्रकट प्रभाय को ।। 31 ।।

देवी देव दनुज मनुज मुनि सिद्ध नाग,
छोटे बड़े जीव जेते चेतन अचेत हैं ।
पूतना पिसाची जातुधानी जातुधान बाम,
राम दूत की रजाइ माथे मानि लेत हैं ।।

घोर जन्त्र मन्त्र कूट कपट कुरोग जोग,
हनुमान आन सुनि छाड़त निकेत हैं ।
क्रोध कीजे कर्म को प्रबोध कीजे तुलसी को,
सोध कीजे तिनको जो दोष दुख देत हैं ।। 32 ।।

तेरे बल बानर जिताये रन रावन सों,
तेरे घाले जातुधान भये घर-घर के ।
तेरे बल रामराज किये सब सुरकाज,
सकल समाज साज साजे रघुबर के ।।

तेरो गुनगान सुनि गीरबान पुलकत,
सजल बिलोचन बिरंचि हरि हर के ।
तुलसी के माथे पर हाथ फेरो कीसनाथ,
देखिये न दास दुखी तोसो कनिगर के ।। 33 ।।

पालो तेरे टूक को परेहू चूक मूकिये न,
कूर कौड़ी दूको हौं आपनी ओर हेरिये ।
भोरानाथ भोरे ही सरोष होत थोरे दोष,
पोषि तोषि थापि आपनी न अवडेरिये ।।

अँबु तू हौं अँबुचर, अँबु तू हौं डिंभ सो न,
बूझिये बिलंब अवलंब मेरे तेरिये ।
बालक बिकल जानि पाहि प्रेम पहिचानि,
तुलसी की बाँह पर लामी लूम फेरिये ।। 34 ।।

घेरि लियो रोगनि, कुजोगनि, कुलोगनि ज्यौं,
बासर जलद घन घटा धुकि धाई है ।
बरसत बारि पीर जारिये जवासे जस,
रोष बिनु दोष धूम-मूल मलिनाई है ।।

करुनानिधान हनुमान महा बलवान,
हेरि हँसि हाँकि फूँकि फौजैं ते उड़ाई है ।
खाये हुतो तुलसी कुरोग राढ़ राकसनि,
केसरी किसोर राखे बीर बरिआई है ।। 35 ।।

सवैया –

राम गुलाम तु ही हनुमान गोसाँई सुसाँई सदा अनुकूलो ।
पाल्यो हौं बाल ज्यों आखर दू पितु मातु सों मंगल मोद समूलो ।।

बाँह की बेदन बाँह पगार पुकारत आरत आनँद भूलो ।
श्री रघुबीर निवारिये पीर रहौं दरबार परो लटि लूलो ।। 36 ।।

घनाक्षरी –

काल की करालता करम कठिनाई कीधौं,
पाप के प्रभाव की सुभाय बाय बावरे ।
बेदन कुभाँति सो सही न जाति राति दिन,
सोई बाँह गही जो गही समीर डाबरे ।।

लायो तरु तुलसी तिहारो सो निहारि बारि,
सींचिये मलीन भो तयो है तिहुँ तावरे ।
भूतनि की आपनी पराये की कृपा निधान,
जानियत सबही की रीति राम रावरे ।। 37 ।।

पाँय पीर पेट पीर बाँह पीर मुँह पीर,
जरजर सकल पीर मई है ।
देव भूत पितर करम खल काल ग्रह,
मोहि पर दवरि दमानक सी दई है ।।

हौं तो बिनु मोल के बिकानो बलि बारेही तें,
ओट राम नाम की ललाट लिखि लई है ।
कुँभज के किंकर बिकल बूढ़े गोखुरनि,
हाय राम राय ऐसी हाल कहूँ भई है ।। 38 ।।

बाहुक-सुबाहु नीच लीचर-मरीच मिलि,
मुँहपीर केतुजा कुरोग जातुधान हैं ।
राम नाम जगजाप कियो चहों सानुराग,
काल कैसे दूत भूत कहा मेरे मान हैं ।।

सुमिरे सहाय राम लखन आखर दोऊ,
जिनके समूह साके जागत जहान हैं ।
तुलसी सँभारि ताड़का सँहारि भारि भट,
बेधे बरगद से बनाइ बानवान हैं ।। 39 ।।

बालपने सूधे मन राम सनमुख भयो,
राम नाम लेत माँगि खात टूकटाक हौं ।
परयो लोक-रीति में पुनीत प्रीति राम राय,
मोह बस बैठो तोरि तरकि तराक हौं ।।

खोटे-खोटे आचरन आचरत अपनायो,
अंजनी कुमार सोध्यो रामपानि पाक हौं ।
तुलसी गुसाँई भयो भोंडे दिन भूल गयो,
ताको फल पावत निदान परिपाक हौं ।। 40 ।।

असन-बसन-हीन बिषम-बिषाद-लीन,
देखि दीन दूबरो करै न हाय हाय को ।
तुलसी अनाथ सो सनाथ रघुनाथ कियो,
दियो फल सील सिंधु आपने सुभाय को ।।

नीच यहि बीच पति पाइ भरु हाईगो,
बिहाइ प्रभु भजन बचन मन काय को ।
ता तें तनु पेषियत घोर बरतोर मिस,
फूटि फूटि निकसत लोन राम राय को ।। 41 ।।

जीओं जग जानकी जीवन को कहाइ जन,
मरिबे को बारानसी बारि सुरसरि को ।
तुलसी के दुहूँ हाथ मोदक हैं ऐसे ठाँउ,
जाके जिये मुये सोच करिहैं न लरि को ।।

मोको झूटो साँचो लोग राम को कहत सब,
मेरे मन मान है न हर को न हरि को ।
भारी पीर दुसह सरीर तें बिहाल होत,
सोऊ रघुबीर बिनु सकै दूर करि को ।। 42 ।।

सीतापति साहेब सहाय हनुमान नित,
हित उपदेश को महेस मानो गुरु कै ।
मानस बचन काय सरन तिहारे पाँय,
तुम्हरे भरोसे सुर मैं न जाने सुर कै ।।

ब्याधि भूत जनित उपाधि काहु खल की,
समाधि कीजे तुलसी को जानि जन फुर कै ।
कपिनाथ रघुनाथ भोलानाथ भूतनाथ,
रोग सिंधु क्यों न डारियत गाय खुर कै ।। 43 ।।

कहों हनुमान सों सुजान राम राय सों,
कृपानिधान संकर सों सावधान सुनिये ।
हरष विषाद राग रोष गुन दोष मई,
बिरची बिरञ्ची सब देखियत दुनिये ।।

माया जीव काल के करम के सुभाय के,
करैया राम बेद कहैं साँची मन गुनिये ।
तुम्ह तें कहा न होय हा हा सो बुझैये मोहि,
हौं हूँ रहों मौनही बयो सो जानि लुनिये ।। 44 ।।

हनुमान बाहुक का हिंदी अनुवाद (Hindi translation of Hanuman Bahuk)

  1. मैं श्रीराम का नाम लेकर उस संकटमोचन श्रीहनुमान जी का स्मरण करता हूँ, जिनका प्रभाव अपार है और जो समस्त दुखों को हर लेते हैं।
  2. हे पवनसुत! कृपाकर मेरी पीड़ा को हर लीजिए। मैं आपके चरणों में पूर्ण श्रद्धा से नम्र हूँ।
  3. हे हनुमान! आप तो रामकाज में तत्पर रहते हैं, कृपाकर मेरे शरीर की इस पीड़ा को हरिए।
  4. आपने समुद्र पार किया, लंका जलायी, और श्रीराम के कार्यों को सफल किया — आपकी शक्ति अपरम्पार है।
  5. आप पर जो सच्चे मन से भरोसा करता है, उसके सभी कष्ट हर जाते हैं। कृपया मेरी भी रक्षा कीजिए।
  6. आपके स्मरण मात्र से भय, रोग और संकट दूर हो जाते हैं।
  7. जिस प्रकार आपने सुग्रीव, विभीषण और अंगद की सहायता की, वैसे ही मेरी पीड़ा का भी अंत कीजिए।
  8. जब रावण ने अहंकार किया, तब आपने युद्ध में विजय दिलाकर रामनाम का परचम फहराया।
  9. आपने सीता माता का संदेश राम तक पहुँचाया और उन्हें भरोसा दिलाया।
  10. आपकी बुद्धि अपार, बल अतुलनीय और सेवा भावना अद्वितीय है।
  11. आपको देवता भी प्रणाम करते हैं, आप में श्रीराम की शक्ति प्रकट होती है।
  12. मैं पीड़ा से व्याकुल होकर आपकी शरण में आया हूँ, मेरी रक्षा कीजिए।
  13. मेरे हाथों में पीड़ा है, जैसे अग्नि जल रही हो — कृपा करके इसे शांत कीजिए।
  14. मेरे प्राण भी संकट में हैं, हे रामदूत! मेरी रक्षा कीजिए।
  15. आप शरणागत की लाज रखने वाले हैं, मुझे भी सहारा दीजिए।
  16. शरीर दुखता है, मन विचलित है — एकमात्र आप ही मेरे सहायक हैं।
  17. न वैद्य काम आए, न कोई उपचार — आपकी कृपा ही मेरी चिकित्सा है।
  18. जो लोग आपकी शरण में जाते हैं, वे निर्भय हो जाते हैं।
  19. आपके तेज से यमराज भी डरते हैं, आप मृत्यु के भी अधिपति हैं।
  20. संसार के सभी प्राणियों पर आपकी कृपा है — मैं भी उसी कृपा का पात्र बनूँ।
  21. जैसे आपने लंका में आग लगाई, वैसे ही मेरे दुःखों को भी भस्म कीजिए।
  22. प्रभु श्रीराम ने आपको अमरता का वरदान दिया है — आप युगों तक जीवित रहेंगे।
  23. आपकी भक्ति से पापों का नाश होता है और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
  24. मैं बारम्बार आपकी स्तुति करता हूँ — मेरी सभी बाधाएँ दूर कीजिए।
  25. जब जब भक्त संकट में पड़े, आपने सदा रक्षा की — मेरी भी रक्षा कीजिए।
  26. मेरे कर्मों का फल मुझे दुख दे रहा है, पर आपकी कृपा से सब संभव है।
  27. जो भक्त आपके नाम का सच्चे मन से जप करता है, वह कभी दुखी नहीं रहता।
  28. आपकी गदा से सभी राक्षसों का संहार होता है, मेरे कष्टों का भी अंत कीजिए।
  29. आपके दर्शन से जीवन सफल हो जाता है।
  30. आप ज्ञान, भक्ति और शक्ति के त्रिवेणी स्रोत हैं।
  31. रामकथा के आप मुख्य पात्र हैं, आपकी स्तुति से परम आनंद प्राप्त होता है।
  32. मेरी पीड़ा को देखकर अब और विलंब मत कीजिए — शीघ्र कृपा कीजिए।
  33. रात-दिन आपकी ही पुकार कर रहा हूँ — मेरी पीड़ा को हरण कीजिए।
  34. आपने पहाड़ उठा लिया, समुद्र लांघ लिया, क्या मेरी पीड़ा हरना कठिन है?
  35. आप अग्नि से भी तेजस्वी हैं, आपके स्मरण से जड़ चेतन सब पवित्र हो जाते हैं।
  36. भक्त की आह पुकार बनकर आप तक पहुँचती है — मेरी पुकार सुनिए।
  37. हे संकटमोचन! आप इस व्यथा को नष्ट कर मुझे शांति दीजिए।
  38. मेरे शरीर का यह ताप जैसे भयंकर अग्नि बन गया है, कृपया इसे बुझाइए।
  39. मेरा मन भी अब न संभलता है — एकमात्र आप ही आश्रय हैं।
  40. जब आप कृपा करते हैं, तब समस्त ग्रह, दोष, व्याधियाँ दूर हो जाती हैं।
  41. मैं बारंबार राम नाम लेकर आपको नमस्कार करता हूँ — मेरी पीड़ा को हरिए।
  42. यदि यह शरीर मेरा आपका दास है, तो उसे पीड़ा क्यों हो? यह भी तो आपकी सेवा के लिए है।
  43. हे दयामय पवनपुत्र! मेरी रक्षा कीजिए, मेरी भक्ति स्वीकार कीजिए।
  44. इस स्तोत्र का पाठ जो श्रद्धा से करेगा, उसके सब रोग, शोक और संकट मिट जाएँगे।

हनुमान बाहुक के लाभ (Benefits):

  1. शारीरिक पीड़ा और रोगों से मुक्ति
    विशेषकर बांह, कंधे, पीठ, या स्नायु संबंधित दर्दों के लिए अत्यंत प्रभावी है।
  2. भय, चिंता और मानसिक क्लेश का नाश
    स्तोत्र का नियमित पाठ मानसिक शांति और आत्मबल प्रदान करता है।
  3. कठिन परिस्थितियों से रक्षा
    विपत्तियों, रोगों, शत्रु भय, और अकस्मात संकटों से मुक्ति दिलाता है।
  4. श्री हनुमान जी की कृपा प्राप्ति
    पाठक पर हनुमान जी की विशेष कृपा होती है, जिससे आत्मविश्वास और भक्ति में वृद्धि होती है।
  5. कर्म सिद्धि और बाधाओं से मुक्ति
    जीवन में रुके कार्य, ग्रहबाधा, और असफलता की स्थितियाँ धीरे-धीरे समाप्त होने लगती हैं।

हनुमान बाहुक पाठ की विधि (Vidhi):

  1. स्थान चयन:
    किसी शांत, पवित्र स्थान पर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें।
  2. स्नान और शुद्धता:
    स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। यदि संभव हो तो लाल वस्त्र धारण करें।
  3. दीपक और अगरबत्ती:
    श्री हनुमान जी के समक्ष घी का दीपक जलाएँ और अगरबत्ती अर्पित करें।
  4. पुष्प और नैवेद्य:
    लाल फूल और गुड़-चने का नैवेद्य अर्पित करें।
  5. संकल्प:
    अपने कष्ट या उद्देश्य के लिए मन में संकल्प लेकर पाठ आरंभ करें।
  6. पाठ:
    श्रद्धा और एकाग्रता के साथ सभी 44 श्लोकों का पाठ करें।
    पाठ के बाद हनुमान जी की आरती करें – “आरती कीजै हनुमान लला की…”
  7. अन्य सुझाव:
    • मंगलवार या शनिवार को आरंभ करें।
    • कम से कम 11 दिन या 21 दिन तक लगातार करें।
    • पूर्ण नियम और ब्रह्मचर्य के साथ करें तो फल शीघ्र मिलता है।

जप / पाठ का उचित समय (Jaap Time):

समयलाभ
प्रातःकाल (सुबह 4–7 बजे)सबसे शुभ और प्रभावकारी समय। मन शांत और वातावरण सात्विक रहता है।
संध्या समय (शाम 6–8 बजे)यदि सुबह संभव न हो, तो यह भी उत्तम समय है।
विशेष अवसरों परमंगलवार, शनिवार, हनुमान जयंती, या किसी भी कष्ट के समय विशेष लाभकारी होता है।

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