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ललिता पञ्चकम् (Lalita Panchakam)

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“प्रातः स्मरामि ललितावदनारविन्दम्” से आरंभ होने वाला ललिता पंचकम एक अत्यंत भक्तिपूर्ण स्तोत्र है जो देवी ललिता त्रिपुरसुंदरी को समर्पित है। इसका रचनाकार आदि शंकराचार्य माने जाते हैं।

माँ ललिता त्रिपुरसुंदरी को श्रीचक्र (श्रीयंत्र) की अधिष्ठात्री देवी माना जाता है। वे त्रिपुरा (तीनों लोकों की स्वामिनी) के रूप में ‘षोडशी’ कहलाती हैं, जो 16 वर्ष की कन्या के रूप में मानी जाती हैं और 16 प्रकार की कामनाओं का प्रतिनिधित्व करती हैं। देवी त्रिपुरा को षोडशी, ललिता, और राजराजेश्वरी जैसे नामों से भी जाना जाता है।

इस पंचकम के अंत में वर्णित फलश्रुति (पाठ के लाभ) के अनुसार, जो साधक श्रद्धा से इसका पाठ करते हैं, उन्हें माँ ललिता की कृपा से सौभाग्य, समृद्धि और कीर्ति प्राप्त होती है।

ललिता देवी को सृष्टि, स्थिति और संहार की अधिष्ठात्री शक्ति माना गया है। वे परब्रह्म की शक्ति हैं, जो आनंद और सौंदर्य का साक्षात रूप हैं। इस पंचकम् में उनके मुख, भुजाओं, चरणों और नामों का वर्णन कर उनके माध्यम से साधक को आत्मिक उन्नति और सांसारिक सुख दोनों प्राप्त करने की प्रेरणा दी गई है।

ललिता पञ्चकम् हिंदी
Lalita Panchakam

प्रात: स्मरामि ललितावदनारविन्दं विम्बाधरं पृथुलमौक्तिकशोभिनासम् ।
आकर्णदीर्घनयनं मणिकुण्डलाढयं मंदस्मितं मृगमदोज्ज्वलभालदेशम् ।। 1 ।।

प्रातर्भजामि ललिताभुजकल्पवल्लीं रक्तांगगुलीयलसदंगुलिपल्लवाढयाम् ।
माणिक्यहेमवलयांगदशोभमानां पुण्ड्रेक्षुचापकुसुमेषुसृणीदधानाम् ।। 2 ।।

प्रातर्नमामि ललिताचरणारविन्दं भक्तेष्टदाननिरतं भवसिन्धुपोतम् ।
पद्मासनादिसुरनायकपूजनीयं पद्मांकुशध्वजसुदर्शनलांछनाढ़यम् ।। 3 ।।

प्रात: स्तुवे परशिवां ललितां भवानीं त्र्य्यन्तवेधविभवां करुणानवधाम् ।
विश्वस्य सृष्टिविलयस्थितिहेतुभूतां विधेश्वरीं निगमवांगमनसातिदूराम् ।। 4 ।।

प्रातर्वदामि ललिते तव पुण्यनाम कामेश्वरीति कमलेति महेश्वरीति ।
श्रीशाम्भविती जगतां जननी परेति वाग्देवतेति वचसा त्रिपुरेश्वरीति ।। 5 ।।

य: श्लोकपञ्चकमिदं ललिताम्बिकाया: सौभाग्यदं सुललितं पठति प्रभाते ।
तस्मै ददाति ललिता झटिति प्रसन्ना विद्यां श्रियं विमलसौख्यमनन्तकीर्तिम् ।। 6 ।।

।। इति ललिता पंचकम सम्पूर्णम् ।।

ललिता पंचकम का हिंदी अनुवाद (Hindi translation of Lalitha Panchakam)

प्रात: स्मरामि ललितावदनारविन्दं
विम्बाधरं पृथुलमौक्तिकशोभिनासम् ।
आकर्णदीर्घनयनं मणिकुण्डलाढयं
मंदस्मितं मृगमदोज्ज्वलभालदेशम् ।। 1 ।।
प्रातःकाल मैं श्री ललिता देवी के कमल सदृश मुख का स्मरण करता हूँ,
जो बिम्ब फल जैसे होंठों वाली हैं, और जिनकी सुंदर नासिका मोती से शोभायमान है।
जिनकी आँखें कानों तक फैली हुई हैं, जो मणि-कुण्डलों से सजी हुई हैं,
जिनके मुख पर मंद मुस्कान है और जिनका ललाट कस्तूरी से चमक रहा है। (1)

प्रातर्भजामि ललिताभुजकल्पवल्लीं
रक्तांगगुलीयलसदंगुलिपल्लवाढयाम् ।
माणिक्यहेमवलयांगदशोभमानां
पुण्ड्रेक्षुचापकुसुमेषुसृणीदधानाम् ।। 2 ।।
प्रातःकाल मैं श्री ललिता की शाखाओं के समान सुंदर भुजाओं का भजन करता हूँ,
जिनकी उंगलियाँ रक्तवर्णी अंगूठियों से सजी हुई हैं,
जिनकी भुजाएँ माणिक्य और स्वर्ण के कंगनों से शोभायमान हैं,
जो अपने हाथों में कमल, शर (बाण), पुष्पवाण, और अंकुश धारण किए हुए हैं। (2)

प्रातर्नमामि ललिताचरणारविन्दं
भक्तेष्टदाननिरतं भवसिन्धुपोतम् ।
पद्मासनादिसुरनायकपूजनीयं
पद्मांकुशध्वजसुदर्शनलांछनाढ़यम् ।। 3 ।।
प्रातः मैं ललिता अम्बा के चरण-कमलों को नमस्कार करता हूँ,
जो भक्तों को इच्छित फल देने में सदा तत्पर हैं और भवसागर से पार कराने वाली नौका के समान हैं।
जो ब्रह्मा, विष्णु आदि देवताओं द्वारा पूजित हैं,
जिनके चरण चिन्हों में पद्म, अंकुश, ध्वज और सुदर्शन चक्र अंकित हैं। (3)

प्रात: स्तुवे परशिवां ललितां भवानीं
त्र्य्यन्तवेधविभवां करुणानवधाम् ।
विश्वस्य सृष्टिविलयस्थितिहेतुभूतां
विधेश्वरीं निगमवांगमनसातिदूराम् ।। 4 ।।
प्रातः मैं परम शिवा, ललिता भवानी की स्तुति करता हूँ,
जो त्रिदेवों (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) की शक्ति का मूल स्रोत हैं और जिनकी करुणा असीम है।
जो संपूर्ण ब्रह्मांड की सृष्टि, स्थिति और संहार की कारणस्वरूपा हैं,
जो वेदों की वाणी और मन की भी पहुँच से परे, विद्या की अधिष्ठात्री देवी हैं। (4)

प्रातर्वदामि ललिते तव पुण्यनाम
कामेश्वरीति कमलेति महेश्वरीति ।
श्रीशाम्भविती जगतां जननी परेति
वाग्देवतेति वचसा त्रिपुरेश्वरीति ।। 5 ।।
प्रातः मैं ललिता देवी के पावन नामों का उच्चारण करता हूँ –
“कामेश्वरी”, “कमला”, “महेश्वरी”,
“श्रीशाम्भवी”, “जगत की जननी”, “परा शक्ति”,
“वाक् देवी” और “त्रिपुरेश्वरी” – इन सभी नामों का वाणी द्वारा स्मरण करता हूँ। (5)

य: श्लोकपञ्चकमिदं ललिताम्बिकाया:
सौभाग्यदं सुललितं पठति प्रभाते ।
तस्मै ददाति ललिता झटिति प्रसन्ना
विद्यां श्रियं विमलसौख्यमनन्तकीर्तिम् ।। 6 ।।
जो भी मनुष्य प्रातःकाल श्रद्धापूर्वक ललिता अंबा का यह सुंदर पांच श्लोकों वाला स्तोत्र पढ़ता है,
उससे ललिता देवी शीघ्र प्रसन्न होकर उसे ज्ञान, लक्ष्मी, निर्मल सुख और अनंत कीर्ति प्रदान करती हैं। (6)

।। इति ललिता पंचकम सम्पूर्णम् ।।

ललिता पंचकम् के लाभ (Benefits)

  1. सौंदर्य और तेज की प्राप्ति – देवी ललिता त्रिपुरसुंदरी सौंदर्य की अधिष्ठात्री हैं, उनके स्तवन से चेहरे पर तेज और आकर्षण बढ़ता है।
  2. विद्या और वाणी की सिद्धि – यह स्तोत्र देवी वाग्देवी (सरस्वती) स्वरूपा ललिता को समर्पित है, अतः इससे स्मरण शक्ति और वाणी की शक्ति बढ़ती है।
  3. धन-संपत्ति और सौभाग्य की प्राप्ति – माँ ललिता लक्ष्मी रूप में भी पूजित हैं, नियमित पाठ से लक्ष्मी की कृपा बनी रहती है।
  4. भय और बाधाओं से रक्षा – यह पंचकम साधक के जीवन में आने वाली मानसिक, आध्यात्मिक और सांसारिक विघ्न-बाधाओं का नाश करता है।
  5. शत्रुओं का नाश और मान-सम्मान की प्राप्ति – यह स्तोत्र त्रिपुरासुंदरी के वीर्य से युक्त रूपों का स्मरण कर विजय और प्रतिष्ठा देता है।
  6. माँ ललिता की शीघ्र कृपा – फलश्रुति के अनुसार, देवी इस स्तोत्र से तुरंत प्रसन्न होती हैं और साधक को ज्ञान, सुख, यश, सौंदर्य, लक्ष्मी आदि प्रदान करती हैं।

पाठ विधि (Vidhi / How to Recite)

  1. शुभ समय चुनें – ब्रह्ममुहूर्त या सूर्योदय के समय पाठ सर्वोत्तम होता है।
  2. स्थान की शुद्धि – शांत और स्वच्छ स्थान चुनें। पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें।
  3. स्नान व पवित्रता – स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। महिलाओं के लिए लाल वस्त्र और पुरुषों के लिए सफेद या पीला वस्त्र शुभ होता है।
  4. माँ ललिता की प्रतिमा/चित्र के सामने दीपक जलाएँ – घी का दीपक या कुमकुम-चंदन से पूजन करें।
  5. पुष्प और नैवेद्य अर्पण करें – विशेषतः कमल या लाल पुष्प अर्पण करें।
  6. संकल्प करें और शांत चित्त से पाठ करें – भावपूर्वक ललिता पंचकम् का पाठ करें, प्रत्येक श्लोक का उच्चारण स्पष्ट करें।
  7. अंत में प्रणाम और क्षमा याचना करें – पाठ के अंत में देवी को प्रणाम करें और अपने मनोकामना व्यक्त करें।

पाठ का उपयुक्त समय (Best Time to Recite)

पाठ समयप्रभाव
प्रातःकाल (सुबह)मानसिक शुद्धि, दिनभर के कार्यों में सफलता, सौंदर्य और तेज की प्राप्ति।
नवरात्रि, पूर्णिमा, शुक्रवारविशेष फलदायी – माँ की कृपा शीघ्र प्राप्त होती है।
ब्रह्ममुहूर्त (सुबह 4 से 6 बजे)अध्यात्मिक उन्नति, मन की एकाग्रता और तेजस्विता के लिए श्रेष्ठ।
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