
जबलपुर के भेड़ाघाट का नाम सुनते ही आंखों के सामने नर्मदा नदी, दूधिया संगमरमर की ऊंची-ऊंची चट्टानें और धुआंधार जलप्रपात का दृश्य उभर आता है। लेकिन भेड़ाघाट की पहाड़ी पर स्थित चौसठ योगिनी मंदिर इस प्रसिद्ध पर्यटन क्षेत्र को एक ऐसी ऐतिहासिक और आध्यात्मिक गहराई देता है, जिसे पहली नजर में समझ पाना आसान नहीं है। नर्मदा के आसपास की प्राकृतिक सुंदरता के बीच लगभग एक हजार वर्ष पुराना यह मंदिर आज भी मध्य भारत की प्राचीन धार्मिक परंपरा और कलचुरीकालीन स्थापत्य का महत्वपूर्ण प्रमाण बनकर खड़ा है।
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पहाड़ी पर चढ़ने के बाद जब मंदिर का गोलाकार परिसर सामने दिखाई देता है, तो इसका स्वरूप किसी सामान्य मंदिर जैसा नहीं लगता। चारों ओर बनी छोटी-छोटी कोशिकाएं, पत्थर के स्तंभ, प्राचीन देवी प्रतिमाएं और बीच में स्थित गौरी-शंकर मंदिर इस स्थान को बेहद विशिष्ट बनाते हैं। राष्ट्रीय स्मारक प्राधिकरण के अनुसार, यह मंदिर 10वीं शताब्दी में भेड़ाघाट की एक चट्टानी ऊंचाई पर बनाया गया था और इसका संबंध प्राचीन त्रिपुरी यानी वर्तमान तेवर क्षेत्र के कलचुरी शासकों से माना जाता है।
मंदिर का नाम 64 योगिनियों की परंपरा से जुड़ा है। योगिनियों को शक्ति की विभिन्न अभिव्यक्तियों से संबंधित दिव्य स्त्री शक्तियों के रूप में देखा जाता है। यहां की परिधि में बनी कोशिकाओं में योगिनी और अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमाएं स्थापित थीं। मंदिर के बीच में बाद के समय में निर्मित गौरी-शंकर मंदिर इस पूरे परिसर को शिव-शक्ति परंपरा से भी जोड़ता है।
इस मंदिर की यात्रा केवल पूजा या दर्शन तक सीमित नहीं है। यहां आने वाला व्यक्ति एक साथ इतिहास, पुरातत्व, मूर्तिकला, धर्म, प्रकृति और नर्मदा घाटी के अद्भुत दृश्य का अनुभव कर सकता है। यही वजह है कि चौसठ योगिनी मंदिर जबलपुर की उन जगहों में शामिल है जहां यात्रा समाप्त होने के बाद भी उसके बारे में जानने की उत्सुकता बनी रहती है।
चौसठ योगिनी मंदिर की स्थापना (Establishment of Chausath Yogini Temple)
चौसठ योगिनी मंदिर की स्थापना का इतिहास कलचुरी राजवंश से जुड़ा हुआ है। राष्ट्रीय स्मारक प्राधिकरण के अनुसार, यह मंदिर 10वीं शताब्दी ईस्वी में एक चट्टानी पहाड़ी पर बनाया गया था। यह स्थान प्राचीन त्रिपुरी, जिसे आज तेवर के नाम से जाना जाता है, के लगभग 10 किलोमीटर दक्षिण में स्थित था। त्रिपुरी कलचुरियों की महत्वपूर्ण राजधानी थी, इसलिए इस क्षेत्र में इतने महत्वपूर्ण धार्मिक और स्थापत्य स्मारक का निर्माण होना उस समय की राजनीतिक और सांस्कृतिक स्थिति को समझने में मदद करता है।
मंदिर के निर्माण का श्रेय एक मत के अनुसार कलचुरी राजा युवराजदेव प्रथम को दिया जाता है, जिनका शासन लगभग 915 से 945 ईस्वी के बीच माना जाता है। राष्ट्रीय स्मारक प्राधिकरण के विवरण में यह भी उल्लेख मिलता है कि मंदिर को किसी समय “गोलकिमठ” नाम से जाना जाता था। हालांकि इस नाम और निर्माण से जुड़े सभी विवरणों को समान रूप से निश्चित ऐतिहासिक तथ्य मानना उचित नहीं है, इसलिए इसे उपलब्ध ऐतिहासिक मत के रूप में देखना चाहिए।
मंदिर की मूल अवधारणा 64 योगिनियों की उपासना से जुड़ी थी। इसके लिए एक विशाल गोलाकार परिसर बनाया गया, जिसकी बाहरी परिधि में अलग-अलग कोशिकाएं निर्मित की गईं। इन कोशिकाओं में योगिनियों तथा अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमाएं स्थापित की गईं।
यहां एक महत्वपूर्ण बात यह है कि वर्तमान परिसर में दिखाई देने वाला केंद्रीय गौरी-शंकर मंदिर मूल योगिनी संरचना के साथ उसी समय का नहीं माना जाता। अभिलेखीय प्रमाण के अनुसार, केंद्रीय मंदिर में शिव-पार्वती की प्रतिमा लगभग 1155 ईस्वी में अल्हणादेवी द्वारा स्थापित कराई गई थी। अल्हणादेवी कलचुरी शासक नरसिंह की माता थीं।
इस प्रकार मंदिर की स्थापना को एक ही घटना के रूप में देखने के बजाय इसके विकास को अलग-अलग कालखंडों में समझना अधिक सही है। प्रारंभिक योगिनी मंदिर 10वीं शताब्दी की कलचुरी परंपरा से जुड़ा है, जबकि केंद्रीय गौरी-शंकर मंदिर बाद के कलचुरी काल की धार्मिक गतिविधियों का प्रमाण प्रस्तुत करता है।
चौसठ योगिनी मंदिर का इतिहास (History of Chausath Yogini Temple)

चौसठ योगिनी मंदिर जबलपुर क्षेत्र के सबसे पुराने महत्वपूर्ण विरासत स्थलों में से एक है। इसकी कहानी लगभग एक हजार वर्ष पीछे ले जाती है, जब मध्य भारत में कलचुरी शक्ति प्रभावशाली थी और त्रिपुरी इस राजवंश का प्रमुख केंद्र था। मंदिर का निर्माण इसी ऐतिहासिक वातावरण में हुआ माना जाता है। राष्ट्रीय स्मारक प्राधिकरण इसे 10वीं शताब्दी का स्मारक बताता है।
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मंदिर का इतिहास केवल कलचुरी राजाओं तक सीमित नहीं है। यहां की मूर्तिकला और उपलब्ध प्रतिमाओं में अलग-अलग समय की कलात्मक परंपराओं के संकेत मिलते हैं। मध्य प्रदेश पर्यटन की प्रकाशित सामग्री में उल्लेख है कि कुछ प्रतिमाएं 10वीं शताब्दी की हैं, जबकि परिसर में कुछ ऐसी मूर्तियां भी मिलती हैं जिन्हें इससे पुराने कालों से संबंधित माना गया है। इससे यह संकेत मिलता है कि इस क्षेत्र में धार्मिक गतिविधियां मंदिर के वर्तमान स्वरूप से पहले भी मौजूद हो सकती थीं।
मंदिर का मूल उद्देश्य योगिनी उपासना से जुड़ा था। योगिनी परंपरा भारतीय शक्ति साधना की एक विशिष्ट धारा रही है। मंदिर का गोलाकार स्वरूप और खुला आकाश इसकी धार्मिक अवधारणा को स्थापत्य रूप देता है।
समय के साथ मंदिर में परिवर्तन हुए। केंद्रीय गौरी-शंकर मंदिर का निर्माण 12वीं शताब्दी में हुआ। राष्ट्रीय स्मारक प्राधिकरण के अनुसार, लगभग 1155 ईस्वी में अल्हणादेवी द्वारा शिव-पार्वती की प्रतिमा वाले केंद्रीय मंदिर की स्थापना की गई थी।
बाद की सदियों में मंदिर की कुछ प्रतिमाओं को नुकसान पहुंचा और कई मूर्तियां क्षतिग्रस्त अवस्था में आज दिखाई देती हैं। इसलिए आज मंदिर परिसर में घूमते समय केवल उसकी सुंदरता नहीं बल्कि उसके लंबे और उतार-चढ़ाव भरे इतिहास को भी महसूस किया जा सकता है।
यह स्मारक 18 अप्रैल 1925 की अधिसूचना के माध्यम से संरक्षित स्मारक के रूप में दर्ज किया गया था। आज यह राष्ट्रीय स्मारक प्राधिकरण के संरक्षण संबंधी दस्तावेजों में भी दर्ज है।
चौसठ योगिनी मंदिर की वास्तुकला (Architecture of Chausath Yogini Temple)
चौसठ योगिनी मंदिर की वास्तुकला इसकी सबसे बड़ी पहचान है। सामान्य हिंदू मंदिरों की तरह इसका पूरा परिसर आयताकार या वर्गाकार नहीं है, बल्कि इसकी योजना गोलाकार है। यही कारण है कि पहाड़ी के ऊपर पहुंचने पर मंदिर की पहली झलक ही पर्यटक को आकर्षित कर लेती है।
राष्ट्रीय स्मारक प्राधिकरण के अनुसार, मंदिर के गोलाकार परिसर का आंतरिक व्यास लगभग 116 फीट और बाहरी व्यास लगभग 131 फीट है। पूरी संरचना एक मोटी गोलाकार दीवार से घिरी है और इस दीवार के भीतर 81 छोटी कोशिकाओं की व्यवस्था है। इन कोशिकाओं में 64 योगिनियों तथा सात मातृकाओं सहित अन्य प्रतिमाओं का संबंध बताया गया है।
इन कोशिकाओं के सामने स्तंभों की एक लंबी श्रृंखला बनी हुई है। राष्ट्रीय स्मारक प्राधिकरण के विवरण में 84 वर्गाकार स्तंभों और पीछे की ओर समान संख्या में पिलास्टर का उल्लेख मिलता है। छत का वर्तमान स्वरूप बाद की अवधि में जोड़ा गया माना जाता है।
मंदिर में तीन प्रवेश मार्गों का भी उल्लेख मिलता है। गोलाकार संरचना के भीतर खुला आकाश और बीच में स्थित केंद्रीय मंदिर इसकी स्थापत्य योजना को और विशिष्ट बनाते हैं।
मध्य प्रदेश पर्यटन के अनुसार मंदिर के निर्माण में ग्रेनाइट और बलुआ पत्थर का उपयोग हुआ है। पहाड़ी की प्राकृतिक स्थिति के साथ मंदिर की योजना इस तरह बनाई गई है कि यहां से आसपास के क्षेत्र का विस्तृत दृश्य दिखाई देता है।
यह वास्तुकला केवल सुंदरता के लिए नहीं थी। गोलाकार योजना योगिनी उपासना की परंपरा से जुड़ी धार्मिक अवधारणा का हिस्सा थी। इसी कारण चौसठ योगिनी मंदिर भारतीय मंदिर वास्तुकला में एक अलग स्थान रखता है।
चौसठ योगिनी मंदिर की प्रमुख विशेषताएं (Major Features of Chausath Yogini Temple)

चौसठ योगिनी मंदिर की सबसे पहली विशेषता इसका विशाल गोलाकार स्वरूप है। भारत में योगिनी मंदिरों की संख्या बहुत अधिक नहीं है और जबलपुर का यह मंदिर अपनी संरचना, प्राचीनता और मूर्तिकला के कारण विशेष महत्व रखता है।
गोलाकार मंदिर परिसर (Circular Temple Complex) – पूरा मुख्य परिसर वृत्ताकार योजना पर आधारित है। चारों ओर बनी कोशिकाएं इस वृत्त को पूरा करती हैं और बीच में केंद्रीय मंदिर स्थित है।
64 योगिनियों की परंपरा (Tradition of 64 Yoginis) – मंदिर की पहचान 64 योगिनियों से है। योगिनियों को देवी शक्ति की विभिन्न अभिव्यक्तियों से जोड़ा जाता है और उनका संबंध प्राचीन शाक्त तथा तांत्रिक परंपराओं से माना जाता है।
केंद्रीय गौरी-शंकर मंदिर (Central Gauri Shankar Temple) – गोलाकार परिसर के बीच स्थित यह मंदिर भगवान शिव और माता पार्वती की उपासना से जुड़ा है। इसका निर्माण मूल योगिनी परिसर के बाद हुआ माना जाता है।
पहाड़ी की चोटी पर स्थिति (Hilltop Location) – मंदिर एक ऊंची चट्टानी पहाड़ी पर स्थित है। ऊपर पहुंचने के बाद नर्मदा घाटी और भेड़ाघाट क्षेत्र का सुंदर दृश्य दिखाई देता है।
प्राचीन मूर्तिकला (Ancient Sculptures) – मंदिर की कोशिकाओं में मौजूद मूर्तियां मध्यकालीन भारतीय मूर्तिकला की उत्कृष्ट परंपरा को दर्शाती हैं। कुछ मूर्तियां समय के साथ क्षतिग्रस्त हुई हैं।
संरक्षित विरासत स्थल (Protected Heritage Monument) – मंदिर को संरक्षित स्मारक के रूप में दर्ज किया गया है और इसके लिए राष्ट्रीय स्मारक प्राधिकरण के संरक्षण संबंधी नियम लागू होते हैं।
मंदिर के अंदर देवी-देवता और प्रतिमाएं (Deities and Sculptures Inside the Temple)
चौसठ योगिनी मंदिर का धार्मिक संसार केवल एक देवी या देवता तक सीमित नहीं है। इसके नाम से स्पष्ट है कि इसका मूल संबंध 64 योगिनियों से है। योगिनियों को शक्ति की विभिन्न दिव्य अभिव्यक्तियों के रूप में समझा जाता है और प्राचीन भारतीय धार्मिक परंपरा में उनका संबंध देवी साधना तथा तांत्रिक उपासना से रहा है।
राष्ट्रीय स्मारक प्राधिकरण के अनुसार, मंदिर की 81 कोशिकाओं की संरचना में 64 योगिनियों और सात मातृकाओं की प्रतिमाओं का संबंध मिलता है। बाकी स्थानों में अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमाओं का उल्लेख है।
चौसठ योगिनियां (Sixty-Four Yoginis) – प्रत्येक योगिनी के लिए अलग कोशिका की अवधारणा मंदिर की सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक विशेषता है। अलग-अलग प्रतिमाओं की मुद्राएं और रूप इस परंपरा की विविधता दिखाते हैं।
मातृकाएं (Matrikas) – सात मातृकाओं का उल्लेख मंदिर की संरचना में मिलता है। मातृका परंपरा देवी शक्ति के विभिन्न रूपों से जुड़ी हुई है।
गौरी-शंकर (Gauri-Shankar) – केंद्रीय मंदिर में शिव और पार्वती की उपासना होती है। मध्य प्रदेश पर्यटन की प्रकाशित सामग्री में शिव-पार्वती को नंदी पर विराजमान रूप में दर्शाने वाली प्रतिमा का उल्लेख है।
गणेश (Ganesha) – परिसर की मूर्तिकला में गणेश की प्रतिमा का भी उल्लेख मिलता है। यह मंदिर की व्यापक हिंदू धार्मिक परंपरा को दर्शाती है।
सूर्य देव (Surya) – केंद्रीय गौरी-शंकर प्रतिमा के आसपास सूर्य देव की प्रतिमा का भी विवरण मिलता है।
मंदिर में आज दिखाई देने वाली प्रत्येक मूर्ति को केवल पूजा की वस्तु समझने के बजाय ऐतिहासिक कला के रूप में देखना भी महत्वपूर्ण है। कई प्रतिमाओं पर समय की मार स्पष्ट दिखाई देती है, लेकिन उनके शिल्प में आज भी प्राचीन कलाकारों की कल्पनाशक्ति दिखाई देती है।
चौसठ योगिनी मंदिर के अंदर देखने लायक चीजें और स्थान (Things and Places to See Inside Chausath Yogini Temple)

गोलाकार आंतरिक परिसर (Circular Inner Courtyard) – मंदिर के भीतर पहुंचते ही सबसे पहले विशाल गोलाकार आंगन ध्यान आकर्षित करता है। चारों तरफ बनी कोशिकाएं और स्तंभ इस स्थान को सामान्य मंदिरों से अलग बनाते हैं। कुछ क्षण बीच में खड़े होकर पूरे परिसर को देखने पर इसकी वास्तविक स्थापत्य योजना आसानी से समझ आती है।
योगिनी कोशिकाएं (Yogini Cells) – गोलाकार दीवार के साथ बनी छोटी-छोटी कोशिकाएं मंदिर का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। इन्हीं में योगिनी और अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमाओं को स्थापित किया गया था। समय के साथ कुछ प्रतिमाएं क्षतिग्रस्त या स्थानांतरित हो चुकी हैं, इसलिए आज मूल व्यवस्था पूरी तरह वैसी नहीं दिखाई देती।
गौरी-शंकर मंदिर (Gauri Shankar Temple) – गोलाकार परिसर के बीच स्थित केंद्रीय मंदिर पूरे परिसर का सबसे प्रमुख धार्मिक केंद्र है। इसमें शिव और पार्वती से संबंधित प्रतिमा स्थापित है। इसका इतिहास 12वीं शताब्दी से जुड़ा है।
प्राचीन स्तंभ (Ancient Pillars) – मंदिर के चारों ओर बने स्तंभ इसकी स्थापत्य शैली को समझने में मदद करते हैं। इन स्तंभों की कतार गोलाकार गलियारे को एक विशिष्ट दृश्य देती है।
प्राचीन मूर्तियां (Ancient Sculptures) – देवी-देवताओं और योगिनियों की मूर्तियां यहां का सबसे बड़ा कला आकर्षण हैं। कुछ मूर्तियों में चेहरे, हाथ या अन्य हिस्से क्षतिग्रस्त हैं, लेकिन उनके शेष अलंकरण और मुद्राएं अभी भी देखने योग्य हैं।
नर्मदा घाटी का दृश्य (View of the Narmada Valley) – पहाड़ी की ऊंचाई से आसपास का प्राकृतिक दृश्य बेहद सुंदर दिखाई देता है। मंदिर से बाहर निकलकर कुछ समय आसपास के दृश्य को देखने में अवश्य बिताना चाहिए।
मंदिर में होने वाली आरती और भजन (Aarti and Bhajans at the Temple)
चौसठ योगिनी मंदिर एक प्राचीन संरक्षित विरासत स्थल होने के साथ धार्मिक महत्व वाला मंदिर भी है। यहां श्रद्धालु देवी शक्ति तथा केंद्रीय गौरी-शंकर मंदिर में भगवान शिव और माता पार्वती के प्रति श्रद्धा प्रकट करते हैं।
हालांकि यहां होने वाली दैनिक आरती, भजन या पूजा की निश्चित समय-सारणी का कोई स्पष्ट वर्तमान आधिकारिक रिकॉर्ड विश्वसनीय सरकारी पर्यटन स्रोतों में उपलब्ध नहीं मिला। इसलिए किसी विशेष समय को निश्चित दैनिक आरती का समय बताना सही नहीं होगा।
स्थानीय परंपरा और धार्मिक अवसरों के अनुसार पूजा-अर्चना की गतिविधियां हो सकती हैं। पूर्णिमा जैसे अवसरों को लेकर मध्य प्रदेश पर्यटन ने विशेष धार्मिक महत्व का उल्लेख किया है और ऐसे समय में श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ने की जानकारी दी है।
श्री जागेश्वरनाथ शिव मंदिर, बांदकपुर
यदि आप केवल पर्यटन के बजाय किसी विशेष आरती या पूजा में शामिल होने के लिए मंदिर जाना चाहते हैं, तो यात्रा से पहले स्थानीय पुजारी या मंदिर परिसर में वर्तमान पूजा समय की जानकारी लेना सबसे उचित रहेगा।
मंदिर का वातावरण सामान्यतः शांत है। इसलिए यहां बैठकर कुछ समय ध्यान, मंत्र जाप या शांत प्रार्थना करना कई श्रद्धालुओं के लिए आध्यात्मिक अनुभव बन सकता है। हालांकि इसे किसी आधिकारिक ध्यान कार्यक्रम के रूप में नहीं समझना चाहिए।
मंदिर में होने वाले त्योहार और कार्यक्रम (Festivals and Religious Events at the Temple)
चौसठ योगिनी मंदिर का संबंध शक्ति और शिव परंपरा से है। इसलिए देवी और शिव से जुड़े हिंदू पर्वों के समय यहां धार्मिक गतिविधियों और श्रद्धालुओं की संख्या में वृद्धि हो सकती है। हालांकि मंदिर के सभी वार्षिक कार्यक्रमों की कोई विस्तृत और वर्तमान आधिकारिक सूची उपलब्ध नहीं है।
नवरात्रि (Navratri) – देवी शक्ति से जुड़े इस प्राचीन मंदिर में नवरात्रि का धार्मिक महत्व स्वाभाविक रूप से विशेष माना जाता है। इस दौरान देवी उपासना करने वाले श्रद्धालु मंदिर में दर्शन के लिए आ सकते हैं।
महाशिवरात्रि (Mahashivratri) – केंद्रीय गौरी-शंकर मंदिर में भगवान शिव और माता पार्वती की उपस्थिति के कारण महाशिवरात्रि विशेष धार्मिक महत्व रखती है।
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पूर्णिमा (Full Moon) – मध्य प्रदेश पर्यटन के अनुसार मंदिर में पूर्णिमा की रातें शुभ मानी जाती हैं और इन अवसरों पर भक्तों की भीड़ देखी जा सकती है।
स्थानीय धार्मिक आयोजन (Local Religious Events) – समय-समय पर स्थानीय स्तर पर पूजा या धार्मिक कार्यक्रम हो सकते हैं, लेकिन इनके बारे में यात्रा से पहले वर्तमान जानकारी प्राप्त करना बेहतर है।
यह ध्यान रखना जरूरी है कि मंदिर का मुख्य महत्व किसी आधुनिक मेले या बड़े आयोजन से अधिक इसकी प्राचीन धार्मिक और स्थापत्य विरासत में है। इसलिए किसी भी पर्व पर यहां जाएं तो धार्मिक वातावरण के साथ-साथ स्मारक संरक्षण के नियमों का पालन अवश्य करें।
चौसठ योगिनी मंदिर की टाइमिंग और प्रवेश शुल्क (Temple Timings and Entry Fee)
चौसठ योगिनी मंदिर के खुलने के समय को लेकर इंटरनेट पर अलग-अलग जानकारी मिलती है। कुछ स्थानीय स्रोत इसे सुबह 7 बजे से रात 8:30 बजे तक खुला बताते हैं, जबकि अन्य स्रोत अलग समय देते हैं।
इसलिए यात्रा की योजना बनाते समय किसी एक ऑनलाइन समय को अंतिम और स्थायी समय मानने के बजाय उसी दिन स्थानीय स्तर पर समय की पुष्टि करना बेहतर रहेगा।
मंदिर की पहाड़ी पर चढ़ाई करनी पड़ती है, इसलिए सुबह का समय सबसे आरामदायक माना जा सकता है। गर्मियों में दोपहर के समय सीढ़ियां चढ़ना कठिन हो सकता है। सर्दियों में सुबह और शाम का मौसम अपेक्षाकृत सुहावना रहता है।
प्रवेश शुल्क के संबंध में उपलब्ध पर्यटन स्रोत इसे निःशुल्क बताते हैं। हालांकि संरक्षित स्मारक होने के कारण किसी विशेष व्यवस्था या स्थानीय नियम में बदलाव संभव है, इसलिए यात्रा से पहले वर्तमान जानकारी जांचना उचित है।
मंदिर तक पहुंचने के लिए सीढ़ियों की चढ़ाई को यात्रा का हिस्सा मानें और पर्याप्त समय लेकर जाएं।
चौसठ योगिनी मंदिर के आसपास देखने लायक स्थान (Places to Visit Around Chausath Yogini Temple)
धुआंधार जलप्रपात (Dhuandhar Falls) – भेड़ाघाट की यात्रा धुआंधार जलप्रपात देखे बिना अधूरी लग सकती है। यहां नर्मदा नदी चट्टानी क्षेत्र से तेज गति से नीचे गिरती है और पानी की उठती बौछारें धुएं जैसी दिखाई देती हैं। जलप्रपात की आवाज और आसपास की प्राकृतिक सुंदरता इसे जबलपुर के सबसे लोकप्रिय पर्यटन स्थलों में शामिल करती है।
मार्बल रॉक्स (Marble Rocks) – नर्मदा नदी के दोनों ओर खड़ी विशाल संगमरमर की चट्टानें भेड़ाघाट की पहचान हैं। नदी के बीच से इन चट्टानों को देखना विशेष अनुभव देता है। मध्य प्रदेश पर्यटन के अनुसार यहां की चट्टानें लगभग 100 फीट तक ऊंची दिखाई देती हैं और उनमें अलग-अलग रंगों की प्राकृतिक धारियां भी मिलती हैं।
नर्मदा नौका विहार (Narmada Boat Ride) – मार्बल रॉक्स के बीच नर्मदा नदी में नौका विहार पर्यटकों के लिए लोकप्रिय अनुभव है। चट्टानों के बीच बहती नदी और ऊपर से बदलती रोशनी दृश्य को बेहद सुंदर बना देती है।
भेड़ाघाट (Bhedaghat) – पूरा भेड़ाघाट क्षेत्र प्राकृतिक और धार्मिक पर्यटन का केंद्र है। चौसठ योगिनी मंदिर, नर्मदा नदी, मार्बल रॉक्स और धुआंधार जलप्रपात को एक ही यात्रा में जोड़ा जा सकता है।
पंचवटी क्षेत्र (Panchvati Area) – भेड़ाघाट का पंचवटी क्षेत्र मंदिर और नदी क्षेत्र के आसपास का महत्वपूर्ण स्थान है। चौसठ योगिनी मंदिर की यात्रा के साथ इसे भी देखा जा सकता है।
मदन महल किला (Madan Mahal Fort) – जबलपुर शहर की ओर स्थित यह ऐतिहासिक किला गोंड शासक परंपरा से जुड़ा है। पहाड़ी पर बने इस किले से शहर का व्यापक दृश्य दिखाई देता है।
रानी दुर्गावती संग्रहालय (Rani Durgavati Museum) – इतिहास और पुरातत्व में रुचि रखने वाले यात्रियों के लिए यह स्थान उपयोगी है। यहां मध्य प्रदेश के विभिन्न ऐतिहासिक कालों से जुड़ी मूर्तियों और पुरावशेषों को देखा जा सकता है।
चौसठ योगिनी मंदिर में ध्यान देने योग्य बातें (Important Things to Keep in Mind)
चौसठ योगिनी मंदिर की यात्रा करते समय सबसे महत्वपूर्ण बात यह समझना है कि यह केवल पर्यटन स्थल नहीं बल्कि एक प्राचीन संरक्षित स्मारक भी है। इसलिए मंदिर की दीवारों, स्तंभों और मूर्तियों को किसी भी प्रकार की क्षति पहुंचाना गंभीर रूप से अनुचित है।
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सीढ़ियों पर सावधानी रखें (Be Careful on the Steps) – पहाड़ी पर मंदिर तक पहुंचने के लिए काफी सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं। बुजुर्गों और बच्चों के साथ यात्रा करते समय पर्याप्त समय रखें।
पानी साथ रखें (Carry Water) – विशेषकर गर्मियों में चढ़ाई के दौरान पानी आवश्यक है।
मूर्तियों को न छुएं (Do Not Touch the Sculptures) – प्राचीन मूर्तियों पर हाथ लगाने या उनके ऊपर चढ़ने से बचें।
कचरा न फैलाएं (Do Not Litter) – मंदिर और आसपास के प्राकृतिक क्षेत्र को स्वच्छ रखना प्रत्येक पर्यटक की जिम्मेदारी है।
धार्मिक वातावरण का सम्मान करें (Respect the Religious Environment) – तेज आवाज, अनुचित व्यवहार और धार्मिक गतिविधियों में बाधा डालने से बचें।
बरसात में सावधानी (Be Careful During Monsoon) – बारिश के समय पत्थर और सीढ़ियां फिसलन भरी हो सकती हैं।
फोटोग्राफी के नियम देखें (Follow Photography Rules) – जहां फोटोग्राफी या किसी विशेष गतिविधि पर प्रतिबंध हो, वहां स्थानीय निर्देशों का पालन करें।
समय पहले जांचें (Check Timings Before Visiting) – इंटरनेट पर मंदिर के समय को लेकर अलग-अलग जानकारी उपलब्ध है, इसलिए यात्रा वाले दिन स्थानीय स्तर पर पुष्टि करना बेहतर है।
चौसठ योगिनी मंदिर का पूरा पता (Full Address of Chausath Yogini Temple)
चौसठ योगिनी मंदिर (Chausath Yogini Temple)
भेड़ाघाट, पंचवटी गार्डन क्षेत्र
जबलपुर जिला, मध्य प्रदेश – 483053
भारत
राष्ट्रीय स्मारक प्राधिकरण के अनुसार मंदिर भेड़ाघाट में एक पहाड़ी पर स्थित है और नर्मदा तथा उसकी सहायक बावनगंगा के संगम क्षेत्र तथा प्रसिद्ध मार्बल रॉक्स के निकट है।
मंदिर का भेड़ाघाट क्षेत्र से जुड़ा होना इसे जबलपुर की प्रसिद्ध पर्यटन श्रृंखला का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाता है।
चौसठ योगिनी मंदिर का संपूर्ण ट्रैवल गाइड (Complete Travel Guide to Chausath Yogini Temple)
चौसठ योगिनी मंदिर घूमने के लिए सबसे सुविधाजनक तरीका है कि इसे भेड़ाघाट की पूरी यात्रा के साथ जोड़ा जाए। यदि आप जबलपुर शहर से यात्रा शुरू कर रहे हैं, तो सुबह जल्दी निकलना बेहतर रहेगा।
हवाई मार्ग से यात्रा (Travel by Air) – निकटतम हवाई सुविधा जबलपुर का डुमना एयरपोर्ट है। राष्ट्रीय स्मारक प्राधिकरण के अनुसार डुमना एयरपोर्ट मंदिर से लगभग 33.3 किलोमीटर दूर है। एयरपोर्ट से टैक्सी या निजी वाहन के माध्यम से भेड़ाघाट पहुंचा जा सकता है।
रेल मार्ग से यात्रा (Travel by Train) – भेड़ाघाट रेलवे स्टेशन मंदिर के निकटतम रेलवे स्टेशनों में से एक है। राष्ट्रीय स्मारक प्राधिकरण के अनुसार यह स्टेशन मंदिर से लगभग 5.5 किलोमीटर दूर है। हालांकि लंबी दूरी की कई ट्रेनें जबलपुर जंक्शन पर अधिक सुविधाजनक रूप से मिलती हैं, इसलिए बाहर से आने वाले यात्रियों के लिए जबलपुर एक व्यावहारिक विकल्प है।
सड़क मार्ग से यात्रा (Travel by Road) – जबलपुर से भेड़ाघाट सड़क मार्ग द्वारा आसानी से पहुंचा जा सकता है। टैक्सी, निजी कार और अन्य स्थानीय परिवहन विकल्पों का इस्तेमाल किया जा सकता है।
एक दिन का यात्रा कार्यक्रम (One-Day Itinerary) – सुबह सबसे पहले चौसठ योगिनी मंदिर पहुंचें। सुबह की ठंडी हवा में पहाड़ी की चढ़ाई अपेक्षाकृत आरामदायक रहेगी। मंदिर में दर्शन और स्थापत्य देखने के बाद नीचे उतरें और भेड़ाघाट के अन्य प्रमुख आकर्षणों की ओर जाएं।
इसके बाद धुआंधार जलप्रपात देखें। फिर मार्बल रॉक्स क्षेत्र में जाएं और यदि उस समय नौका विहार उपलब्ध हो तो नर्मदा नदी की नाव यात्रा का आनंद लें। इसके बाद भेड़ाघाट क्षेत्र में भोजन और विश्राम के लिए समय रखा जा सकता है।
यदि आपके पास अतिरिक्त समय है तो जबलपुर शहर लौटते समय मदन महल किला या रानी दुर्गावती संग्रहालय जैसे स्थानों को भी यात्रा में शामिल किया जा सकता है।
चौसठ योगिनी मंदिर, जबलपुर की छवियाँ (Images of Chausath Yogini Temple, Jabalpur)






निष्कर्ष (Conclusion)
चौसठ योगिनी मंदिर की असली खूबसूरती यह है कि यहां पहुंचने के लिए आपको केवल एक पहाड़ी नहीं चढ़नी पड़ती, बल्कि इतिहास की कई परतों से होकर गुजरना पड़ता है। लगभग एक हजार वर्ष पुराने कलचुरीकालीन मंदिर की गोलाकार दीवारों के बीच खड़ी प्राचीन प्रतिमाएं उस समय की धार्मिक कल्पना और शिल्पकला की कहानी सुनाती हैं। दूसरी ओर मंदिर की पहाड़ी से दिखाई देने वाली नर्मदा घाटी याद दिलाती है कि इस स्थान का आकर्षण केवल इतिहास तक सीमित नहीं है।
भेड़ाघाट की संगमरमर की चट्टानों और धुआंधार की गर्जना से कुछ ही दूरी पर स्थित यह मंदिर एक अलग ही संसार का अनुभव कराता है। यहां पत्थरों में इतिहास है, प्रतिमाओं में कला है, गोलाकार परिसर में रहस्य है और नर्मदा के दृश्य में प्रकृति की विशालता है। यही कारण है कि चौसठ योगिनी मंदिर, जबलपुर को केवल एक मंदिर के रूप में नहीं, बल्कि मध्य प्रदेश की जीवित ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत के रूप में देखना चाहिए।
चौसठ योगिनी मंदिर, जबलपुर के FAQ (Frequently Asked Questions About Chausath Yogini Temple, Jabalpur)
1. चौसठ योगिनी मंदिर कहां स्थित है? (Where is Chausath Yogini Temple Located?)
चौसठ योगिनी मंदिर मध्य प्रदेश के जबलपुर जिले के प्रसिद्ध भेड़ाघाट क्षेत्र में एक पहाड़ी के ऊपर स्थित है। यह मंदिर नर्मदा नदी, मार्बल रॉक्स और धुआंधार जलप्रपात के आसपास के प्रमुख दर्शनीय स्थलों में शामिल है।
2. चौसठ योगिनी मंदिर का निर्माण कब हुआ था? (When Was Chausath Yogini Temple Built?)
चौसठ योगिनी मंदिर का निर्माण लगभग 10वीं शताब्दी ईस्वी में हुआ माना जाता है। इसका संबंध कलचुरी काल से है और इसके निर्माण का श्रेय कलचुरी शासक युवराजदेव प्रथम से जोड़ा जाता है।
3. चौसठ योगिनी मंदिर का निर्माण किसने करवाया था? (Who Built Chausath Yogini Temple?)
ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार मंदिर के निर्माण का संबंध कलचुरी शासक युवराजदेव प्रथम से माना जाता है। हालांकि इसके निर्माण से संबंधित सभी विवरणों को पूर्ण रूप से निश्चित मानने के बजाय उपलब्ध ऐतिहासिक साक्ष्यों के आधार पर समझना उचित है।
4. मंदिर का नाम चौसठ योगिनी क्यों पड़ा? (Why is it Called Chausath Yogini Temple?)
इस मंदिर का नाम 64 योगिनियों की प्राचीन शक्ति-उपासना परंपरा से जुड़ा है। योगिनियों को देवी शक्ति की विभिन्न दिव्य अभिव्यक्तियों के रूप में माना जाता है। मंदिर की गोलाकार परिधि में बनी कोशिकाएं इसी परंपरा से संबंधित हैं।
5. चौसठ योगिनी मंदिर की सबसे खास विशेषता क्या है? (What is the Main Feature of the Temple?)
इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता इसका विशाल गोलाकार स्थापत्य है। सामान्य मंदिरों से अलग यहां गोलाकार परिसर के चारों ओर छोटी-छोटी कोशिकाएं बनी हुई हैं और बीच में गौरी-शंकर मंदिर स्थित है।
6. मंदिर तक पहुंचने के लिए कितनी सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं? (How Many Steps Lead to the Temple?)
मंदिर पहाड़ी की ऊंचाई पर स्थित है और यहां पहुंचने के लिए लगभग 108 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं। इसलिए बुजुर्ग यात्रियों और छोटे बच्चों के साथ यात्रा करते समय पर्याप्त समय रखना अच्छा रहता है।
7. क्या चौसठ योगिनी मंदिर में 64 योगिनियों की मूर्तियां हैं? (Are There 64 Yogini Sculptures in the Temple?)
मंदिर की मूल धार्मिक अवधारणा 64 योगिनियों की उपासना से जुड़ी है। राष्ट्रीय स्मारक प्राधिकरण के अनुसार, परिसर में 81 कोशिकाओं की व्यवस्था है, जिनमें 64 योगिनियों और सात मातृकाओं सहित अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमाओं का संबंध बताया गया है।
8. मंदिर के बीच में कौन-सा मंदिर है? (Which Temple is Located at the Center?)
मंदिर के गोलाकार परिसर के बीच में गौरी-शंकर मंदिर स्थित है। इसका संबंध भगवान शिव और माता पार्वती की उपासना से है। केंद्रीय मंदिर को मूल योगिनी परिसर के बाद के काल से संबंधित माना जाता है।
9. क्या मंदिर में भगवान शिव और माता पार्वती की मूर्ति है? (Are Lord Shiva and Goddess Parvati Worshipped Here?)
हां। केंद्रीय गौरी-शंकर मंदिर भगवान शिव और माता पार्वती को समर्पित है। यहां शिव-पार्वती से संबंधित प्राचीन प्रतिमा का ऐतिहासिक उल्लेख मिलता है।
10. चौसठ योगिनी मंदिर में कौन-कौन से देवी-देवता हैं? (Which Gods and Goddesses are Present?)
मंदिर परिसर में 64 योगिनियों और सात मातृकाओं से संबंधित प्रतिमाओं के अलावा विभिन्न देवी-देवताओं की मूर्तियां भी मिलती हैं। केंद्रीय मंदिर में शिव-पार्वती की उपासना होती है और परिसर की मूर्तिकला में गणेश तथा अन्य देवी-देवताओं के रूप भी देखने को मिलते हैं।
11. क्या चौसठ योगिनी मंदिर धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है? (Is Chausath Yogini Temple Religiously Important?)
हां। मंदिर का संबंध प्राचीन शक्ति उपासना और योगिनी परंपरा से है। इसके साथ शिव और पार्वती की उपासना भी जुड़ी हुई है। इसलिए यह मंदिर धार्मिक, ऐतिहासिक और तांत्रिक परंपराओं के अध्ययन के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण माना जाता है।
12. चौसठ योगिनी मंदिर की वास्तुकला कैसी है? (What is the Architecture Like?)
मंदिर की वास्तुकला गोलाकार योजना पर आधारित है। इसकी परिधि के चारों ओर छोटी-छोटी कोशिकाएं और स्तंभ बने हैं। बीच में खुला परिसर और केंद्रीय गौरी-शंकर मंदिर इसकी स्थापत्य योजना को बेहद अनोखा बनाते हैं।
13. क्या चौसठ योगिनी मंदिर प्राचीन है? (Is Chausath Yogini Temple Ancient?)
हां। मंदिर लगभग एक हजार वर्ष पुराना माना जाता है और इसका निर्माण 10वीं शताब्दी के कलचुरी काल से संबंधित है। यह जबलपुर क्षेत्र की महत्वपूर्ण प्राचीन विरासत संरचनाओं में से एक है।
14. चौसठ योगिनी मंदिर के पास कौन-कौन से स्थान घूम सकते हैं? (What Places Can Be Visited Near the Temple?)
मंदिर के आसपास धुआंधार जलप्रपात, मार्बल रॉक्स, भेड़ाघाट और नर्मदा नदी प्रमुख आकर्षण हैं। यदि आपके पास अधिक समय हो तो जबलपुर शहर में मदन महल किला और रानी दुर्गावती संग्रहालय भी देखे जा सकते हैं।
15. क्या चौसठ योगिनी मंदिर से नर्मदा नदी दिखाई देती है? (Can the Narmada River Be Seen From the Temple?)
मंदिर पहाड़ी पर स्थित होने के कारण आसपास के भेड़ाघाट और नर्मदा क्षेत्र का मनोरम दृश्य दिखाई देता है। ऊंचाई से दिखाई देने वाला प्राकृतिक परिदृश्य मंदिर की यात्रा को और यादगार बनाता है।
16. चौसठ योगिनी मंदिर जाने का सबसे अच्छा समय कौन-सा है? (What is the Best Time to Visit?)
सुबह का समय मंदिर घूमने के लिए अधिक सुविधाजनक रहता है, क्योंकि सीढ़ियों की चढ़ाई गर्मी बढ़ने से पहले पूरी की जा सकती है। अक्टूबर से मार्च के बीच मौसम सामान्यतः पर्यटन के लिए अधिक आरामदायक रहता है।
17. चौसठ योगिनी मंदिर की टाइमिंग क्या है? (What are the Temple Timings?)
मंदिर की टाइमिंग को लेकर अलग-अलग ऑनलाइन स्रोतों में अंतर मिलता है। इसलिए यात्रा वाले दिन स्थानीय स्तर पर वर्तमान समय की पुष्टि करना बेहतर है। सुबह जल्दी जाना सामान्यतः अधिक सुविधाजनक रहता है।
18. क्या चौसठ योगिनी मंदिर में प्रवेश शुल्क लगता है? (Is There an Entry Fee?)
उपलब्ध स्थानीय पर्यटन जानकारी में मंदिर का प्रवेश निःशुल्क बताया जाता है। हालांकि शुल्क और प्रवेश व्यवस्था समय के साथ बदल सकती है, इसलिए यात्रा से पहले वर्तमान स्थिति की पुष्टि करना उचित रहेगा।
19. क्या मंदिर में आरती होती है? (Is Aarti Performed at the Temple?)
मंदिर में धार्मिक पूजा-अर्चना होती है, लेकिन दैनिक आरती का निश्चित वर्तमान समय सार्वजनिक सरकारी स्रोतों में स्पष्ट रूप से उपलब्ध नहीं है। यदि आप विशेष रूप से आरती में शामिल होना चाहते हैं तो यात्रा से पहले स्थानीय पुजारी से समय की पुष्टि करना बेहतर होगा।
20. क्या नवरात्रि में चौसठ योगिनी मंदिर जाना अच्छा है? (Is Navratri a Good Time to Visit?)
हां। देवी शक्ति से संबंधित मंदिर होने के कारण नवरात्रि के दौरान यहां दर्शन करना श्रद्धालुओं के लिए विशेष धार्मिक अनुभव हो सकता है। हालांकि भीड़ और स्थानीय कार्यक्रमों की जानकारी पहले प्राप्त कर लेना उचित है।
21. क्या महाशिवरात्रि पर चौसठ योगिनी मंदिर में जाना चाहिए? (Should You Visit During Mahashivratri?)
महाशिवरात्रि भगवान शिव को समर्पित प्रमुख पर्व है और मंदिर के केंद्रीय गौरी-शंकर मंदिर के कारण इस अवसर का धार्मिक महत्व विशेष हो सकता है। इस दौरान श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ सकती है।
22. क्या चौसठ योगिनी मंदिर परिवार के साथ घूमने जा सकते हैं? (Can Families Visit the Temple?)
हां, परिवार के साथ मंदिर की यात्रा की जा सकती है। हालांकि मंदिर तक पहुंचने के लिए सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं, इसलिए बुजुर्गों, छोटे बच्चों और चलने में कठिनाई वाले यात्रियों को विशेष सावधानी रखनी चाहिए।
23. क्या मंदिर में फोटोग्राफी कर सकते हैं? (Is Photography Allowed?)
परिसर में फोटोग्राफी के संबंध में स्थानीय नियमों का पालन करना चाहिए। जहां किसी प्रतिमा या स्थान पर फोटोग्राफी प्रतिबंधित हो, वहां फोटो नहीं लेना चाहिए। प्राचीन मूर्तियों को छूने या उनके बहुत करीब जाकर नुकसान पहुंचाने से भी बचना चाहिए।
24. चौसठ योगिनी मंदिर घूमने में कितना समय लग सकता है? (How Much Time is Needed to Visit?)
सामान्य दर्शन और मंदिर की वास्तुकला देखने के लिए लगभग 1 से 2 घंटे रखना उचित हो सकता है। यदि आप मूर्तियों, स्थापत्य और आसपास के प्राकृतिक दृश्य को आराम से देखना चाहते हैं तो अधिक समय रखना बेहतर रहेगा।
25. क्या चौसठ योगिनी मंदिर की यात्रा भेड़ाघाट के साथ की जा सकती है? (Can It Be Combined With a Bhedaghat Trip?)
बिल्कुल। वास्तव में यह सबसे अच्छा विकल्प है। एक ही यात्रा में चौसठ योगिनी मंदिर, धुआंधार जलप्रपात, मार्बल रॉक्स और नर्मदा नदी को शामिल किया जा सकता है। इससे धार्मिक, ऐतिहासिक और प्राकृतिक पर्यटन तीनों का अनुभव एक साथ मिलता है।
26. चौसठ योगिनी मंदिर क्यों प्रसिद्ध है? (Why is Chausath Yogini Temple Famous?)
चौसठ योगिनी मंदिर अपनी लगभग एक हजार वर्ष पुरानी विरासत, कलचुरीकालीन इतिहास, गोलाकार वास्तुकला, योगिनी उपासना की परंपरा, प्राचीन मूर्तियों और भेड़ाघाट की पहाड़ी पर स्थित होने के कारण प्रसिद्ध है। यह मंदिर जबलपुर के धार्मिक और ऐतिहासिक पर्यटन का एक महत्वपूर्ण केंद्र है।


