हिंदू संस्कृति में दीपक को केवल प्रकाश का स्रोत नहीं, बल्कि ज्ञान, शुद्धता और ईश्वरीय ऊर्जा का प्रतीक माना गया है। जब भी संध्या या पूजा का समय आता है, तो सबसे पहले दीप प्रज्वलित किया जाता है — क्योंकि माना जाता है कि जहाँ दीपक जलता है, वहाँ अंधकार, नकारात्मकता और पाप दूर भाग जाते हैं।
‘दीप स्तुति’ एक अत्यंत पवित्र प्रार्थना है, जो संध्या दीप जलाते समय की जाती है। इसमें दीपक की ज्योति को परम ब्रह्म, भगवान विष्णु (जनार्दन) और ज्ञान के स्वरूप के रूप में नमस्कार किया जाता है।
इस स्तुति के माध्यम से हम यह प्रार्थना करते हैं कि —
“हे ज्योति! हमारे पापों को नष्ट करो, हमारे जीवन में शुभता, स्वास्थ्य, सुख और आत्मज्ञान का प्रकाश फैलाओ।”
दीप स्तुति का पाठ करने से मन में शांति आती है, घर में सकारात्मक ऊर्जा फैलती है, और बुद्धि का प्रकाश प्रज्वलित होता है। इसलिए इसे हर दिन, विशेषकर संध्या के समय दीप जलाते समय पढ़ना अत्यंत शुभ माना गया है।
दीपस्तुति: (Deep Stuti)
दीपो ज्योति: परं ब्रह्म दीपो ज्योतिर्जनार्दनः।
दीपो हरतु मे पापं संध्यादीप नमोऽस्तुते॥ १॥
शुभं करोतु कल्याणं आरोग्यं सुखसंपदाम्।
मम बुद्धिप्रकाशं च दीपज्योति नमोऽस्तुते॥ २॥
शुभं भवतु कल्याणं आरोग्यं पुष्टिवर्धनम्।
आत्मतत्वप्रबोधाय दीपज्योतिर्नमोऽस्तुते॥ ३॥
हिन्दी अर्थ:
(१)
दीपक का प्रकाश परम ब्रह्म का प्रतीक है। यह स्वयं भगवान विष्णु (जनार्दन) का रूप है।
हे संध्याकाल में प्रज्वलित दीप! तुम मेरे सारे पापों को नष्ट करो — तुम्हें बार-बार नमस्कार है।
(२)
यह दीपक शुभ फल, कल्याण, आरोग्य (स्वास्थ्य) और सुख-संपत्ति देने वाला है।
हे दीपज्योति! मेरी बुद्धि को प्रकाशित करो — तुम्हें नमस्कार है।
(३)
यह दीप शुभ हो, कल्याणदायक हो, स्वास्थ्य और पुष्टिवर्धन देने वाला हो।
और आत्मज्ञान (आत्मतत्व की पहचान) कराने वाला हो।
हे दीपज्योति! तुम्हें बार-बार नमस्कार है।


