श्री पुण्डरीकाक्ष स्तोत्रम् एक अत्यंत पवित्र वैष्णव स्तोत्र है, जिसका उल्लेख श्री वराह पुराण के षष्ठ अध्याय में मिलता है। यह स्तोत्र भगवान विष्णु के पुण्डरीकाक्ष (कमलनयन) रूप की स्तुति करता है। “पुण्डरीकाक्ष” नाम का अर्थ है — वह जिनकी नेत्र कमल के समान सुंदर, कोमल और शुद्ध हैं।
इस स्तोत्र में भगवान विष्णु को सर्वव्यापक, सर्वज्ञ, अनादि, नित्य, और विश्व के रक्षक के रूप में वंदना की गई है। भक्तजन इस स्तोत्र का पाठ करके भगवान की कृपा प्राप्त करते हैं और जीवन के भय, दुःख एवं बाधाओं से मुक्ति पाते हैं।
यह स्तोत्र वराह भगवान द्वारा कहा गया है, जिसमें वे भगवान विष्णु के अनंत स्वरूप, उनके तेज, ज्ञान और सर्वशक्तिमान सत्ता का वर्णन करते हैं।
श्री पुण्डरीकाक्ष स्तोत्रम् (Sri Pundarikaksha Stotram)
वराह उवाच ।
नमस्ते पुण्डरीकाक्ष नमस्ते मधुसूदन ।
नमस्ते सर्वलोकेश नमस्ते तिग्मचक्रिणे ॥ १ ॥
विश्वमूर्तिं महाबाहुं वरदं सर्वतेजसम् ।
नमामि पुण्डरीकाक्षं विद्याऽविद्यात्मकं विभुम् ॥ २ ॥
आदिदेवं महादेवं वेदवेदाङ्गपारगम् ।
गम्भीरं सर्वदेवानां नमस्ये वारिजेक्षणम् ॥ ३ ॥
सहस्रशीर्षिणं देवं सहस्राक्षं महाभुजम् ।
जगत्संव्याप्य तिष्ठन्तं नमस्ये परमेश्वरम् ॥ ४ ॥
शरण्यं शरणं देवं विष्णुं जिष्णुं सनातनम् ।
नीलमेघप्रतीकाशं नमस्ये चक्रपाणिनम् ॥ ५ ॥
शुद्धं सर्वगतं नित्यं व्योमरूपं सनातनम् ।
भावाभावविनिर्मुक्तं नमस्ये सर्वगं हरिम् ॥ ६ ॥
नान्यत्किञ्चित्प्रपश्यामि व्यतिरिक्तं त्वयाऽच्युत ।
त्वन्मयं च प्रपश्यामि सर्वमेतच्चराचरम् ॥ ७ ॥
इति श्रीवराहपुराणे षष्ठोऽध्याये श्रीपुण्डरीकाक्ष स्तोत्रम् ।
पाठ के लाभ (फल) (Benefits of the lesson)
- भगवान विष्णु की अनंत कृपा प्राप्त होती है।
- भय, रोग, संकट और पापों से मुक्ति मिलती है।
- घर में सुख, शांति और समृद्धि बनी रहती है।
- भक्त का मन ईश्वर के प्रति भक्ति और श्रद्धा से भर जाता है।
- यह स्तोत्र नकारात्मक विचारों व अहंकार को दूर करता है।
पाठ विधि (Lesson method)
- प्रातःकाल स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र पहनकर भगवान विष्णु के समक्ष दीपक जलाएँ।
- तुलसीदल, पीले फूल और पीले वस्त्र अर्पित करें।
- “ॐ नमो नारायणाय” का जप करें।
- तत्पश्चात श्रद्धा से श्री पुण्डरीकाक्ष स्तोत्रम् का पाठ करें।
- अंत में भगवान से क्षमायाचना और शांति प्रार्थना करें।


