श्री जयदेव कृत श्री दसावतार स्तोत्र भगवान विष्णु के दस महान अवतारों की स्तुति करता है। यह स्तोत्र न केवल दिव्य काव्य है, बल्कि हर श्लोक में धर्म, शक्ति और दैवीय कार्यों का वर्णन है जो भगवान ने समय-समय पर अधर्म के विनाश और धर्म की स्थापना के लिए किए। यह स्तोत्र गीत-गोविंद नामक प्रसिद्ध ग्रंथ का आरंभिक भाग है और इसे गाते या पढ़ते समय भक्त भगवान विष्णु के दशावतारों के अद्भुत रूपों की अनुभूति करता है।
शास्त्रों में कहा गया है कि भगवान के अवतार अनगिनत हैं — वे हर युग, हर यथासमय, हर परिस्थिति में सज्जनों की रक्षा और अधर्म के नाश हेतु किसी न किसी रूप में प्रकट होते हैं। चाहे वह मछली रूप में वेदों की रक्षा हो, कछुए रूप में सृष्टि का संतुलन, या राम और कृष्ण के रूप में अधर्म का विनाश — प्रत्येक अवतार में ईश्वर की लीला और करुणा की झलक मिलती है।
इस स्तोत्र का नियमित पाठ साधक के जीवन में आत्मबल, शांति और सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है।
श्री दसावतार स्तोत्र
Shri Dasavatara Stotra
प्रलयपयोधिजले धृतवानसि वेदम् ।
विहितवहित्रचरित्रमखेदम् ।।
केशव धृतमीनशरीर जय जगदीश हरे ।। 1 ।।
क्षितिरतिविपुलतरे तव तिष्ठति पृष्ठे ।
धरणिधरणकिणचक्रगरिष्ठे ।।
केशव धृतकच्छपरूप जय जगदीश हरे ।। 2 ।।
वसति दशनशिखरे धरणी तव लग्ना ।
शशिनि कलंकलेव निमग्ना ।।
केशव धृतसूकररूप जय जगदीश हरे ।। 3 ।।
तव करकमलवरे नखमद्भुतश्रृंगम् ।
दलितहिरण्यकशिपुतनुभृंगम् ।।
केशव धृतनरहरिरूप जय जगदीश हरे ।। 4 ।।
छलयसि विक्रमणे बलिमद्भुतवामन ।
पदनखनीरजनितजनपावन ।।
केशव धृतवामनरूप जय जगदीश हरे ।। 5 ।।
क्षत्रियरुधिरमये जगदपगतपापम् ।
स्नपयसि पयसि शमितभवतापम् ।।
केशव धृतभृगुपतिरूप जय जगदीश हरे ।। 6 ।।
वितरसि दिक्षु रणे दिक्पतिकमनीयम् ।
दशमुखमौलिबलिं रमणीयम् ।।
केशव धृतरघुपतिवेष जय जगदीश हरे ।। 7 ।।
वहसि वपुषि विशदे वसनं जलदाभम् ।
हलहतिभीतिमिलितयमुनाभम् ।।
केशव धृतहलधररूप जय जगदीश हरे ।। 8 ।।
निन्दसि यज्ञविधेरहह श्रुतिजातम् ।
सदयह्रदयदर्शितपशुधातम् ।।
केशव धृतबुद्धशरीर जय जगदीश हरे ।। 9 ।।
म्लेच्छनिवहनिधने कलयसि करवालम् ।
धूमकेतुमिव किमपि करालम् ।।
केशव धृतकल्किशरीर जय जगदीश हरे ।। 10 ।।
श्रीजयदेवकवेरिदमुदितमुदारम् ।
श्रृणु सुखदं शुभदं भवसारम् ।।
केशव धृतदशविधरूप जय जगदीश हरे ।। 11 ।।
।। इति श्री दसावतार स्तोत्र सम्पूर्णम् ।।
श्री दसावतार स्तोत्र हिंदी अनुवाद
Shri Dasavatara Stotra with Hindi Meaning
प्रलयपयोधिजले धृतवानसि वेदम् ।
विहितवहित्रचरित्रमखेदम् ।।
केशव धृतमीनशरीर जय जगदीश हरे ।। 1 ।।
अर्थ: जब प्रलयकाल में सम्पूर्ण पृथ्वी जल में डूब गई थी, तब आपने मीन (मत्स्य) रूप धारण करके वेदों की रक्षा की। हे जगत के पालनहार केशव! आपको नमन है।
क्षितिरतिविपुलतरे तव तिष्ठति पृष्ठे ।
धरणिधरणकिणचक्रगरिष्ठे ।।
केशव धृतकच्छपरूप जय जगदीश हरे ।। 2 ।।
अर्थ: आपने कच्छप (कछुआ) रूप धारण करके विशाल पृथ्वी को अपनी पीठ पर धारण किया। हे केशव! हे जगदीश! आपको प्रणाम है।
वसति दशनशिखरे धरणी तव लग्ना ।
शशिनि कलंकलेव निमग्ना ।।
केशव धृतसूकररूप जय जगदीश हरे ।। 3 ।।
अर्थ: जब पृथ्वी रसातल में चली गई, तब आपने वराह (सूकर) रूप धारण करके अपने दाँतों से उसे उठाया, जैसे चन्द्रमा पर कलंक होता है। आपको बारम्बार नमस्कार।
तव करकमलवरे नखमद्भुतश्रृंगम् ।
दलितहिरण्यकशिपुतनुभृंगम् ।।
केशव धृतनरहरिरूप जय जगदीश हरे ।। 4 ।।
अर्थ: आपके कमल जैसे हाथों से उत्पन्न अद्भुत नखों द्वारा आपने राक्षस हिरण्यकशिपु के घमंड रूपी भौंरे को चूर्ण कर दिया। हे नरसिंह रूपधारी केशव! जय हो।
छलयसि विक्रमणे बलिमद्भुतवामन ।
पदनखनीरजनितजनपावन ।।
केशव धृतवामनरूप जय जगदीश हरे ।। 5 ।।
अर्थ: आपने वामन रूप धारण करके राजा बलि से तीन पग भूमि माँगी और फिर त्रैलोक्य को माप लिया। आपके चरणों से निकला जल आज भी सबको पावन करता है।
क्षत्रियरुधिरमये जगदपगतपापम् ।
स्नपयसि पयसि शमितभवतापम् ।।
केशव धृतभृगुपतिरूप जय जगदीश हरे ।। 6 ।।
अर्थ: परशुराम रूप में आपने पाप से भरे संसार को क्षत्रियों के रक्त से शुद्ध किया और जीवों के दुःख को शांत किया। आपको वंदन है।
वितरसि दिक्षु रणे दिक्पतिकमनीयम् ।
दशमुखमौलिबलिं रमणीयम् ।।
केशव धृतरघुपतिवेष जय जगदीश हरे ।। 7 ।।
अर्थ: राम रूप में आपने युद्ध में चारों दिशाओं को सुंदर बना दिया और रावण के दस सिरों का बलिदान कर पृथ्वी को अभय प्रदान किया। आपको नमन है।
वहसि वपुषि विशदे वसनं जलदाभम् ।
हलहतिभीतिमिलितयमुनाभम् ।।
केशव धृतहलधररूप जय जगदीश हरे ।। 8 ।।
अर्थ: बलराम रूप में आपने श्वेत शरीर पर मेघ के समान वस्त्र धारण किया और हल से भयभीत होकर यमुना आपकी ओर बह चली। हे हलधर भगवान! जय हो।
निन्दसि यज्ञविधेरहह श्रुतिजातम् ।
सदयह्रदयदर्शितपशुधातम् ।।
केशव धृतबुद्धशरीर जय जगदीश हरे ।। 9 ।।
अर्थ: बुद्ध रूप में आपने दया भाव से प्रेरित होकर हिंसा से युक्त यज्ञों की निंदा की और शांति, करुणा का मार्ग दिखाया। आपको बारंबार प्रणाम।
म्लेच्छनिवहनिधने कलयसि करवालम् ।
धूमकेतुमिव किमपि करालम् ।।
केशव धृतकल्किशरीर जय जगदीश हरे ।। 10 ।।
अर्थ: कल्कि रूप में आप हाथ में तलवार लेकर अधर्मियों का नाश करेंगे। आप धूमकेतु के समान भयंकर और तेजस्वी होंगे। आपको नमस्कार है।
श्रीजयदेवकवेरिदमुदितमुदारम् ।
श्रृणु सुखदं शुभदं भवसारम् ।।
केशव धृतदशविधरूप जय जगदीश हरे ।। 11 ।।
अर्थ: श्रीजयदेव कवि द्वारा रचित यह स्तोत्र पवित्र, कल्याणकारी और सुखदायक है। यह संसार के सार को कहता है। दशावतार धारी प्रभु को वंदन है।
।। इति श्री दसावतार स्तोत्र सम्पूर्णम् ।।
श्री दसावतार स्तोत्र के विशेष लाभ (Special benefits of Shri Dasavatar Stotra):
- यह स्तोत्र मन को शुद्ध करता है और साधक को भीतर से स्थिरता और शक्ति प्रदान करता है।
- जीवन की कठिनाइयों, मानसिक बेचैनी और नकारात्मकता को दूर करता है।
- नियमित जाप से आयु, आरोग्य और आर्थिक समृद्धि प्राप्त होती है।
- भगवान विष्णु के प्रति श्रद्धा और समर्पण भाव गहरा होता है।
- संकटों से रक्षा होती है और धर्म के मार्ग पर स्थिरता मिलती है।
किसे करना चाहिए इस स्तोत्र का पाठ (Who should recite this stotra):
- वे लोग जो जीवन में आर्थिक संकट, मानसिक तनाव, या अज्ञात भय से ग्रसित हैं।
- जो व्यक्ति धार्मिक साधना, भक्ति, या कर्म मार्ग में आगे बढ़ना चाहते हैं।
- जो नियमित हानि, व्यवसाय में रुकावट, या नकारात्मक ऊर्जा से परेशान हैं।
- यह स्तोत्र हर आयु वर्ग के श्रद्धालु के लिए उपयुक्त है — विशेष रूप से वे जो भगवान विष्णु के भक्त हैं।


