‘श्री वेदसार शिव स्तव’ भगवान शिव की महिमा और स्वरूप का सुंदर एवं सारगर्भित स्तुति ग्रंथ है। ऐसा माना जाता है कि इसका रचना कार्य आदि गुरु शंकराचार्य द्वारा भगवान शिव की कृपा प्राप्ति हेतु किया गया था। यह स्तव शिव को समस्त सृष्टि का मूल और अंत मानते हुए उनकी दिव्य, योगी, रौद्र एवं करुणामय रूपों का वर्णन करता है।
यह स्तोत्र न केवल शिव की तपस्वी मुद्रा, नीलकंठ स्वरूप, त्रिनेत्रधारी महादेव, और भूतभावन स्वरूप का उल्लेख करता है, बल्कि उन्हें त्रिमूर्ति स्वरूप में स्थित निर्विकार परमात्मा के रूप में भी स्वीकार करता है।
यह स्तोत्र नित्य श्रद्धा और भक्ति से पढ़ने से आध्यात्मिक बल, शिव कृपा, और सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है।
इस स्तोत्र में शिवजी को
- त्रिनेत्रधारी,
- पंचवक्त्र,
- विश्वरूप,
- निराकार,
- लिंगात्मक,
- और जगत् के सृजन, पालन तथा संहारकर्ता के रूप में पूजित किया गया है।
यह स्तव न केवल भक्त को आध्यात्मिक दृष्टि प्रदान करता है, बल्कि शिवतत्त्व के गूढ़ तत्वों को भी सरल भाषा में उजागर करता है। इसमें ओंकार, तत्वज्ञान, निर्गुण ब्रह्म और भक्ति की गहराई समाहित है।
कहा जाता है कि:
जो भक्त श्रद्धा और एकाग्रता से इस स्तोत्र का पाठ करता है, उसे भगवान शिव की विशेष कृपा प्राप्त होती है। यह शिव-स्तोत्र मन, बुद्धि और आत्मा को शिवमय बना देता है।
श्री वेदसार शिव स्तवः
पशूनां पतिं पापनाशं परेशं
गजेन्द्रस्य कर्त्तिं वसानं वरेण्यम् ।
जटाजूटमध्ये स्फुरद्गांगवारिं
महादेवमेकं स्मरामि स्मरारिम् ॥ 1 ॥
महेशं सुरेशं सुरारार्तिनाशं
विभुं विश्वनाथं विभूत्यंगभूषम् ।
विरूपाक्षमिन्द्वर्कवहिनत्रिनेत्रं
सदानन्दमीडे प्रभुं पंचवक्त्रम् ॥ 2 ॥
गिरीशं गणेशं गले नीलवर्णं
गवेंद्राधिरूढं गणातीतरूपम् ।
भवं भास्वरं भस्मना भूषितांगं
भवानीकलत्रं भजे पञ्चवक्त्रम् ॥ 3 ॥
शिवाकान्त शम्भो शशांकर्धमौले
महेशान शूलिन् जटाजूटधारिन् ।
त्वमेको जगद्व्यापको विश्वरूप
प्रसीद प्रसीद प्रभो पूर्णरूप ॥ 4 ॥
परात्मानमेकं जगद्बीजमाधं
निरीहं निराकारमोंकारवेधम् ।
यतो जायते पाल्यते येन विश्वं
तमीशं भजे लीयते यत्र विश्वम् ॥ 5 ॥
न भूमिर्न चापो न वह्निर्न वायु:
न चाकाशमास्ते न तन्द्रा न निद्रा ।
न ग्रीष्मो न शीतं न देशो न वेषो
न यस्यास्ति मूर्तिस्त्रिमूर्तिं तमीडे ॥ 6 ॥
अजं शाश्वतं कारणं कारणानां
शिवं केवलं भासकं भासकानाम् ।
तुरीयं तम: पारमाधन्तहीनं
प्रपद्ये परं पावनं द्वैतहीनम् ॥ 7 ॥
नमस्ते नमस्ते विभो विश्वमूर्ते
नमस्ते नमस्ते चिदानन्दमूर्ते ।
नमस्ते नमस्ते तपोयोगगम्य
नमस्ते नमस्ते श्रुतिज्ञानगम्य ॥ 8 ॥
प्रभो शूलपाणे विभो विश्वनाथ
महादेव शम्भो महेश त्रिनेत्र ।
शिवाकान्त शांत स्मरारे पुरारे
त्वदन्यो वरेण्यो न मान्यो न गण्यः ॥ 9 ॥
शम्भो महेश करुणामय शूलपाणे
गौरीपते पशुपते पशुपाशनाशिन् ।
काशीपते करुणया जगदेतदेकस्त्वं
हंसि पासि विदधासि महेश्वरोऽसि ॥ 10 ॥
त्वत्तो जगद्भवति देव भव स्मरारे
त्वय्येव तिष्ठति जगन्म्रड विश्वनाथ ।
त्वय्येव गच्छति लयं जगदेतदीश
लिंगात्मकं हर चराचरविश्वरूपिन् ॥ 11 ॥
॥ इति श्री वेदसार शिव स्तवः सम्पूर्णम् ॥
श्री वेदसार शिव स्तवः – हिंदी अनुवाद सहित
पशुओं के स्वामी, पापों के नाशक, श्रेष्ठ परमेश्वर,
गजेन्द्र की खाल धारण करने वाले, वरणीय प्रभु,
जटाजूट के मध्य में गंगा जल को धारण करने वाले,
कामदेव के शत्रु, महादेव को मैं स्मरण करता हूँ। ॥1॥
महेश्वर, देवताओं के स्वामी, दैत्यों के शत्रु,
संपूर्ण जगत के ईश्वर, विभूति से सुशोभित शरीर वाले,
विरूपाक्ष, चंद्र-सूर्य और अग्नि रूप त्रिनेत्रधारी,
सदा आनंद स्वरूप, पंचवक्त्र प्रभु की मैं स्तुति करता हूँ। ॥2॥
गिरिजा के स्वामी, गणों के अधिपति, गले में नील वर्ण,
बैल पर सवार, गणातीत रूप वाले,
प्रभास्वर, भस्म से शरीर को सजाने वाले,
भवानी के पति, पंचमुख वाले शिव को मैं भजता हूँ। ॥3॥
शिवा के प्रिय, शंभु, शशांक को धारण करने वाले,
महेश्वर, शूलधारी, जटाजूटधारी,
समस्त विश्व में व्याप्त, विश्वरूपधारी,
पूर्ण स्वरूप प्रभु, कृपा करें – कृपा करें। ॥4॥
एकमात्र परमात्मा, सृष्टि के बीज रूप,
इच्छा रहित, निराकार, ओंकार से जानने योग्य,
जिससे सृष्टि उत्पन्न होती है, पालन होता है,
जिसमें सारा संसार लीन हो जाता है – उस ईश्वर को मैं भजता हूँ। ॥5॥
न तो उसमें धरती है, न जल, न अग्नि, न वायु,
न आकाश, न तन्द्रा, न निद्रा,
न गर्मी है, न ठंडक, न कोई देश, न वेश,
जिसकी कोई मूर्ति नहीं – मैं उस त्रिमूर्ति की स्तुति करता हूँ। ॥6॥
जो अजन्मा, शाश्वत, कारणों का भी कारण है,
केवल शिव, प्रकाशकों का भी प्रकाशक,
चौथा (तुरीय) अवस्था, अज्ञान का पार,
जिसका कोई आदि या अंत नहीं – उस पावन अद्वैत को मैं शरण लेता हूँ। ॥7॥
हे प्रभो! बार-बार नमस्कार – हे विश्वमूर्ति!
हे चिदानन्दमूर्ति! बारंबार नमस्कार,
हे तप और योग से प्राप्त होने वाले!
श्रुति और ज्ञान से प्राप्त होने वाले – तुम्हें नमस्कार। ॥8॥
हे शूलधारी प्रभु! हे विश्वनाथ!
हे महादेव! हे शंभु! हे त्रिनेत्रधारी!
हे शिवा के प्रिय, शांत स्वभाव वाले, कामदेव और त्रिपुरासुर के संहारक!
तुम्हारे अतिरिक्त कोई श्रेष्ठ, माननीय या गणनीय नहीं है। ॥9॥
हे शंभो, महेश, करुणामय, शूलधारी!
हे गौरीपति, पशुपति, पशुपाश को नष्ट करने वाले!
हे काशीपति, कृपा करके इस सम्पूर्ण जगत की रक्षा करो –
तुम ही इसका संहार, पालन और सृजन करते हो – तुम महेश्वर हो। ॥10॥
हे देव! इस समस्त संसार की उत्पत्ति तुमसे होती है –
हे कामदेव के शत्रु, हे विश्वनाथ! यह सृष्टि तुममें ही स्थित है,
हे प्रभो! यही सृष्टि तुममें ही विलीन हो जाती है,
हे लिंगस्वरूप, चराचर विश्व के रूपधारी हर – तुम्हें प्रणाम! ॥11॥
॥ इति श्री वेदसार शिव स्तवः सम्पूर्णम् ॥
लाभ (Benefits):
- आध्यात्मिक जागृति: यह स्तोत्र परमात्मा शिव के निर्गुण और सगुण दोनों स्वरूपों की स्तुति करता है, जिससे साधक में गहरा आत्मज्ञान उत्पन्न होता है।
- शिव कृपा प्राप्ति: नियमित पाठ करने से भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है और जीवन में बाधाएं दूर होती हैं।
- मन की शांति एवं एकाग्रता: यह स्तोत्र मन को स्थिर, शांत और सात्विक बनाता है, जिससे ध्यान में गहराई आती है।
- पापों का नाश: यह स्तोत्र भगवान शिव को प्रसन्न कर पापों के नाश में सहायक होता है।
- मृत्यु भय एवं रोग से रक्षा: शिव को मृत्यु के देवता भी कहा जाता है, अतः यह स्तोत्र मृत्यु के भय, रोग और आकस्मिक संकट से रक्षा करता है।
- ज्ञान और विवेक का विकास: स्तोत्र वेदों के सार तत्व को समाहित करता है, जिससे आत्मा को दिशा, विवेक और सत्य की अनुभूति होती है।
पाठ विधि (Pāṭh Vidhi):
- स्नान करके शुद्ध वस्त्र धारण करें।
- भगवान शिव की मूर्ति या चित्र के सामने बैठें, दीपक और अगरबत्ती जलाएं।
- सफेद या काले तिल, बेलपत्र, दूध, जल, और भस्म अर्पित करें।
- आसन पर बैठकर मन को एकाग्र करें और शिव मंत्र का स्मरण करें (जैसे – “ॐ नमः शिवाय”)।
- अब पूरे वेदसार शिव स्तव का पाठ श्रद्धा से करें।
- पाठ के अंत में शिव अर्चना, “ॐ त्र्यम्बकं यजामहे…” या “महामृत्युंजय मंत्र” का उच्चारण करें।
- संभव हो तो रुद्राभिषेक भी करें।
जप का उचित समय (Best Time for Chanting):
| समय | प्रभाव और कारण |
|---|---|
| प्रातः काल | दिन की शुरुआत शिव कृपा से होती है, शांति और ऊर्जा प्राप्त होती है। |
| प्रदोष काल | (संध्या के समय, सूर्यास्त से लगभग 1.5 घंटे पहले या बाद) – यह समय शिव साधना के लिए अत्यंत पवित्र माना जाता है। |
| सोमवार / महाशिवरात्रि | शिव का प्रिय दिन होने के कारण अत्यधिक फलदायी होता है। |
| एकांत और शांत स्थान | ताकि मन एकाग्र रह सके और ध्यान स्थिर हो। |
विशेष सुझाव:
अगर आप इसे रोज़ाना नहीं कर सकते, तो प्रत्येक सोमवार को एक बार अवश्य पढ़ें। साथ ही, यह स्तोत्र महाशिवरात्रि, श्रावण मास, और प्रदोष व्रत के अवसरों पर विशेष रूप से फलदायक होता है।


























































