यह स्तोत्र उन ब्राह्मण पत्नियों द्वारा रचा गया है, जिन्होंने श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं से प्रभावित होकर उनकी भक्ति में समर्पित जीवन जीया। यह स्तुति दर्शाती है कि किस प्रकार एक भक्त – चाहे वह किसी भी जाति, लिंग या अवस्था का हो – यदि श्रद्धा और भक्ति से भगवान की शरण में आता है, तो भगवान उसे अपनाते हैं।
विप्रपत्नियों की कथा श्रीमद्भागवत महापुराण में वर्णित है, जहाँ वे अपने पतियों के विरोध के बावजूद श्रीकृष्ण और बलराम के लिए प्रेमपूर्वक भोजन लेकर वन में पहुँचती हैं। भगवान श्रीकृष्ण उनकी इस भक्ति से अत्यंत प्रसन्न होकर उन्हें अपना परम सान्निध्य प्रदान करते हैं। उसी प्रसंग में उन्होंने यह स्तोत्र भगवान श्रीकृष्ण की महिमा का गान करते हुए रचा।
इस स्तोत्र में श्रीकृष्ण के निर्गुण और सगुण स्वरूप की सुंदर व्याख्या की गई है। यह उन्हें परम ब्रह्म, स्वयं प्रकृति और पुरुष का कारण, वेदों से भी परे, तथा समस्त शक्तियों के आधारस्वरूप सिद्ध करता है। स्तोत्र में यह स्वीकार किया गया है कि स्वयं देवता, वेद और ज्ञान की देवी सरस्वती भी उनकी महिमा को पूर्णतः व्यक्त करने में असमर्थ हैं।
जो भक्त इस स्तोत्र का श्रद्धापूर्वक पाठ करता है, उसे वैसा ही दिव्य फल प्राप्त होता है जैसा विप्रपत्नियों को श्रीकृष्ण के साक्षात् दर्शन से मिला।
यह स्तोत्र भक्ति, समर्पण और आत्मज्ञान का अद्भुत संगम है, जो श्रीकृष्ण के स्वरूप का दार्शनिक और आध्यात्मिक रहस्य प्रकट करता है।
श्री विप्रपत्नी कृत श्रीकृष्ण स्तोत्र
त्वं ब्रह्म परमं धाम निरीहो निरहंकृतिः
निर्गुणश्च निराकारः साकारस्सगुणः स्वयम् ॥ १ ॥
साक्षिरूपश्च निर्लिप्तः परमात्मा निराकृतिः
प्रकृतिः पुरुषस्त्वं च कारणं च तयोः परम् ॥ २ ॥
सृष्टिस्थित्यन्तविषये ये च देवास्त्रयः स्मृताः
ते त्वदंशास्सर्वबीजाः ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः ॥ ३ ॥
यस्य लोम्नां च विवरे चाखिलं विश्वमीश्वर
महाविराण् महाविष्णुः त्वं तस्य जनको विभो ॥ ४ ॥
तेजस्त्वं चापि तेजस्वी ज्ञानं ज्ञानी च तत्परः
वेदेऽनिर्वचनीयस्त्वं कस्त्वां स्तोतुमिहेश्वरः ॥ ५ ॥
महदादेस्सृष्टिसूत्रं पञ्चतन्मात्रमेव च
बीजं त्वं सर्वशक्तीनां सर्वशक्तिस्वरूपकः ॥ ६ ॥
सर्वशक्तीश्वरः सर्वः सर्वशक्त्याश्रयस्सदा
त्वमनीहः स्वयंज्योतिः सर्वानन्दस्सनातनः ॥ ७ ॥
अहो आकारहीनस्त्वं सर्वविग्रहवानपि
सर्वेन्द्रियाणां विषयं जानासि नेन्द्रियी भवान् ॥ ८ ॥
सरस्वती जडीभूता यत्स्तोत्रे यन्निरूपणे
जडीभूतो महेशश्च शेषो धर्मो विधिः स्वयम् ॥ ९ ॥
पार्वती कमला राधा सावित्री वेदसूरपि
वेदश्च जडतां याति को वा शक्ता विपश्चितः ॥ १० ॥
वयं किं स्तवनं कुर्मः स्त्रियः प्राणेश्वरेश्वर
प्रसन्नो भव नो देव दीनबन्धो कृपां कुरु ॥ ११ ॥
विप्रपत्नीकृतं स्तोत्रं पूजाकाले च यः पठेत्
स गतिं विप्रपत्नीनां लभते नात्र संशयः ॥ १२ ॥
॥ इति श्री विप्रपत्नी कृत श्रीकृष्ण स्तोत्र सम्पूर्णम् ॥
श्री विप्रपत्नी कृत श्रीकृष्ण स्तोत्र का हिंदी अनुवाद
1. आप ही परम ब्रह्म हैं, परम धाम हैं, निःस्पृह हैं और अहंकार रहित हैं।
आप निर्गुण और निराकार भी हैं, फिर भी साकार और सगुण स्वरूप भी स्वयं ही हैं।
2. आप साक्षीस्वरूप हैं, किसी भी कर्म में लिप्त नहीं हैं, आप ही परमात्मा हैं।
आप प्रकृति और पुरुष दोनों हैं, तथा उन दोनों से भी परे परम कारण हैं।
3. सृष्टि, स्थिति और संहार जिन तीन देवों से होता है — वे सभी (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) आपके अंश हैं, और समस्त सृजन के बीजस्वरूप भी हैं।
4. जिनके रोमकूपों में सम्पूर्ण ब्रह्मांड स्थित है, वे महाविराट महाविष्णु हैं — और हे प्रभो! आप उनके भी जनक हैं।
5. आप तेज ही हैं और तेजस्वी भी हैं, ज्ञान ही हैं और ज्ञानी भी हैं, आप ही परम तत्व हैं।
आप वेदों में वर्णन से परे हैं — इस संसार में कौन आपकी स्तुति कर सकता है, हे ईश्वर?
6. महत्तत्व से उत्पन्न होने वाली सृष्टि की रचना और पाँच तन्मात्राएँ — इन सबका मूल बीज आप ही हैं।
आप समस्त शक्तियों के मूलस्वरूप हैं।
7. आप सर्वशक्तियों के स्वामी हैं, सर्वव्यापक हैं, और सभी शक्तियों के आधार हैं।
आप निःस्पृह, स्वयं प्रकाशित और परमानंदस्वरूप सनातन प्रभु हैं।
8. हे प्रभु! आप आकारहीन होते हुए भी समस्त रूपों में विद्यमान हैं।
आप इन्द्रियों के बिना भी इन्द्रियों के सभी विषयों को जान लेते हैं।
9. आपकी स्तुति का प्रयास करने पर सरस्वती भी जड़वत हो जाती हैं।
महेश (शिव), शेषनाग, धर्मराज और स्वयं ब्रह्मा भी इस स्तुति में असमर्थ हो जाते हैं।
10. पार्वती, लक्ष्मी, राधा, सावित्री, वेदों की देवी — सबकी बुद्धि आपकी महिमा में मौन हो जाती है।
वेद भी जड़वत हो जाते हैं, फिर कौन बुद्धिमान आपकी पूर्ण स्तुति कर सकता है?
11. हे प्राणों के स्वामी! हम स्त्रियाँ आपको क्या स्तुति करें?
आप कृपापूर्ण होकर हम पर प्रसन्न हों, हे दीनों के बन्धु! कृपा करें।
12. जो कोई इस स्तोत्र का पाठ पूजा के समय करता है,
वह निश्चित ही विप्रपत्नियों के समान श्रेष्ठ गति को प्राप्त करता है — इसमें कोई संशय नहीं।
॥ इति श्री विप्रपत्नी कृत श्रीकृष्ण स्तोत्र का हिंदी अनुवाद पूर्ण हुआ ॥
लाभ (Benefits):
- अनन्य भक्ति की प्राप्ति:
यह स्तोत्र श्रीकृष्ण के सगुण-निर्गुण स्वरूप का वर्णन करता है, जिससे मनुष्य के हृदय में गहरी भक्ति जागृत होती है। - कर्मबन्धन से मुक्ति:
स्तोत्र पाठ करने से मनुष्य संसारिक मोह-माया से ऊपर उठकर श्रीकृष्ण के चरणों में स्थिर होता है। - स्त्रियों के लिए विशेष फलदायक:
विशेषतः स्त्रियों द्वारा इस स्तोत्र का पाठ करने से उन्हें विप्रपत्नियों के समान परमगति प्राप्त होती है। - ज्ञान व वैराग्य की प्राप्ति:
यह स्तोत्र श्रीकृष्ण को समस्त शक्तियों के मूलरूप में स्थापित करता है, जिससे साधक में अद्वैत ज्ञान का उदय होता है। - श्रीकृष्ण की कृपा:
यह स्तोत्र भगवान को अत्यंत प्रिय है। भक्त की भावनाएँ सीधे भगवान तक पहुँचती हैं और उनके जीवन में सौभाग्य, शांति व आत्मिक बल आता है।
पाठ विधि (Vidhi):
- स्नान व शुद्ध वस्त्र पहनकर स्वच्छ स्थान या पूजन कक्ष में पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें।
- भगवान श्रीकृष्ण की प्रतिमा या चित्र के समक्ष दीपक जलाएं, पुष्प अर्पित करें।
- यदि संभव हो तो तुलसी दल या माला अर्पित करें क्योंकि यह श्रीकृष्ण को अत्यंत प्रिय है।
- फिर एकाग्रचित्त होकर पूरे स्तोत्र का पाठ करें।
- पाठ के बाद श्रीकृष्ण मंत्र (“ॐ श्री कृष्णाय नमः”) का 108 बार जप करें।
- अंत में श्रीकृष्ण से अपनी प्रार्थना करें और कृतज्ञता प्रकट करें।
जप/पाठ का उत्तम समय (Best Time):
- प्रातःकाल (Brahma Muhurat – सुबह 4 बजे से 6 बजे के बीच) – यह समय सबसे पवित्र और प्रभावशाली माना जाता है।
- संध्याकाल (शाम के समय) – जब वातावरण शांत हो और आप ध्यानपूर्वक पाठ कर सकें।
- एकादशी, जन्माष्टमी, गुरुवार, या श्रीकृष्ण से जुड़े पर्वों पर इसका पाठ विशेष फलदायक होता है।


