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यक्षिणी स्तोत्र (Yakshini Kavacham)

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“यक्षिणी कवच” एक अत्यंत रहस्यमयी और शक्तिशाली तांत्रिक स्तोत्र है, जो उन्मत्त भैरव द्वारा देवी को उपदेश रूप में प्रदान किया गया है। यह कवच तांत्रिक साधना के डामर मार्ग का अत्यंत गोपनीय एवं दुर्लभ हिस्सा है, जिसे देवताओं के लिए भी दुर्लभ बताया गया है। यह कवच मुख्यतः यक्षिणियों की साधना और उन्हें वश में करने के उद्देश्य से रचा गया है।

इस कवच का पाठ और धारणा साधक को अलौकिक सिद्धियों, ऐश्वर्य, आकर्षण शक्ति और तांत्रिक शक्ति प्रदान करता है। इसमें यक्षिणी देवी के विभिन्न स्वरूपों को शरीर के विभिन्न अंगों की रक्षा के लिए आह्वान किया गया है, जिससे साधक को आभ्यंतर और बाह्य दोनों प्रकार की सुरक्षा प्राप्त होती है।

“यक्षिणी कवच” केवल ज्ञान, श्रद्धा और अनुशासन से प्राप्त किया जा सकता है। इस कवच की महिमा यह है कि इसके स्मरण मात्र से भी सिद्धि प्राप्त हो सकती है, और साधक को राजसत्ता, समृद्धि, तथा गूढ़ तांत्रिक विद्या में अद्वितीय सफलता मिलती है।

यह कवच विशेष रूप से उन साधकों के लिए उपयुक्त है जो एकांत साधना, गहन तांत्रिक अभ्यास, अथवा यक्षिणी सिद्धि के इच्छुक हैं। यह महान कवच “वृहद् भूत डामर महातंत्र” से लिया गया है, जो तंत्र शास्त्र के सबसे रहस्यमय और प्रभावशाली ग्रंथों में से एक है।

यक्षिणी कवच
Yakshini Kavacham

॥ श्री उन्मत्त-भैरव उवाच ॥

श्रृणु कल्याणि ! मद्-वाक्यं, कवचं देव-दुर्लभं ।
यक्षिणी-नायिकानां तु,संक्षेपात् सिद्धि-दायकं ॥

हे कल्याणि ! देवताओं को दुर्लभ, संक्षेप (शीघ्र) में सिद्धि देने वाले,
यक्षिणी आदि नायिकाओं के कवच को सुनो –

ज्ञान-मात्रेण देवशि ! सिद्धिमाप्नोति निश्चितं ।
यक्षिणि स्वयमायाति,

॥ कवच-ज्ञान-मात्रतः ॥

हे देवशि ! इस कवच के ज्ञान-मात्र से यक्षिणी स्वयं आ जाती है और निश्चय
ही सिद्धि मिलती है। सर्वत्र दुर्लभं देवि ! डामरेषु प्रकाशितं । पठनात् धारणान्मर्त्यो,

॥ यक्षिणी-वशमानयेत् ॥

हे देवि ! यह कवच सभी शास्त्रों में दुर्लभ है, केवल डामर-तन्त्रों में
प्रकाशित किया गया है । इसके पाठ और लिखकर धारण करने से यक्षिणी वश में होती है ।

विनियोग :-

ॐ अस्य श्रीयक्षिणी-कवचस्य श्रीगर्ग ऋषिः, गायत्री छन्दः,
श्री अमुकी यक्षिणी देवता, साक्षात् सिद्धि-समृद्धयर्थे पाठे विनियोगः ।

ऋष्यादिन्यासः-

श्रीगर्ग ऋषये नमः शिरसि,
गायत्री छन्दसे नमः मुखे,
श्री अमुकी यक्षिणी देवतायै नमः हृदि,
साक्षात् सिद्धि-समृद्धयर्थे पाठे
विनियोगाय नमः सर्वांगे।

॥ मूल पाठ ॥

शिरो मे यक्षिणी पातु, ललाटं यक्ष-कन्यका ।
मुखं श्री धनदा पातु, कर्णौ मे कुल-नायिका ॥

चक्षुषी वरदा पातु, नासिकां भक्त-वत्सला ।
केशाग्रं पिंगला पातु, धनदा श्रीमहेश्वरी ॥

स्कन्धौ कुलालपा पातु, गलं मे कमलानना ।
किरातिनी सदा पातु, भुज-युग्मं जटेश्वरी ॥

विकृतास्या सदा पातु, महा-वज्र-प्रिया मम ।
अस्त्र-हस्ता पातु नित्यं, पृष्ठमुदर-देशकम् ॥

भेरुण्डा माकरी देवी, हृदयं पातु सर्वदा ।
अलंकारान्विता पातु, मे नितम्ब-स्थलं दया ॥

धार्मिका गुह्यदेशं मे, पाद-युग्मं सुरांगना ।
शून्यागारे सदा पातु, मन्त्र-माता-स्वरुपिणी ॥

निष्कलंका सदा पातु, चाम्बुवत्यखिलं तनुं ।
प्रान्तरे धनदा पातु, निज-बीज-प्रकाशिनी ॥

लक्ष्मी-बीजात्मिका पातु, खड्ग-हस्ता श्मशानके ।
शून्यागारे नदी-तीरे, महा-यक्षेश-कन्यका ॥

पातु मां वरदाख्या मे, सर्वांगं पातु मोहिनी ।
महा-संकट-मध्ये तु, संग्रामे रिपु-सञ्चये ॥

क्रोध-रुपा सदा पातु, महा-देव निषेविका ।
सर्वत्र सर्वदा पातु, भवानी कुल-दायिका ॥

इत्येतत् कवचं देवि ! महा-यक्षिणी-प्रीतिवं ।
अस्यापि स्मरणादेव, राजत्वं लभतेऽचिरात् ॥

पञ्च-वर्ष-सहस्राणि, स्थिरो भवति भू-तले ।
वेद-ज्ञानी सर्व-शास्त्र-वेत्ता भवति निश्चितम् ।
अरण्ये सिद्धिमाप्नोति, महा-कवच-पाठतः ।
यक्षिणी कुल-विद्या च, समायाति सु-सिद्धदा ॥

अणिमा-लघिमा-प्राप्तिः सुख-सिद्धि-फलं लभेत् ।
पठित्वा धारयित्वा च, निर्जनेऽरण्यमन्तरे ॥

स्थित्वा जपेल्लक्ष-मन्त्र मिष्ट-सिद्धिं लभेन्निशि ।
भार्या भवति सा देवी, महा-कवच-पाठतः ॥
ग्रहणादेव सिद्धिः स्यान्, नात्र कार्या विचारणा ॥

॥ इति वृहद् भूत डामरे महातन्त्रे श्रीमदुन्मत्त भैरवी-भैरव सम्वादे यक्षिणी कवच संपूर्ण ॥

यक्षिणी कवच के लाभ (Benefits of Yakshini Kavacham)

  1. यक्षिणी वशीकरण – इस कवच के पाठ एवं धारण से यक्षिणी स्वयं साधक के पास आती है और वश में रहती है।
  2. अलौकिक सिद्धियाँ – अणिमा, लघिमा, प्राप्ति आदि सिद्धियाँ सहजता से प्राप्त होती हैं।
  3. राज्य, धन और ऐश्वर्य – कवच स्मरण मात्र से राजसत्ता, धन, और वैभव की प्राप्ति होती है।
  4. सभी ओर से सुरक्षा – यह कवच साधक के समस्त शरीर की रक्षा करता है, विशेषकर तांत्रिक बाधाओं और अदृश्य शक्तियों से।
  5. गूढ़ तांत्रिक ज्ञान की प्राप्ति – साधक को यक्षिणी कुल की विद्या सिद्ध होती है, जिससे वह अत्यंत दुर्लभ तांत्रिक रहस्यों को जान पाता है।
  6. वशीकरण और आकर्षण शक्ति – साधक में अपूर्व आकर्षण व सम्मोहन शक्ति उत्पन्न होती है।
  7. गोपनीय इच्छाओं की पूर्ति – विशेष रूप से कामना, वैवाहिक संबंध, सौंदर्य, प्रेम और आकर्षण से जुड़ी इच्छाएं पूर्ण होती हैं।

साधना विधि (Vidhi of Yakshini Kavach)

⚠️ ध्यान दें: यह एक उच्चस्तरीय तांत्रिक कवच है, जिसे केवल अनुभवी साधक या योग्य गुरु के मार्गदर्शन में किया जाना चाहिए।

  1. स्थान: एकांत स्थान, विशेषकर श्मशान, नदी तट, या निर्जन कुटिया।
    अत्यंत शक्तिशाली साधना होने के कारण सार्वजनिक स्थानों या सामान्य घर में इसका प्रयोग अनुचित है।
  2. समय: रात्रि का समय विशेष रूप से प्रभावी माना गया है – मध्यरात्रि (12:00 AM से 3:00 AM) में साधना करें।
  3. स्नान और शुद्धि: साधना से पहले स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। मस्तक पर तिलक लगाएं।
  4. आसन: कुश या ऊन का आसन बिछाकर उत्तर या पूर्व की ओर मुख करके बैठें।
  5. दीपक एवं धूप: तांत्रिक नियमों के अनुसार, तेल का दीपक व गुग्गुल-लोबान की धूप जलाएं।
  6. कवच पाठ / जाप:
    • सबसे पहले विनियोग, ऋष्यादि न्यास करें।
    • फिर पूर्ण श्रद्धा से यक्षिणी कवच का पाठ करें।
    • चाहें तो इसे भोजपत्र पर लिखकर ताबीज के रूप में धारण कर सकते हैं।
  7. जप संख्या (यदि मंत्र जप करना हो):
    • कम से कम 1 लाख बार (100,000) बीज मंत्र का जप करें – जैसे ॐ ह्रीं अमुकी यक्षिण्यै नमः (यह मंत्र साधना में प्रयुक्त हो सकता है, परन्तु विशेष मंत्र गुरु द्वारा बताया जाता है)।
  8. नैवेद्य: यक्षिणी साधना में गुलाब, केसर, इत्र, लौंग, इलायची, और दूध से बनी मिठाइयाँ अर्पित की जाती हैं।
  9. धारण विधि: पाठ के पश्चात कवच को भोजपत्र या ताम्र पत्र पर लिखकर ताबीज में भरें और दाहिने भुज पर बाँधें।

जप / पाठ का उपयुक्त समय (Best Time for Chanting/Recitation)

दिनसमयविशेषता
रोज़ानारात 12:00 AM – 3:00 AMसिद्धि के लिए श्रेष्ठ मुहूर्त
पूर्णिमापूरी रात या रात्रि आरंभचंद्रशक्ति से सिद्धि शीघ्र
अमावस्याश्मशान या तंत्र स्थल मेंउच्चतम तांत्रिक प्रभाव
नवरात्रिप्रतिदिन रात कोविशेष रूप से यक्षिणी साधना के लिए शुभ
होली/दीपावलीमध्यरात्रि साधनादुर्लभ सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं

⚠️ विशेष सावधानियाँ (Precautions):

  • यह साधना बिना गुरु मार्गदर्शन के न करें
  • साधना करते समय पूर्ण ब्रह्मचर्य, मौन, और संयम आवश्यक है।
  • किसी को हानि पहुँचाने के लिए इसका प्रयोग न करें, अन्यथा साधक को विपरीत फल भी मिल सकता है।
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