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मृतसञ्जीवन स्तोत्र (Mritsanjeevan Stotra)

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Mritsanjeevan Stotra (श्री मृतसञ्जीवन स्तोत्र) भगवान शिव को समर्पित एक अत्यंत प्रभावशाली स्तोत्र है। “मृतसञ्जीवन” का अर्थ है — मृत्यु से जीवन की ओर वापस लाने वाला कवच। यह स्तोत्र अकाल मृत्यु से रक्षा करने वाला और जीवन में स्वास्थ्य, दीर्घायु तथा आध्यात्मिक बल देने वाला माना जाता है।

मत्स्य पुराण के अनुसार, जब देवताओं और असुरों के बीच बार-बार युद्ध होता था, तब देवता हर बार विजयी होते थे। अपमानित होकर, असुराचार्य शुक्राचार्य ने भगवान शिव से मृतसञ्जीवन विद्या प्राप्त करने के लिए घोर तप किया।
जब शुक्राचार्य तप में लीन थे, असुरों ने उनके पिता महर्षि भृगु के आश्रम में शरण ली। देवताओं ने इस अवसर का लाभ उठाकर असुरों पर आक्रमण किया। महर्षि भृगु की अनुपस्थिति में उनकी पत्नी ने अपने तपोबल से इन्द्र को immobilize कर दिया। इन्द्र ने भगवान विष्णु से सहायता मांगी, जिन्होंने सुदर्शन चक्र से भृगु पत्नी का वध कर दिया।
क्रोधित भृगु ने विष्णु को पृथ्वी पर बार-बार जन्म लेने का श्राप दिया — इसी के कारण विष्णु को विभिन्न अवतार लेने पड़े।

इस कथा के माध्यम से यह स्पष्ट होता है कि मृतसञ्जीवन स्तोत्र में अद्भुत चमत्कारी शक्ति है, जो मृत्यु जैसे भय को भी परास्त कर सकती है।

श्री मृतसञ्जीवन स्तोत्र हिंदी पाठ

Mritsanjeevan Stotra in Hindi

एवमाराध्य गौरीशं देवं मृत्युञ्जयेश्वरम्
मृतसञ्जीवनं नाम्ना कवचं प्रजपेत् सदा ।। 1 ।।

सारात्सारतरं पुण्यं गुह्यात्गुह्यतरं शुभम्
महादेवस्य कवचं मृतसञ्जीवनामकम् ।। 2 ।।

समाहितमना भूत्वा शृणुश्व कवचं शुभम्
शृत्वैतद्दिव्य कवचं रहस्यं कुरु सर्वदा ।। 3 ।।

वराभयकरो यज्वा सर्वदेवनिषेवितः
मृत्युञ्जयो महादेवः प्राच्यां मां पातु सर्वदा ।। 4 ।।

दधानः शक्तिमभयां त्रिमुखं षड्भुजः प्रभुः
सदाशिवोऽग्निरूपी मामाग्नेय्यां पातु सर्वदा ।। 5 ।।

अष्टादशभुजोपेतो दण्डाभयकरो विभुः
यमरूपी महादेवो दक्षिणस्यां सदावतु ।। 6 ।।

खड्गाभयकरो धीरो रक्षोगणनिषेवितः
रक्षोरूपी महेशो मां नैऋत्यां सर्वदावतु ।। 7 ।।

पाशाभयभुजः सर्वरत्नाकरनिषेवितः
वरूणात्मा महादेवः पश्चिमे मां सदावतु ।। 8 ।।

गदाभयकरः प्राणनायकः सर्वदागतिः
वायव्यां वारुतात्मा मां शङ्करः पातु सर्वदा ।। 9 ।।

शङ्खाभयकरस्थो मां नायकः परमेश्वरः
सर्वात्मान्तरदिग्भागे पातु मां शङ्करः प्रभुः ।। 10 ।।

शूलाभयकरः सर्वविद्यानामधिनायकः
ईशानात्मा तथैशान्यां पातु मां परमेश्वरः ।। 11 ।।

ऊर्ध्वभागे ब्रह्मरूपी विश्वात्माऽधः सदावतु
शिरो मे शङ्करः पातु ललाटं चन्द्रशेखरः ।। 12 ।।

भूमध्यं सर्वलोकेशस्त्रिणेत्रो लोचनेऽवतु
भ्रूयुग्मं गिरिशः पातु कर्णौ पातु महेश्वरः ।। 13 ।।

नासिकां मे महादेव ओष्ठौ पातु वृषध्वजः
जिव्हां मे दक्षिणामूर्तिर्दन्तान्मे गिरिशोऽवतु ।। 14 ।।

मृत्युञ्जयो मुखं पातु कण्ठं मे नागभूषणः
पिनाकि मत्करौ पातु त्रिशूलि हृदयं मम ।। 15 ।।

पञ्चवक्त्रः स्तनौ पातु उदरं जगदीश्वरः
नाभिं पातु विरूपाक्षः पार्श्वो मे पार्वतिपतिः ।। 16 ।।

कटद्वयं गिरिशौ मे पृष्ठं मे प्रमथाधिपः
गुह्यं महेश्वरः पातु ममोरु पातु भैरवः ।। 17 ।।

जानुनी मे जगद्धर्ता जङ्घे मे जगदंबिका
पादौ मे सततं पातु लोकवन्द्यः सदाशिवः ।। 18 ।।

गिरिशः पातु मे भार्या भवः पातु सुतान्मम
मृत्युञ्जयो ममायुष्यं चित्तं मे गणनायकः ।। 19 ।।

सर्वाङ्गं मे सदा पातु कालकालः सदाशिवः
एतत्ते कवचं पुण्यं देवतानांच दुर्लभम् ।। 20 ।।

मृतसञ्जीवनं नाम्ना महादेवेन कीर्तितम्
सहस्त्रावर्तनं चास्य पुरश्चरणमीरितम् ।। 21 ।।

यः पठेच्छृणुयानित्यं श्रावयेत्सु समाहितः
सकालमृत्यु निर्जित्य सदायुष्यं समश्नुते ।। 22 ।।

हस्तेन वा यदा स्पृष्ट्वा मृतं सञ्जीवयत्यसौ
आधयोव्याधयस्तस्य न भवन्ति कदाचन ।। 23 ।।

कालमृत्युमपि प्राप्तमसौ जयति सर्वदा
अणिमादिगुणैश्वर्यं लभते मानवोत्तमः ।। 24 ।।

युद्धारम्भे पठित्वेदमष्टाविंशतिवारकम्
युद्धमध्ये स्थितः शत्रुः सद्यः सर्वैर्न दृश्यते ।। 25 ।।

न ब्रह्मादिनी चास्त्राणि क्षयं कुर्वन्ति तस्य वै
विजयं लभते देवयुद्धमध्येऽपि सर्वदा ।। 26 ।।

प्रातरूत्थाय सततं यः पठेत्कवचं शुभम्
अक्षय्यं लभते सौख्यमिहलोके परत्र च ।। 27 ।।

सर्वव्याधिविनिर्मुक्तः सर्वरोगविवर्जितः
अजरामरणो भूत्वा सदा षोडशवार्षिकः ।। 28 ।।

विचरत्यखिलान् लोकान् प्राप्य भोगांश्च दुर्लभान्
तस्मादिदं महागोप्यं कवचं समुदाहृतम् ।। 29 ।।

मृतसञ्जीवनं नाम्ना दैवतैरपि दुर्लभम्
इति वसिष्ठकृतं मृतसञ्जीवन स्तोत्रम् ।। 30 ।।

।। इति श्रीमृतसञ्जीवन स्तोत्र संपूर्णम् ।।

श्री मृतसञ्जीवन स्तोत्र (हिंदी अनुवाद)

इस प्रकार गौरीशं, मृत्युंजय भगवान का पूजन करके
मृतसञ्जीवन नामक कवच का सदा जप करना चाहिए ॥ 1 ॥

यह सबसे उत्तम, पुण्यदायक, अत्यंत गोपनीय और मंगलमय है
महादेव का कवच, जिसे मृतसञ्जीवन कहा जाता है ॥ 2 ॥

पूर्ण मन से एकाग्र होकर यह शुभ कवच सुनो
इस दिव्य कवच को सुनकर इसे सदा रहस्यपूर्वक करो ॥ 3 ॥

वर और अभय देनेवाले, यज्ञ करने वाले, सभी देवताओं द्वारा पूजित
मृत्युञ्जय महादेव पूर्व दिशा में मुझे सदा रक्षा करें ॥ 4 ॥

तीन मुख और छह भुजाओं वाले, शक्तिधारी और अभय देने वाले
सदाशिव अग्निरूप में आग्नेय दिशा में मेरी सदा रक्षा करें ॥ 5 ॥

अठारह भुजाओं वाले, दंड और अभय देने वाले
यमरूपी महादेव दक्षिण दिशा में मुझे सदा रक्षा करें ॥ 6 ॥

खड्ग और अभय देने वाले, राक्षसों द्वारा पूजित
राक्षसरूपी महेश नैऋत्य दिशा में मेरी रक्षा करें ॥ 7 ॥

पाश और अभय देने वाले, सभी रत्नों के स्वामी द्वारा पूजित
वरुणात्मा महादेव पश्चिम दिशा में मेरी रक्षा करें ॥ 8 ॥

गदा और अभय देने वाले, प्राणों के स्वामी
वायव्य दिशा में वायु स्वरूप शंकर मेरी सदा रक्षा करें ॥ 9 ॥

शंख और अभय देने वाले, परमेश्वर
सभी अंतरदिशाओं में शंकर प्रभु मेरी रक्षा करें ॥ 10 ॥

त्रिशूल और अभय देने वाले, सभी विद्याओं के स्वामी
ईशान दिशा में ईशानरूपी परमेश्वर मेरी रक्षा करें ॥ 11 ॥

ऊर्ध्वभाग में ब्रह्मा स्वरूप, अधोभाग में विश्वात्मा
मेरे मस्तक की रक्षा शंकर करें, ललाट की चंद्रशेखर करें ॥ 12 ॥

मध्य भाग की रक्षा सर्वलोकेश त्रिनेत्रधारी करें
भौंहों की रक्षा गिरिश करें, कानों की महेश्वर करें ॥ 13 ॥

नाक की रक्षा महादेव, होंठों की वृषध्वज करें
जीभ की दक्षिणामूर्ति करें, दांतों की गिरिश करें ॥ 14 ॥

मुख की रक्षा मृत्युंजय, गले की नागभूषण
हाथों की पिनाकी रक्षा करें, हृदय की त्रिशूलधारी ॥ 15 ॥

स्तनों की पंचवक्त्र रक्षा करें, उदर की जगदीश्वर
नाभि की विरूपाक्ष करें, पार्श्व की पार्वतीपति करें ॥ 16 ॥

कटि की गिरिश रक्षा करें, पीठ की प्रमथाधिप
गुप्तांग की महेश्वर रक्षा करें, जांघ की भैरव करें ॥ 17 ॥

घुटनों की रक्षा जगत के धारक करें, पिंडली की जगदंबिका
पैरों की सदा रक्षा लोकवंद्य सदाशिव करें ॥ 18 ॥

गिरिश मेरी पत्नी की रक्षा करें, भव मेरे पुत्रों की
मृत्युञ्जय मेरी आयु की रक्षा करें, गणनायक मेरे चित्त की ॥ 19 ॥

सदा मेरे संपूर्ण अंगों की रक्षा कालकाल सदाशिव करें
यह पुण्य कवच देवताओं को भी दुर्लभ है ॥ 20 ॥

मृतसञ्जीवन नाम से यह महादेव द्वारा कहा गया है
इसका सहस्त्र (1000) बार जप पूर्वक अनुष्ठान बताया गया है ॥ 21 ॥

जो इसे पढ़े, सुने, दूसरों को सुनाए
वह अकाल मृत्यु को जीतकर दीर्घायु को प्राप्त करता है ॥ 22 ॥

हाथ से छूकर मृत व्यक्ति को भी जीवित कर देता है
उसे कोई रोग या कष्ट नहीं होता ॥ 23 ॥

वह कालमृत्यु पर भी सदा विजय प्राप्त करता है
अणिमा आदि आठ सिद्धियाँ उसे प्राप्त होती हैं ॥ 24 ॥

युद्ध प्रारंभ में इसे 28 बार पढ़े
तो युद्ध में खड़ा शत्रु तुरंत अदृश्य हो जाता है ॥ 25 ॥

ब्रह्मास्त्र आदि कोई भी अस्त्र उस पर असर नहीं करता
वह देवताओं के युद्ध में भी विजय प्राप्त करता है ॥ 26 ॥

प्रातःकाल उठकर सदा जो यह शुभ कवच पढ़ता है
उसे इस लोक और परलोक में अटूट सुख प्राप्त होता है ॥ 27 ॥

वह सभी रोगों से मुक्त, रोगरहित,
अजर, अमर और सदा सोलह वर्ष का रहता है ॥ 28 ॥

वह सभी लोकों में विचरण करता है और दुर्लभ भोगों को प्राप्त करता है
इसलिए यह अत्यंत गोपनीय कवच बताया गया है ॥ 29 ॥

मृतसञ्जीवन नामक यह कवच देवताओं को भी दुर्लभ है
यह वसिष्ठ ऋषि द्वारा रचित मृतसञ्जीवन स्तोत्र है ॥ 30 ॥

।। श्री मृतसञ्जीवन स्तोत्र सम्पूर्णम् ।।

श्री मृतसञ्जीवन स्तोत्र के लाभ (Benefits):

  1. अकाल मृत्यु से रक्षा:
    यह स्तोत्र भगवान मृत्युंजय शिव को समर्पित है, जो अकाल मृत्यु के नाशक हैं। इसका नियमित पाठ मृत्यु जैसे गंभीर भय को भी हराता है।
  2. बीमारियों से मुक्ति:
    शारीरिक, मानसिक और आत्मिक रोगों से रक्षा करता है। गंभीर रोगों में यह स्तोत्र विशेष प्रभावी माना गया है।
  3. संकट एवं बाधा से मुक्ति:
    जीवन में आने वाली सभी प्रकार की आपदाओं, दुर्घटनाओं और ग्रह बाधाओं से रक्षा करता है।
  4. शत्रु नाश और सुरक्षा कवच:
    यह स्तोत्र शिव का कवच है, जो साधक को अदृश्य सुरक्षा प्रदान करता है – शत्रु चाहे कितना भी बलवान क्यों न हो।
  5. दीर्घायु और बलवर्धक:
    इसका नियमित पाठ साधक को दीर्घायु, बल, तेज और आत्मिक शांति प्रदान करता है।
  6. मृत को जीवित करने की शक्ति:
    विश्वास किया जाता है कि सच्चे नियम से इसका पाठ किसी मृत प्राणी को भी चेतना दे सकता है।

पाठ / जप विधि (Vidhi):

  1. स्थान और समय:
    एक शांत, पवित्र स्थान चुनें – शिवलिंग के समक्ष या घर में पूजा स्थान पर बैठें।
  2. स्नान और शुद्धता:
    स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें।
  3. संकल्प लें:
    भगवान शिव को प्रणाम करें और मन में उद्देश्य लेकर स्तोत्र का पाठ आरंभ करें।
  4. धूप-दीप अर्पण करें:
    भगवान शिव को पुष्प, बेलपत्र, धूप और दीप से पूजन करें।
  5. जप संख्या:
    कम से कम 1 बार प्रतिदिन, विशेष लाभ हेतु 11, 21 या 108 बार पाठ करें। युद्ध या विशेष संकट में 28 बार या 1008 बार पाठ का विधान है।
  6. पुरश्चरण (विशेष साधना):
    सहस्र बार पाठ करके इस स्तोत्र का विशेष फल प्राप्त किया जा सकता है।

जाप का उत्तम समय (Best Time to Chant):

  • प्रातःकाल (सुबह 4 बजे से 6 बजे): सबसे शुभ और शक्तिशाली समय।
  • त्रयोदशी / प्रदोष / सोमवार: भगवान शिव को समर्पित दिन पर पाठ करना अति फलदायी होता है।
  • संक्रमण काल / ग्रहण काल / संकट काल: संकट और मृत्यु के भय से ग्रस्त समय में इसका पाठ रक्षात्मक कवच बनता है।
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