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माँ तारा देवी स्तोत्रं (Maa Tara Devi Stotram)

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माँ तारा देवी को दस महाविद्याओं में द्वितीय स्थान प्राप्त है। वे करुणामयी, ज्ञानदायिनी और संकटों का नाश करने वाली देवी मानी जाती हैं। उनका रूप उग्र होने पर भी भक्तों के लिए अत्यंत सौम्य और कल्याणकारी है। तारा देवी का स्तोत्र एक अत्यंत प्रभावशाली स्तुति है, जो तांत्रिक और वैदिक साधना दोनों में पूजनीय है।

इस स्तोत्र में माँ तारा के तेजस्वी रूप, दिव्य सौंदर्य, त्रिनेत्र स्वरूप, उनके शक्ति व पराक्रम की वंदना की गई है। स्तोत्र का पाठ करने से जीवन में सौभाग्य, विद्या, वाणी की सिद्धि, दरिद्रता का नाश और आत्मबल की वृद्धि होती है। यह स्तोत्र न केवल मानसिक भय और दोषों को समाप्त करता है, बल्कि साधक को आध्यात्मिक मार्ग पर अग्रसर भी करता है।

जो साधक इस स्तोत्र का श्रद्धा पूर्वक नियम से पाठ करता है, वह माँ तारा की विशेष कृपा का पात्र बनता है और उसे सांसारिक और आध्यात्मिक दोनों लाभ प्राप्त होते हैं।

माँ तारा स्तोत्र (Maa Tara Stotram)

मातर्नीलसरस्वति प्रणमतां सौभाग्यसम्पत्प्रदे
प्रत्यालीढपदस्थिते शवहृदि स्मेराननाम्भोरुहे ।
फुल्लेन्दीवरलोचनत्रययुते कर्तीकपालोत्पले खड्गं
चादधती त्वमेव शरणं त्वामीश्वरीमाश्रये ॥ १ ॥

वाचामीश्वरि भक्तकल्पलतिके सर्वार्थसिद्धीश्वरि
सद्यः प्राकृतगद्यपद्यरचनासर्वार्थसिद्धिप्रदे ।
नीलेन्दीवरलोचनत्रययुते कारुण्यवारांनिधे
सौभाग्यामृतवर्षणेन कृपया सिञ्च त्वमस्मादृशम् ॥ २ ॥

खर्वे गर्वसमहपूरिततनो सर्पादिभूषोज्ज्वले
व्याघ्रत्वक्परिवीतसुन्दरकटिव्याधूतघण्टाङ्किते ।
सद्यःकृत्तगलद्रजःपरिलसन्मुण्डद्वयीमूर्धज
ग्रन्थिश्रेणिनृमुण्डदामललिते भीमे भयं नाशय ॥ ३ ॥

मायानङ्गविकाररूपललनाबिन्द्वर्धचन्द्रात्मिके
हूंफट्कारमयि त्वमेव शरणं मन्त्रात्मिके मादृशः ।
मूर्तिस्ते जननि त्रिधामघटिता स्थूलातिसूक्ष्मा परा
वेदनां नहि गोचरा कथमपि प्राप्तां नु तामाश्रये ॥ ४ ॥

त्वत्पादाम्बुजसेवया सुकृतिनो गच्छन्ति सायुज्यतां
तस्य श्रीपरमेश्वरी त्रिनयनब्रह्मादिसौम्यात्मनः ।
संसाराम्बुधिमज्जने पटुतनून् देवेन्द्रमुख्यान् सुरान्
मातस्त्वत्पदसेवने हि विमुखान् को मन्दधीः सेवते ॥ ५ ॥

मातस्त्वत्पदपङ्कजद्वयरजोमुद्राङ्ककोटीरिणस्ते
देवासुरसंगरे विजयिनो निःशङ्कमङ्के गताः ।
देवोऽहं भुवने न मे सम इति स्पर्द्धां वहन्तः परे
तत्तुल्या नियतं तथा चिरममी नाशं व्रजन्ति स्वयम् ॥ ६ ॥

त्वन्नामस्मरणात् पलायनपरा द्रष्टुं च शक्ता न ते
भूतप्रेतपिशाचराक्षसगणा यक्षाश्च नागाधिपाः ।
दैत्या दानवपुङ्गवाश्च खचरा व्याघ्रादिका जन्तव
ओडाकिन्यः कुपितान्तकाश्च मनुजा मातः क्षणं भूतले ॥ ७ ॥

लक्ष्मीः सिद्धगणाश्च पादुकमुखाः सिद्धास्तथा
वारिणां स्तम्भश्चापि रणाङ्गणे गजघटास्तम्भस्तथा मोहनम् ।
मातस्त्वत्पदसेवया खलु नृणां सिद्ध्यन्ति ते ते गुणाः
कान्तिः कान्ततरा भवेच्च महती मूढोऽपि वाचस्पतिः ॥ ८ ॥

ताराष्टकमिदं रम्यं भक्तिमान् यः पठेन्नरः ।
प्रातर्मध्याह्नकाले च सायाह्ने नियतः शुचिः ॥ ९ ॥

लभते कवितां दिव्यां सर्वशास्त्रार्थविद् भवेत् ।
लक्ष्मीमनश्वरां प्राप्य भुक्त्वा भोगान् यथेप्सितान् ॥ १० ॥

कीर्ति कान्तिं च नैरुज्यं सर्वेषां प्रियतां व्रजेत् ।
विख्यातिं चैव लोकेषु प्राप्यान्ते मोक्षमाप्नुयात् ॥ ११ ॥

।। इति माँ तारा स्तोत्र सम्पूर्णम् ।।

माँ तारा स्तोत्र – हिंदी अनुवाद
Maa Tara Stotram – Hindi Translation

हे माँ नील सरस्वती!
जो आपकी शरण में आते हैं, उन्हें सौभाग्य और समृद्धि प्रदान करने वाली हैं।
आप शव पर खड़ी हैं, कमल जैसे मुख पर मुस्कान है,
तीनों नेत्र कमल जैसे हैं, हाथ में खड्ग (तलवार) और खप्पर लिए हैं –
हे ईश्वरी! मैं आपकी ही शरण लेता हूँ। ॥ १ ॥

हे वाणी की अधिष्ठात्री! हे भक्तों की इच्छा पूरी करने वाली कल्पलता!
आप सभी सिद्धियों को देने वाली हैं,
आपका रूप नीले कमल जैसे नेत्रों वाला है और आप करुणा की सागर हैं।
कृपया अपनी सौभाग्य और अमृत रूपी कृपा की वर्षा हम पर करें। ॥ २ ॥

आपका शरीर गर्व से भरा है, नागों से विभूषित है,
बाघ की खाल से कमर ढकी है और घंटियाँ बजती हैं।
आपका गला ताजा कटा हुआ प्रतीत होता है और
आप नरमुण्डों की माला पहने हैं – हे भयंकर रूपवाली माँ, मेरे भय को दूर करें। ॥ ३ ॥

आप मायारूपिणी हैं, अन्न और काम की अधिष्ठात्री हैं,
आपका स्वरूप बिंदु, अर्धचंद्र और बीजाक्षर “हूं फट्” से युक्त है।
हे मन्त्रस्वरूपिणी! आप ही हमारी शरण हैं।
आपकी मूर्ति स्थूल, सूक्ष्म और परा – तीनों स्वरूपों में है,
जो इंद्रियों से परे है – मैं उसी रूप में आपकी शरण लेता हूँ। ॥ ४ ॥

जो पुण्यात्मा आपके चरणों की सेवा करते हैं,
वे मोक्ष को प्राप्त करते हैं और ब्रह्मा-शिव जैसे देवों की कृपा पाते हैं।
देवेंद्र और अन्य देवता संसार सागर से बचने के लिए
आपकी सेवा में तत्पर रहते हैं –
तो फिर मूर्ख व्यक्ति ही ऐसे सेवा से विमुख रहते हैं। ॥ ५ ॥

हे माता! जिनके मुकुट पर आपके चरणों की धूल लगी होती है,
वे देवता और असुर संग्राम में विजयी होकर
आपकी गोद में निःसंकोच बैठ जाते हैं।
जो अहंकार से यह कहते हैं कि ‘मैं सबसे बड़ा हूँ’,
वे लोग निश्चय ही अंततः नष्ट हो जाते हैं। ॥ ६ ॥

आपका नाम सुनते ही भूत, प्रेत, पिशाच, राक्षस,
यक्ष, नागराज, दैत्य, दानव, जानवर, व्याघ्र,
उड्डाकिनी (तांत्रिक शक्तियाँ) और कुपित यमराज भी
आपसे डरकर भाग खड़े होते हैं। ॥ ७ ॥

लक्ष्मी, सिद्धगण, पादुका और अन्य तांत्रिक शक्तियाँ,
पानी को रोकना, रणभूमि में गज या हाथी को स्थिर करना,
मोहन और आकर्षण – ये सभी गुण आपकी सेवा से प्राप्त होते हैं।
आपकी सेवा से व्यक्ति सुंदरता, तेज, विद्वत्ता और समृद्धि पाता है,
यहाँ तक कि मूर्ख भी वाचस्पति बन जाता है। ॥ ८ ॥

जो भक्त यह ताराष्टक स्तोत्र
प्रातः, दोपहर और संध्या काल में पवित्र होकर पढ़ता है, ॥ ९ ॥

वह दिव्य काव्य रचने की क्षमता पाता है,
सभी शास्त्रों का ज्ञाता बनता है,
स्थायी लक्ष्मी (धन-संपत्ति) प्राप्त करता है और इच्छानुसार भोग भोगता है। ॥ १० ॥

वह कीर्ति, रूप, उत्तम स्वास्थ्य और सबका प्रिय बनता है,
सभी लोकों में प्रसिद्धि पाकर अंत में मोक्ष को प्राप्त करता है। ॥ ११ ॥

।। इस प्रकार माँ तारा स्तोत्र पूर्ण हुआ ।।

माँ तारा स्तोत्र – लाभ, विधि और जप का समय

लाभ (Benefits):
माँ तारा स्तोत्र के नियमित पाठ से साधक को अनेक आध्यात्मिक व लौकिक लाभ प्राप्त होते हैं—

  1. भय, भूत-प्रेत बाधा और नकारात्मक शक्तियों से सुरक्षा मिलती है।
  2. विद्या, वाणी और बुद्धि की वृद्धि होती है, जिससे साधक वाक्पटु और ज्ञानवान बनता है।
  3. आकस्मिक संकटों और शत्रु बाधाओं से रक्षा होती है।
  4. माँ तारा की कृपा से दरिद्रता, रोग और कष्ट दूर होते हैं।
  5. साधक को सौंदर्य, कीर्ति, तेज और लक्ष्मी की प्राप्ति होती है।
  6. आत्मबल, साधना में दृढ़ता और मंत्रसिद्धि जैसे दिव्य फल प्राप्त होते हैं।

विधि (Puja Vidhi):

  1. प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र पहनें और माँ तारा की मूर्ति या चित्र के सामने आसन लें।
  2. माँ को नीले या काले पुष्प, दीपक, धूप, नैवेद्य आदि समर्पित करें।
  3. पहले “ॐ ह्रीं स्त्रूं हूं फट्” बीजमंत्र से माँ का ध्यान करें।
  4. फिर श्रद्धा और भक्ति से माँ तारा स्तोत्र का पाठ करें।
  5. अंत में क्षमा प्रार्थना और आरती करें।
  6. स्तोत्र पाठ के बाद “जय माँ तारा” का कीर्तन करें।

जप का समय (Best Time for Recitation):

  • प्रातःकाल (सुबह 4 बजे से 6 बजे तक) ब्रह्ममुहूर्त में पाठ करना सर्वश्रेष्ठ होता है।
  • यदि संभव न हो तो प्रातः, मध्याह्न और सायं तीनों समय भी पाठ किया जा सकता है।
  • नवरात्रि, अमावस्या, पूर्णिमा, या तारा जयंती के दिन विशेष फलदायी माने जाते हैं।
  • साधक चाहें तो 21, 51 या 108 बार इस स्तोत्र का पाठ संकल्प के साथ कर सकते हैं।
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