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लक्ष्मी नरसिंह स्तोत्र (Lakshmi Narsingh Stotra)

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श्री लक्ष्मी नृसिंह स्तोत्र” भगवान विष्णु के उग्र और करुणामयी स्वरूप लक्ष्मी नृसिंह को समर्पित एक अत्यंत प्रभावशाली स्तोत्र है। यह स्तोत्र भगवान नृसिंहदेव के उन भक्तों द्वारा रचा गया है जो संसार के दुख, भय, मोह, पाप और शत्रुता से त्रस्त होकर उनके चरणों में शरण चाहते हैं। इसमें प्रत्येक श्लोक भक्त की पीड़ा, उसके संसार में फंसे होने की विवशता और भगवान से करुणा के लिए की गई प्रार्थना को दर्शाता है।

भगवान नृसिंह विष्णु के चौथे अवतार हैं, जिन्होंने हिरण्यकश्यप जैसे अत्याचारी राक्षस का संहार करके भक्त प्रह्लाद की रक्षा की थी। उनका यह रूप, जहाँ एक ओर उग्रता का प्रतीक है, वहीं दूसरी ओर शरणागत के लिए परम करुणामयी भी है। लक्ष्मी नृसिंह स्वरूप में वे माता लक्ष्मी के साथ विराजते हैं, जो भक्तों के जीवन में शक्ति, सुरक्षा, शांति और समृद्धि का संचार करते हैं।

यह स्तोत्र विशेष रूप से उन व्यक्तियों के लिए अत्यंत फलदायक है जो:

  • संसारिक दुःखों से त्रस्त हैं
  • मानसिक क्लेश, भय, रोग और संकट में हैं
  • शत्रु बाधा या कष्टदायक परिस्थितियों से घिरे हैं
  • ईश्वर की कृपा और आंतरिक शक्ति की प्राप्ति चाहते हैं

इस स्तोत्र का नित्य पाठ करने से न केवल आत्मिक बल प्राप्त होता है, बल्कि जीवन में स्थिरता, शांति और ईश्वरीय सुरक्षा भी सुनिश्चित होती है।

लक्ष्मी नृसिंह स्तोत्र केवल एक स्तुति नहीं, बल्कि संकटों में डूबे जीव के लिए ईश्वर से प्रार्थना की वह पुकार है, जो भक्त और भगवान के बीच करुणा का सेतु बन जाती है।

लक्ष्मी नरसिंह स्तोत्र (Lakshmi Narsingh Stotra)

श्रीमत्पयोनिधिनिकेतन चक्रपाणे
भोगीन्द्रभोगमणिरञ्जितपुण्यमूर्ते।
योगीश शाश्वत शरण्य भवाब्धिपोत
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम्।। १ ।।

ब्रह्मेन्द्ररुद्रमरुदर्ककिरीटकोटि-
सङघट्टिताङ्घ्रिकमलामलकान्तिकान्त।
लक्ष्मीलसत्कुचसरोरुहराजहंस
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम्।। २ ।।

संसारघोरगहने चरतो मुरारे
मारोग्रभीकरमृगप्रवरार्दितस्य।
आर्तस्य मत्सरनिदाघनिपीडितस्य
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम्।। ३ ।।

संसारकूपमतिघोरमगाधमूलं
सम्प्राप्य दुःखशतसर्पसमाकुलस्य।
दीनस्य देव कृपणापदमागतस्य
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम्।। ४ ।।

संसारसागरविशालकरालकाल-
नक्रग्रहग्रसननिग्रहविग्रहस्य।
व्यग्रस्य रागरसनोर्मिनिपीडितस्य
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम्।। ५ ।।

संसारवृक्षमघबीजमनन्तकर्म-
शाखाशतं करणपत्रमनङ्गपुष्पम्।
आरुह्य दुःखफलितं पततो दयालो
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम्।। ६ ।।

संसारसर्पघनवक्त्रभयोग्रतीव्र-
दंष्ट्राकरालविषदग्धविनष्टमूर्तेः।
नागारिवाहन सुधाब्धिनिवास शौरे
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम्।। ७ ।।

संसारदावदहनातुरभीकरोरु-
ज्वालावलीभिरतिदग्धतनूरुहस्य।
त्वत्पादपद्मसरसीशरणागतस्य
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम्।। ८ ।।

संसारजालपतितस्य जगन्निवास
सर्वेन्द्रियार्तबडिशार्थझषोपमस्य।
प्रोत्खण्डितप्रचुरतालुकमस्तकस्य
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम्।। ९ ।।

संसारभीकरकरीन्द्रकराभिघात-
निष्पिष्टमर्मवपुषः सकलार्तिनाश।
प्राणप्रयाणभवभीतिसमाकुलस्य
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम्।। १० ।।

अन्धस्य मे हृतविवेकमहाधनस्य
चोरैः प्रभो बलिभिरिन्द्रियनामधेयैः।
मोहान्धकूपकुहरे विनिपातितस्य
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम्।। ११ ।।

लक्ष्मीपते कमलनाभ सुरेश विष्णो
वैकुण्ठ कृष्ण मधुसूदन पुष्कराक्ष।
ब्रह्मण्य केशव जनार्दन वासुदेव
देवेश देहि कृपणस्य करावलम्बम्।। १२ ।।

यन्माययोर्जितवपुः प्रचुरप्रवाह-
मग्नार्थमत्र निवहोरुकरावलम्बम्।
लक्ष्मीनृसिंहचरणाब्जमधुव्रतेन
स्तोत्रं कृतं सुखकरं भुवि शङ्करेण।। १३ ।।

॥ इति श्री लक्ष्मी नृसिंह स्तोत्र सम्पूर्णम् ॥

श्री लक्ष्मी नृसिंह स्तोत्र – हिंदी अनुवाद

हे समुद्र के निवास स्थान वाले, चक्रधारी प्रभु!
हे शेषनाग की शय्या पर विराजमान पुण्य स्वरूप!
हे योगेश्वर, सनातन, शरणदाता!
हे भवसागर के पार उतारने वाले लक्ष्मी नृसिंह! मुझे अपना कर पकड़ाइए।। १ ।।

हे ब्रह्मा, इन्द्र, रुद्र और मरुद्गणों के मुकुटों से
आपके चरण कमलों से टकराकर जो तेज फैलता है, वह अद्भुत है।
हे लक्ष्मीजी के वक्षस्थलरूपी कमल में निवास करने वाले राजहंस स्वरूप प्रभु!
हे लक्ष्मी नृसिंह! मुझे अपना कर पकड़ाइए।। २ ।।

हे मुरारि! मैं संसार रूपी भयानक जंगल में भटक रहा हूँ,
जहाँ हिंसक पशु समान क्रूर कष्ट मुझे खा रहे हैं।
मैं ईर्ष्या और ताप से पीड़ित हूँ, दुखी हूँ, कृपया
हे लक्ष्मी नृसिंह! मुझे अपना कर पकड़ाइए।। ३ ।।

मैं संसार रूपी भयानक और गहरे कुएँ में गिर चुका हूँ,
जहाँ सैकड़ों दुःख रूपी सर्प चारों ओर लिपटे हैं।
हे दीनों के सहायक देव! मैं अत्यंत पीड़ित होकर आपकी शरण में आया हूँ।
हे लक्ष्मी नृसिंह! मुझे अपना कर पकड़ाइए।। ४ ।।

यह विशाल संसार रूपी समुद्र अत्यंत भयंकर है,
इसमें काल रूपी मगरमच्छों का डर है, और मोह की तरंगें मुझे खींच रही हैं।
हे प्रभु! मैं आकुल और भयभीत हूँ।
हे लक्ष्मी नृसिंह! मुझे अपना कर पकड़ाइए।। ५ ।।

संसार एक वृक्ष के समान है जिसका बीज पाप है,
जिसकी अनंत शाखाएँ कर्म हैं, इंद्रियाँ उसके पत्ते हैं और विषय उसकी फूलें।
मैं उस वृक्ष पर चढ़ा हूँ और दुःख रूपी फल झेल रहा हूँ।
हे दयालु प्रभु! मुझे संभालिए।
हे लक्ष्मी नृसिंह! मुझे अपना कर पकड़ाइए।। ६ ।।

संसार एक भयंकर सर्प के समान है,
जिसके मुख में विष और तीव्र दाँत हैं, जिसने मेरी काया को जला डाला है।
हे नाग पर सवारी करने वाले, अमृत-सागर में निवास करने वाले वीर विष्णु!
हे लक्ष्मी नृसिंह! मुझे अपना कर पकड़ाइए।। ७ ।।

यह संसार एक भयंकर अग्नि की तरह जलता हुआ दावानल है,
जिसकी ज्वालाओं से मेरी देह झुलस चुकी है।
मैं आपके चरण कमलों की शरण में आया हूँ।
हे लक्ष्मी नृसिंह! मुझे अपना कर पकड़ाइए।। ८ ।।

हे जगन्निवास! मैं संसार रूपी जाल में मछली के समान फँसा हूँ,
इंद्रिय रूपी काँटे मुझे खींच रहे हैं।
मेरा मस्तक पीड़ा से विदीर्ण हो चुका है।
हे लक्ष्मी नृसिंह! मुझे अपना कर पकड़ाइए।। ९ ।।

संसार रूपी भयंकर हाथी की टक्कर से
मेरा शरीर चूर-चूर हो चुका है,
और मैं जीवन के अंतिम क्षणों में भय से भर गया हूँ।
हे सब कष्टों को नष्ट करने वाले प्रभु!
हे लक्ष्मी नृसिंह! मुझे अपना कर पकड़ाइए।। १० ।।

मेरी बुद्धि रूपी सम्पत्ति को इन्द्रिय रूपी चोर चुरा ले गए हैं,
मैं अंधकार रूपी मोह के कुएँ में गिर चुका हूँ।
हे प्रभो! कृपया मेरी रक्षा कीजिए।
हे लक्ष्मी नृसिंह! मुझे अपना कर पकड़ाइए।। ११ ।।

हे लक्ष्मीपति, कमलनाभ, देवराजों के स्वामी विष्णु!
हे वैकुण्ठनाथ, कृष्ण, मधुसूदन, कमलनेत्र!
हे ब्रह्मण्यों के रक्षक, केशव, जनार्दन, वासुदेव!
हे देवाधिदेव! इस दीन की रक्षा कीजिए।
मुझे अपना कर पकड़ाइए।। १२ ।।

आपकी माया से मोहित होकर जो जीव संसार के प्रवाह में बह रहा है,
उसके उद्धार के लिए हे मधुविदारक!
शंकर ने आपके चरणों में भक्ति से यह स्तोत्र रचा है
जो संसार में सुख प्रदान करने वाला है।। १३ ।।

॥ इति श्री लक्ष्मी नृसिंह स्तोत्र सम्पूर्णम् ॥

श्री लक्ष्मी नृसिंह स्तोत्र के लाभ (Benefits)

  1. शत्रुओं का नाश और सुरक्षा की प्राप्ति:
    इस स्तोत्र का नियमित पाठ करने से छिपे या प्रकट शत्रुओं से सुरक्षा मिलती है और बुरी शक्तियाँ दूर होती हैं।
  2. भय, चिंता और मानसिक तनाव से मुक्ति:
    यह स्तोत्र मन में स्थित भय, अनिश्चितता और व्याकुलता को समाप्त करता है। विशेषकर अनिद्रा, डर, और अस्थिर चित्त के लिए अत्यंत प्रभावशाली है।
  3. भौतिक एवं आध्यात्मिक समृद्धि:
    लक्ष्मी नृसिंह दोनों के नाम से स्पष्ट है — यह स्तोत्र सुख-शांति, समृद्धि और दिव्यता का वरदान देता है।
  4. रोगों से राहत:
    उग्र नृसिंह का स्मरण असाध्य रोगों को शांत करने में भी सहायक होता है। मानसिक और शारीरिक शुद्धि मिलती है।
  5. ईश्वरीय कृपा और आत्मिक बल की प्राप्ति:
    स्तोत्र का पाठ साधक में साहस, श्रद्धा और भक्ति का भाव प्रबल करता है। वह संसार के दुखों में भी धैर्यपूर्वक खड़ा रहता है।

पाठ विधि (Paath Vidhi)

  1. स्थान का चयन:
    शांत, पवित्र और स्वच्छ स्थान चुनें — चाहे वह घर का पूजा स्थान हो या मंदिर।
  2. स्नान व शुद्धता:
    प्रातःकाल स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें। सफेद, पीले या भगवा वस्त्र श्रेष्ठ माने जाते हैं।
  3. आसन:
    कुश या ऊन का आसन बिछाकर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें।
  4. दीपक व धूप:
    दीपक (घी या तिल के तेल का) और धूप जलाएं। भगवान नृसिंह और माता लक्ष्मी को फूल, जल, और अक्षत अर्पण करें।
  5. संकल्प लें:
    मन में संकल्प करें कि आप श्रद्धा से स्तोत्र का पाठ कर रहे हैं।
  6. स्तोत्र पाठ करें:
    “श्री लक्ष्मी नृसिंह स्तोत्र” का श्रद्धा व विश्वास से पाठ करें। चाहें तो 3, 5 या 11 बार पाठ करें।
  7. अंत में प्रार्थना करें:
    अपने हृदय की पीड़ा, कष्ट व इच्छाएं प्रभु के चरणों में अर्पण करें।
  8. भोग अर्पण (यदि संभव हो):
    मिश्री, तुलसी, फल या पंचामृत अर्पित करें।

जप का श्रेष्ठ समय (Best Time for Recitation)

  1. प्रातःकाल (Brahma Muhurta – सुबह 4:00 से 6:00 बजे तक):
    यह समय सर्वोत्तम है — वातावरण शांत होता है और मन एकाग्र रहता है।
  2. संध्याकाल (शाम 6:00 से 8:00 बजे):
    दूसरा शुभ समय जब दिनभर की चंचलता के बाद मन प्रभु की ओर केंद्रित हो सकता है।
  3. विशेष दिनों पर:
    • नृसिंह चतुर्दशी
    • पूर्णिमा / एकादशी
    • मंगलवार और शनिवार को भी पाठ करना विशेष लाभकारी माना गया है।
    • प्रलयकारी समय या जीवन संकट में इसका जप अवश्य करना चाहिए।
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