चर्पट पंजरिका स्तोत्रम्, जिसे भज गोविन्दम् के नाम से भी जाना जाता है, आदि आदि शंकराचार्य द्वारा रचित एक अत्यंत प्रसिद्ध वैदिक स्तोत्र है। यह स्तोत्र मनुष्य को जीवन की क्षणभंगुरता, संसार की नश्वरता और ईश्वर भक्ति के महत्व का बोध कराता है। इसमें बार-बार यह संदेश दिया गया है कि केवल सांसारिक ज्ञान, धन, प्रतिष्ठा और भोग-विलास मनुष्य को अंतिम समय में नहीं बचा सकते; सच्चा सहारा केवल भगवान की भक्ति और आत्मज्ञान ही है।
कहा जाता है कि एक बार आदि शंकराचार्य ने एक वृद्ध ब्राह्मण को व्याकरण के कठिन नियमों का अभ्यास करते देखा। उस समय उन्होंने करुणा से प्रेरित होकर उसे समझाया कि मृत्यु के समय केवल शास्त्रीय तर्क और व्याकरण नहीं, बल्कि भगवान गोविन्द का स्मरण ही कल्याणकारी होगा। इसी प्रेरणा से इस अमूल्य स्तोत्र की रचना हुई।
यह स्तोत्र केवल धार्मिक पाठ नहीं है, बल्कि जीवन को सही दिशा देने वाला एक आध्यात्मिक मार्गदर्शक भी है। इसमें मानव जीवन के विभिन्न चरणों, इच्छाओं, मोह-माया, जन्म-मृत्यु के चक्र और आत्मज्ञान की आवश्यकता का अत्यंत सरल और प्रभावशाली वर्णन मिलता है।
यह स्तोत्र एक वृद्ध ब्राह्मण को व्याकरण के नियमों का अभ्यास करते देख शंकराचार्य द्वारा रचित हुआ। उन्होंने उसे समझाया कि मृत्यु के समय ये नियम उसकी रक्षा नहीं करेंगे; इसलिए गोविन्द (भगवान) का भजन ही मुक्ति का मार्ग है। इस स्तोत्र में 17 श्लोक हैं, जो जीवन की नश्वरता और ईश्वर भक्ति की आवश्यकता को दर्शाते हैं
चर्पट पंजरिका स्तोत्र का अर्थ
“चर्पट” का अर्थ है फटे-पुराने वस्त्र या चिथड़े और “पंजरिका” का अर्थ है पिंजरा। यह नाम प्रतीकात्मक रूप से बताता है कि यह शरीर और संसार एक अस्थायी पिंजरे के समान हैं। मनुष्य इसमें बंधकर अपने वास्तविक स्वरूप को भूल जाता है। यह स्तोत्र उस बंधन से मुक्त होकर परम सत्य की ओर बढ़ने की प्रेरणा देता है।
चर्पट पंजरिका स्तोत्र का मुख्य संदेश
इस स्तोत्र का केंद्रीय संदेश है:
“भज गोविन्दं भज गोविन्दं भज गोविन्दं मूढमते”
अर्थात् – हे मनुष्य! भगवान गोविन्द का भजन करो, क्योंकि मृत्यु के समय सांसारिक ज्ञान, तर्क और विद्वता तुम्हारी रक्षा नहीं कर पाएंगे।
स्तोत्र में बताया गया है कि:
- धन और संपत्ति स्थायी नहीं हैं।
- परिवार और संबंध भी शरीर के साथ ही जुड़े रहते हैं।
- यौवन, सौंदर्य और शक्ति नष्ट हो जाते हैं।
- इच्छाएं कभी समाप्त नहीं होतीं।
- जन्म और मृत्यु का चक्र चलता रहता है।
- केवल आत्मज्ञान और ईश्वर भक्ति ही मुक्ति का मार्ग है।
चर्पट पंजरिका स्तोत्रम् (Charpat Panjarika Stotra):
दिनमपि रजनी सायं प्रात: शिशिरवसन्तौ पुनरायात: ।
काल: क्रीडति गच्छत्यायुस्तदपि न मुच्चत्याशावायु: ।। १ ।।
भज गोविन्दं भज गोविन्दं भज गोविन्दं मूढमते ।
प्राप्ते संनिहिते मरणे नहि नहि रक्षति डुकृञ् करणे ।। (ध्रुवपदम्)
अग्रे वह्नि: पृष्ठे भानू रात्रौ चिबुकसमर्पितजानु: ।
करतलभिक्षा तरुतलवासस्तदपि न मुच्चत्याशापाश: ।। २ ।।
भज गोविन्दं भज गोविन्दं भज गोविन्दं मूढमते ।।
यावद्वित्तोपार्जनसक्तस्तावन्निजपरिवारो रक्त: ।
पश्चाद्धावति जर्जरदेहे वार्तां पृच्छति कोऽपि न गेहे ।। ३ ।।
भज गोविन्दं भज गोविन्दं भज गोविन्दं मूढमते ।।
जटिलो मुण्डी लुंचितकेश: काषायाम्बरबहुकृतवेष: ।
पश्यन्नपि च न पश्यति लोको ह्युदरनिमित्तं बहुकृतशोक: ।। ४ ।।
भज गोविन्दं भज गोविन्दं भज गोविन्दं मूढमते ।।
भगवद्गीता किंचिदधीता गंगाजल लवकणिकापीता ।
सकृदपि यस्य मुरारिसमर्चा तस्य यम: किं कुरते चर्चाम् ।। ५ ।।
भज गोविन्दं भज गोविन्दं भज गोविन्दं मूढमते ।।
अंगं गलितं पलितं मुण्डं दशनविहीनं जातं तुण्डम् ।
वृद्धो याति गृहीत्वा दण्डं तदपि न मुच्चत्याशा पिण्डम् ।। ६ ।।
भज गोविन्दं भज गोविन्दं भज गोविन्दं मूढमते ।।
बालास्तावत्क्रीडासक्तस्तरुणस्तावत्तरुणीरक्त: ।
वृद्धस्तावच्चिन्तामग्न: पारे ब्रह्मणि कोऽपि न लग्न: ।। ७ ।।
भज गोविन्दं भज गोविन्दं भज गोविन्दं मूढमते ।।
पुनरपि जननं पुनरपि मरणं पुनरपि जननीजठरे शयनम् ।
इह संसारे खलु दुस्तारे कृपयापारे पाहि मुरारे ।। ८ ।।
भज गोविन्दं भज गोविन्दं भज गोविन्दं मूढमते ।।
पुनरपि रजनी पुनरपि दिवस: पुनरपि पक्ष: पुनरपि मास: ।
पुनरप्ययनं पुनरपि वर्षं तदपि न मुच्चत्याशामर्षम् ।। ९ ।।
भज गोविन्दं भज गोविन्दं भज गोविन्दं मूढमते ।।
वयसि गते क: कामविकार: शुष्के नीरे क: कासार: ।
नष्टे द्रव्ये क: परिवारो ज्ञाते तत्त्वे क: संसार: ।। १० ।।
भज गोविन्दं भज गोविन्दं भज गोविन्दं मूढमते ।।
नारीस्तनभरनाभिनिवेशं मिथ्यामायामोहावेशम् ।
एतन्मांसवसादिविकारं मनसि विचारय बारम्बारम् ।। ११ ।।
भज गोविन्दं भज गोविन्दं भज गोविन्दं मूढमते ।।
कस्त्वं कोऽहं कुत आयात: का मे जननी को मे तात: ।
इति परिभावय सर्वमसारं विश्वं त्यक्त्वा स्वप्नविचारम् ।। १२ ।।
भज गोविन्दं भज गोविन्दं भज गोविन्दं मूढमते ।।
गेयं गीतानामसहस्त्रं ध्येयं श्रीपतिरूपमजस्त्रम् ।
नेयं सज्जनसंगे चित्तं देयं दीनजनाय च वित्तम् ।। १३ ।।
भज गोविन्दं भज गोविन्दं भज गोविन्दं मूढमते ।।
यावज्जीवो निवसति देहे कुशलं तावत्पृच्छति गेहे ।
गतवति वायौ देहापाये भार्या बिभ्यति तस्मिन्काये ।। १४ ।।
भज गोविन्दं भज गोविन्दं भज गोविन्दं मूढमते ।।
सुखत: क्रियते रामाभोग: पश्चाद्धन्त शरीरे रोग: ।
यद्यपि लोके मरणं शरणं तदपि न मुच्चति पापाचरणम् ।। १५ ।।
भज गोविन्दं भज गोविन्दं भज गोविन्दं मूढमते ।।
रथ्याचर्पटविरचितकन्थ: पुण्यापुण्यविवर्जितपन्थ: ।
नाहं न त्वं नायं लोकस्तदपि किमर्थं क्रियते शोक: ।। १६ ।।
भज गोविन्दं भज गोविन्दं भज गोविन्दं मूढमते ।।
कुरुते गंगासागरगमनं व्रतपरिपालनमथवा दानम् ।
ज्ञानविहीन: सर्वमतेन मुक्तिं न भजति जन्मशतेन ।। १७ ।।
भज गोविन्दं भज गोविन्दं भज गोविन्दं मूढमते ।।
॥ श्रीशंकराचार्यविरचितं चर्पट पंजरिका स्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥
चर्पट पंजरिका स्तोत्रम् का हिंदी अनुवाद (Hindi translation of Charpat Panjarika Stotram):
दिन जाता है, रात आती है, फिर शाम और सुबह होती है, शीत और वसंत बार-बार आते हैं —
काल खेलता रहता है, आयु चली जाती है — फिर भी आशा की वायु नहीं छूटती। (1)
आगे अग्नि है, पीछे सूर्य है, रात में ठोड़ी से घुटनों को छूकर बैठा है,
हाथ में भिक्षा पात्र है, वृक्ष के नीचे निवास है — फिर भी आशा का बंधन नहीं छूटता। (2)
जब तक धन कमाने में लगे रहते हो, तब तक परिवार प्रेम करता है।
लेकिन जब शरीर जर्जर हो जाता है, तब कोई घर में हाल भी नहीं पूछता। (3)
जटा वाला, सिर मुँड़वाया हुआ, बाल खींचे हुए, भगवा वस्त्र धारण किए हुए —
सब कुछ देखता है फिर भी नहीं देखता — यह दुनिया पेट के कारण बहुत दुःखी है। (4)
जिसने थोड़ी-सी गीता पढ़ी है, गंगाजल की एक बूँद भी पी है,
और जिसने कभी भी श्रीहरि की पूजा की है — उसके पास यमराज क्या कर पाएगा? (5)
अंग गल चुका है, सिर के बाल सफेद हो गए हैं, दाँत टूट गए हैं, मुँह सूख गया है,
बूढ़ा हो गया है, हाथ में लाठी लेकर चलता है — फिर भी आशा का पिंड नहीं छूटता। (6)
बचपन में खेल-कूद में लीन, युवावस्था में स्त्रियों में रत रहता है,
बुढ़ापे में चिंताओं में डूबा रहता है — ब्रह्म में कोई भी नहीं लगता। (7)
फिर से जन्म, फिर से मरण, फिर से माता के गर्भ में शयन —
यह संसार बहुत कठिन है — हे मुरारी! कृपा करके पार लगाओ। (8)
फिर से रात, फिर से दिन, फिर से पक्ष, फिर से महीना —
फिर से अयन, फिर से वर्ष — फिर भी आशा और क्रोध नहीं छूटते। (9)
जब जवानी चली गई, तो फिर कामनाएँ कहाँ?
जब पानी सूख गया, तो झील कहाँ?
जब धन चला गया, तो परिवार कहाँ?
और जब तत्व को जान लिया, तो संसार कहाँ? (10)
स्त्री के स्तनों और नाभि में आसक्त होना — यह मिथ्या माया और मोह का वश है।
यह सब मांस, रक्त और चर्बी का विकार है — मन में बार-बार विचार करो। (11)
तू कौन है? मैं कौन हूँ? कहाँ से आया हूँ? मेरी माँ कौन है? मेरा पिता कौन है?
इस प्रकार विचार कर, सबकुछ व्यर्थ समझ — इस स्वप्न जैसे जगत को त्याग दे। (12)
गायन करो गीता के हजार नामों का, ध्यान करो श्रीहरि के अनश्वर रूप का,
मन लगाओ सज्जनों की संगति में, और दान करो निर्धनों को अपना धन। (13)
जब तक शरीर में प्राण है, तब तक ही घर में कुशल पूछी जाती है।
लेकिन जब शरीर से प्राण चला जाता है, तब पत्नी तक उस शरीर से डरती है। (14)
आसान सुख में राम नाम का स्मरण नहीं करते — बाद में शरीर रोगी हो जाता है।
भले ही मृत्यु ही अंतिम सत्य है — फिर भी पाप करने से मन नहीं हटता। (15)
सड़क की चिथड़ों से बनी हुई चादर पहने हुए, पुण्य-पाप के परे का मार्ग अपनाया हुआ,
“मैं नहीं हूँ”, “तू नहीं है”, “यह लोक नहीं है” — तब फिर शोक किसलिए किया जाए? (16)
कोई गंगासागर स्नान करता है, व्रत करता है, दान देता है —
लेकिन यदि ज्ञान नहीं है, तो जन्मों तक भी उसे मुक्ति नहीं मिलती। (17)
॥ श्रीशंकराचार्यविरचितं चर्पट पंजरिका स्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥
चर्पट पंजरिका स्तोत्र का आध्यात्मिक महत्व
यह स्तोत्र अद्वैत वेदान्त की शिक्षाओं का सार माना जाता है। इसमें मनुष्य को बाहरी संसार से हटाकर अपने भीतर झांकने की प्रेरणा दी गई है।
आत्मचिंतन की प्रेरणा
“कस्त्वं कोऽहं कुत आयातः”
इन शब्दों के माध्यम से मनुष्य को स्वयं से प्रश्न करने के लिए कहा गया है कि वह वास्तव में कौन है, कहाँ से आया है और उसका वास्तविक उद्देश्य क्या है।
मोह-माया से मुक्ति
यह स्तोत्र बताता है कि सांसारिक आकर्षण अस्थायी हैं। इनके पीछे भागते-भागते मनुष्य अपना पूरा जीवन व्यर्थ कर देता है।
मृत्यु का स्मरण
जीवन अनिश्चित है। मृत्यु कभी भी आ सकती है। इसलिए समय रहते ईश्वर का स्मरण और आत्मकल्याण के कार्य करने चाहिए।
भक्ति और ज्ञान का समन्वय
इस स्तोत्र में केवल भक्ति ही नहीं, बल्कि ज्ञान की भी महत्ता बताई गई है। भक्ति और आत्मज्ञान दोनों मिलकर मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करते हैं।
चर्पट पंजरिका स्तोत्र के प्रमुख उपदेश
1. समय निरंतर बीत रहा है
दिन, रात, महीने और वर्ष लगातार बीतते रहते हैं। जीवन का प्रत्येक क्षण कम होता जा रहा है, फिर भी मनुष्य अपनी इच्छाओं में उलझा रहता है।
2. धन स्थायी नहीं है
जब तक व्यक्ति धन अर्जित करता है, तब तक लोग उसके आसपास रहते हैं। लेकिन वृद्धावस्था या कठिन समय में वही लोग दूर हो जाते हैं।
3. शरीर नश्वर है
यौवन, सौंदर्य और शक्ति एक दिन समाप्त हो जाते हैं। शरीर वृद्ध होता है और अंततः मृत्यु को प्राप्त होता है।
4. संसार एक स्वप्न के समान है
जो वस्तुएँ आज अत्यंत महत्वपूर्ण लगती हैं, वे समय के साथ महत्वहीन हो जाती हैं। इसलिए संसार को अंतिम सत्य न मानकर ईश्वर की ओर बढ़ना चाहिए।
5. जन्म-मृत्यु का चक्र
मनुष्य बार-बार जन्म लेता है और मृत्यु को प्राप्त होता है। भगवान की कृपा और आत्मज्ञान से ही इस चक्र से मुक्ति मिलती है।
चर्पट पंजरिका स्तोत्र के लाभ
आध्यात्मिक जागृति
इस स्तोत्र का नियमित पाठ व्यक्ति को आत्मज्ञान और आध्यात्मिक उन्नति की ओर प्रेरित करता है।
मन की शांति
इसके श्लोक मन को स्थिर और शांत बनाते हैं। मानसिक तनाव और चिंता कम होने लगती है।
वैराग्य की भावना
भौतिक वस्तुओं के प्रति अत्यधिक आसक्ति कम होती है और संतुलित जीवन जीने की प्रेरणा मिलती है।
मृत्यु के भय में कमी
जीवन और मृत्यु के वास्तविक स्वरूप को समझने से मृत्यु का भय धीरे-धीरे समाप्त होने लगता है।
सकारात्मक सोच
नियमित पाठ से व्यक्ति परिस्थितियों को अधिक परिपक्वता और सकारात्मक दृष्टिकोण से देख पाता है।
ध्यान और एकाग्रता में वृद्धि
यह स्तोत्र मन को एकाग्र करने में सहायक माना जाता है, जिससे ध्यान और साधना में सफलता मिलती है।
भक्ति में वृद्धि
भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण के प्रति श्रद्धा एवं भक्ति का भाव बढ़ता है।
चर्पट पंजरिका स्तोत्र पाठ करने की सही विधि
1. स्नान और शुद्धता
प्रातःकाल स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
2. पूजा स्थान का चयन
घर के मंदिर या किसी शांत एवं पवित्र स्थान पर बैठें।
3. भगवान का ध्यान
भगवान विष्णु, श्रीकृष्ण या गोविन्द स्वरूप का ध्यान करें।
4. संकल्प लें
अपने मन में ईश्वर भक्ति, आत्मशुद्धि और आध्यात्मिक उन्नति का संकल्प लें।
5. श्रद्धापूर्वक पाठ करें
श्लोकों का स्पष्ट उच्चारण करते हुए पूर्ण श्रद्धा और भक्ति से पाठ करें।
6. ध्यान करें
पाठ पूर्ण होने के बाद कुछ समय मौन बैठकर भगवान का ध्यान करें।
चर्पट पंजरिका स्तोत्र का पाठ कब करें?
- प्रतिदिन प्रातःकाल
- संध्या समय
- एकादशी के दिन
- गीता जयंती पर
- विष्णु पूजा के समय
- आध्यात्मिक साधना के दौरान
- मन अशांत होने पर
किन लोगों को यह स्तोत्र पढ़ना चाहिए?
- आध्यात्मिक साधकों को
- विद्यार्थियों को
- गृहस्थ जीवन जीने वालों को
- वृद्ध व्यक्तियों को
- तनाव और चिंता से ग्रस्त लोगों को
- आत्मज्ञान प्राप्त करने की इच्छा रखने वालों को
निष्कर्ष
चर्पट पंजरिका स्तोत्र केवल एक धार्मिक स्तुति नहीं, बल्कि जीवन को समझने का एक गहन आध्यात्मिक ग्रंथ है। यह मनुष्य को याद दिलाता है कि धन, यौवन, परिवार और संसार की सभी वस्तुएँ अस्थायी हैं। जो चीज़ वास्तव में शाश्वत है, वह है परमात्मा का स्मरण और आत्मज्ञान।
यदि इस स्तोत्र का नियमित रूप से श्रद्धा और समझ के साथ पाठ किया जाए, तो व्यक्ति के भीतर वैराग्य, शांति, विवेक और भक्ति का विकास होता है। यही कारण है कि सदियों से यह स्तोत्र साधकों और भक्तों के लिए प्रेरणा का स्रोत बना हुआ है।
“भज गोविन्दं भज गोविन्दं भज गोविन्दं मूढमते” — यही इस महान स्तोत्र का सार है, जो हमें ईश्वर की ओर लौटने और जीवन के वास्तविक उद्देश्य को समझने की प्रेरणा देता है।


