यह चौपाई गोस्वामी तुलसीदास कृत रामचरितमानस के किष्किंधा कांड से ली गई है। इस प्रसंग में ऋक्षराज जाम्बवान हनुमानजी को उनके बल, बुद्धि और सामर्थ्य का स्मरण कराते हैं।
चौपाई:
कहइ रीछपति सुनु हनुमाना। का चुप साधि रहेहु बलवाना॥
पवन तनय बल पवन समाना। बुधि बिबेक बिग्यान निधाना॥2॥
प्रसंग का विवरण: (Details of the incident:)
जब रावण माता सीता का हरण कर उन्हें लंका ले गया, तो श्रीराम ने वानर सेना के साथ उनकी खोज शुरू की।
हनुमान, अंगद, जाम्बवान आदि योद्धा दक्षिण दिशा की ओर खोज में निकले और समुद्र तट पर पहुंचे। वहाँ वे सोचने लगे कि लंका पार करके कौन जा सकता है।
हनुमानजी अपनी शक्ति को भूल चुके थे।
तब ऋक्षराज जाम्बवान उन्हें उनका वास्तविक स्वरूप याद दिलाते हैं — और यही संवाद इस चौपाई में व्यक्त है।
चौपाई का अर्थ: (Meaning of Chopai:)
- कहइ रीछपति सुनु हनुमाना।
रीछराज जाम्बवान कहते हैं: “हे हनुमान! सुनो ज़रा।” - का चुप साधि रहेहु बलवाना॥
“तुम इतने बलवान होकर भी चुप क्यों हो गए हो?” - पवन तनय बल पवन समाना।
“तुम वायुदेव के पुत्र हो, और तुम्हारा बल वायु के समान अथाह है।” - बुधि बिबेक बिग्यान निधाना॥
“तुम बुद्धि, विवेक और ज्ञान के भंडार हो।”
इस प्रसंग का महत्व: (Significance of this context:)
यह क्षण हनुमानजी के आत्मबोध का प्रतीक है।
जब व्यक्ति अपनी शक्ति को भूल जाता है, तो किसी अनुभवी, ज्ञानवान मार्गदर्शक की आवश्यकता होती है — जो हमें हमारी ही क्षमता का बोध कराए।
हनुमानजी को जब अपनी शक्ति याद आई, तब उन्होंने समुद्र लांघा, लंका पहुँचे, और सीता माता का संदेश श्रीराम तक पहुँचाया।
आध्यात्मिक लाभ: (Spiritual Benefits:)
इस चौपाई का नियमित पाठ व्यक्ति को:
- आत्मविश्वास
- साहस
- और अपने भीतर छिपी दिव्यता का बोध कराता है।


